फ्रांस की क्रान्ति (1789) के 06 कारण

फ्रांस की क्रान्ति (1789) के 06 कारण

फ्रांस की क्रान्ति (1789 ई.) न केवल यूरोप के इतिहास की, बल्कि विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण एवं युगांतरकारी घटना मानी जाती है। पुरातन व्यवस्था को आमूलचूल चुनौती देते हुए, फ्रांस को क्रान्ति ने, विश्व के इतिहास में, बड़े सशक्त ढंग से, तीन नवीन आधुनिक आदर्शों-‘स्वतन्त्रता, समानता एवं भ्रातृत्व (Liberty, Equality and Fraterity) के वास्तविक एवं व्यावहारिक रूपान्तरण का प्रयास किया।

इसलिए अनेक विद्वान आधुनिक युग की वास्तविक शुरुआत फ्रांस की क्रान्ति से मानते हैं। ‘स्वतन्त्रता’ के आदर्श के मूर्तिकरण के रूप में फ्रांस की क्रान्ति ने यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता उऊपर से नहीं आती, बल्कि नीचे से अर्थात् जनता से उठकर ऊपर जाती है। स्वतन्त्रता का यह विचार सत्ता एवं परम्परा के प्रति आज्ञाकारिता के पुरातन सिद्धान्त के प्रति विद्रोह का स्पष्ट रेखांकन था ‘समानता’ के सिद्धान्त के उद्घोष के अन्तर्गत कुलीन वर्ग के रूढ़िबद्ध विशेषाधिकारों को चुनौती दी गई तथा कानून के समक्ष सभी मनुष्यों की समानता की बात कही गई। ‘भ्रातृत्व’ का संदेश मनुष्यों के मध्य राष्ट्रीय प्रेम एवं सौहार्द की भावना को बलवती बनाने के
प्रयासों से मुखरित हुआ। इन तीनों ही सिद्धान्तों ने मनुष्य मात्र के गौरव एवं सम्मान के सिद्धान्त को पुष्ट किया।

दूसरी ओर यह मानना अतिशयोक्तिपूर्ण होगा कि उपर्युक्त सिद्धान्तों के प्रस्फुटन एवं प्रचार का श्रेय एकमात्र फ्रांस की क्रान्ति को है। स्वतन्त्रता एवं समानता के सिद्धान्त, इससे पूर्व इंग्लैण्ड एवं अमेरिका की क्रान्तियों में भी आंशिक रूप से प्रतिध्वनित हुए थे, लेकिन फ्रांस की क्रान्ति ने उन्हें अधिक घनत्व से एवं अधिक गम्भीर रूप से प्रस्तुत किया। फ्रांस की क्रान्ति में, उपर्युक्त दोनों सिद्धान्तों पर आधारित, आधारभूत सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन की लहर दिखाई देती है जो पूर्ववर्ती इंग्लैण्ड एवं अमेरिका की क्रान्तियों में उतनी प्रखर नहीं है। फ्रांस की क्रान्ति में एक प्रकार का मिशनरी जोश था; इसके माध्यम से जो विचार प्रसारित हुए उन्होंने उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के इतिहास को एक दिशा प्रदान की।

फ्रांस की क्रान्ति के 06 कारण

फ्रांस की क्रान्ति मुख्यत: फ्रांस की पुरातन व्यवस्था (Old Regime) के प्रति गहरे जन असंतोष का परिणाम थी। फ्रांस की पुरातन व्यवस्था-गम्भीर सामाजिक विषमता, राजनीतिक निरंकुशता, प्रशासनिक अंधव्यवस्था तथा जनसामान्य का आर्थिक शोषण-इन सबका पर्याय बन गयी थी। इन परिस्थितियों को रेखांकित तथा सुधार के लिए दिशांकित करने का कार्य किया फ्रांस के समकालीन विचारकों ने। 1789 में फ्रांस के घनघोर वित्तीय संकट ने क्रान्ति का तात्कालिक कारण उपस्थित कर दिया। रोचक तथ्य यह है कि किसी भी विचारक ने क्रान्ति का पूर्वाभास नहीं दिया था; वे सभी सुधारों या आंशिक परिवर्तन की माँग कर रहे।थे । लेकिन पुरातन व्यवस्था के प्रति जनअसंतोष, नवीन विचारों का जोश तथा तात्कालिक परिस्थितियों का।एक ऐसा समुच्चय 1789 में हुआ जिसने प्रांस को क्रान्ति के सामने लाकर खड़ा कर दिया। जैसा कि डेविड थामसन (यूरोप सिन्स नेपोलियन) ने लिखा है ‘यह एक विरोधाभास है कि 1789 में पफ्रांस में किसी भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति या शक्ति ने क्रान्ति की कामना नहीं की थी क्रान्तियाँ कई बार शुरू हो जाती हैं, जैसे कि युद्ध शुरू हो जाते हैं, इसलिये नहीं कि लोगों ने उनकी निश्चित कामना की थी ऐसा इसलिये जो जाता है कि लोगों ने चाहा कुछ और था, लेकिन परिस्थितियों के एक विशेष समूह ने, उन्हें क्रान्ति या युद्ध में उलझा।दिया।’ इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि फ्रांस में क्रान्ति को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ नहीं थीं,।वस्तुत: परिस्थितियाँ गम्भीर एवं विषम थीं; उनसे उपजा असंतोष भी गहन एवं व्यापक था; बौद्धिक जागृति भी सम्यक् एवं पर्याप्त थी; लेकिन आमूलचूल परिवर्तन या क्रान्ति की माँग लोगों की जुबान पर नहीं थी। वे तत्कालीन व्यवस्था में यथोचित सुधार एवं आंशिक परिवर्तन के ही आकांक्षी थे लेकिन घटनाक्रम ने कुछ इस तरह मोड़ लिया कि फ्रांस के शासक एवं विशेषाधिकारयुक्त वर्गों की सुधार-विरोधी हठधर्मिता के कारण, फ्रांस के कृषकों, मजदूरों एवं मध्यमवर्गीय लोगों ने विवश होकर क्रान्ति का झंडा बुलंद कर दिया परिवर्तन।समय की माँग थी, इस माँग को फ्रांस के शासक और विशेषाधिकारयुक्त वर्ग ने नहीं पहचाना, उनकी अतिवादी हठधर्मिता की परिणति उनके स्वयं के विनाश के रूप में हुई और जनसामान्य ने पाया आमूलचूल परिवर्तन या क्रान्ति का तोहफा, एक ऐसा तोहफा जिसने विश्व के इतिहास की दिशा बदल दी ।

01 गम्भीर सामाजिक विषमतायें

फ्रांस में असंतोष का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसकी सामाजिक व्यवस्था थी, जो विभिन्न वर्गों के गम्भीर
रूप से असमान अधिकारों पर आधारित थी, और इन असमान अधिकारों को वैधानिक स्वीकृति प्राप्त थी। फ्रांस का समाज वैधानिक रूप से तीन वर्गों, जिन्हें एस्टेट्स (Estates) कहा जाता था, में विभाजित था। प्रथम एस्टेट के अन्तर्गत विशेषाधिकार युक्त पादरी वर्ग था द्वितीय एस्टेट के अन्तर्गत विशेषाधिकारयुक्त कुलीनवर्ग था। शेष जनसंख्या तृतीय एस्टेट के अन्तर्गत आती थी जो विशेषाधिकार रहित थी, इस एस्टेट में कृषकों एवं सर्वहारा-वर्ग का बाहुल्य था।

सन् 1789 में फ्रांस की जनसंख्या लगभग ढाई करोड़ थी जिसमें से पाँच लाख व्यक्त अर्थात् सम्पूर्ण
जनसंख्या के लगभग दो प्रतिशत व्यक्ति विशेषाधिकारयुक्त प्रथम दो एस्टेट्स (पादरी वर्ग एवं कुलीन वर्ग) से सम्बद्ध थे यह विशेषाधिकारयुक्त अल्पांश अनेक सुविधायें एवं रियायतें प्राप्त कर रहा था, इनके पास भूमि का गैर-आनुपातिक हिस्सा था, आय पर इनका एकाधिकार सा था, सरकार एवं सेना के सभी उच्च पद इनके लिए आरक्षित थे, इनके लिए अलग एवं विशेष न्यायालय बने हुये थे तथा प्रत्यक्ष करों के भुगतान से इन्हें छूट प्राप्त थी।

‘प्रथम एस्टेट’ के अन्तर्गत राज्य का पादरीवर्ग (Clergy) आता था। राज्य में चर्च की स्थिति ‘राज्य के
भीतर एक दूसरे राज्य’ (A State within the State) की तरह थी । उच्च पादरीवरग्ग अत्यधिक समृद्ध एवं सम्पन्न था इनके अधिकार में फ्रांस की भूमि का 1/5वाँ हिस्सा था जिससे प्रचुर आमदनी होती थी इसके अलावा चर्च कृषकों से ‘धार्मिक कर’ (tithe) भी वसूल करती थी। चर्च का अपना प्रशासन था, अपने न्यायालय थे। चर्च स्कूलों, अस्पतालों एवं अन्य समाजसेवी संस्थाओं का संचालन करती थी। उच्च पादरी वर्ग के लोग कर भार से मुक्त थे, और उनमें से अनेक लोग अपने धार्मिक कर्त्तव्यों से विमुख होकर ऐश्वर्य और भोग-विलासपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे उनके पास अपने दुर्ग (Castles) थे, महल थे, तथा बेशकीमती वस्तुयें थीं। उदाहरण के लिए, स्ट्रेसबर्ग के आर्कबिशप की वार्षिक आय लगभग 3 लाख डालर थी और वह।अपने भव्य महल में दरबार लगाता था। उसकी रसोई में, खाना बनाने की देगचियाँ भी चाँदी की बनी हुई थीं। उसके अस्तबल में अतिथियों के विलास के लिए, लगभग 180 घोड़े थे एक बिशप की औसत आमदनी लगभग 50,000 डालर वार्षिक थी। अनेक बिशप वसाय के महल में ही रहते थे और वहाँ के विलासितापूर्ण।जीवन का आनन्द ले रहे थे दूसरी ओर निचले दर्जे के पादरी (lower clergy) यद्यपि निष्ठापूर्वक धार्मिक कार्यों में लगे हुए थे, लेकिन उनकी हालत ठीक नहीं थी। उन्हें अनेक सुविधाओं एवं रियायतों से महरूम रखा जाता था। शायद यही कारण था कि फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत होने के बाद निचले दर्जें के पादरियों ने
तृतीय एस्टेट अर्थात् जनसामान्य का साथ दिया। जैसा कि साल्वमेनी (दि फ्रेंच रिवोल्यूशन) ने लिखा है, ‘पादरियों के उच्च एवं निम्न वर्ग के मध्य व्याप्त वैमनस्य ने क्रान्ति की आरम्भिक विजय भूमिका निभाई।

फ्रांस में ‘द्वितीय एस्टेट’ के अन्तर्गत कुलीनतन्त्र (Nobility) के लोग आते थे जिनकी संख्या उनके
परिवार सहित लगभग 4 लाख थी सामाजिक दृष्टि से एक विशिष्ट वर्ग के रूप में कुलीनतन्त्र को विशेष अधिकार, रियायतें एवं सुविधायें प्राप्त थीं, जैसे कि राज्य के प्रत्यक्ष करों से मुक्ति, विशेष न्यायालयों में अभियोग की सुविधा, शिकार करने का अधिकार तथा राज्य के नागरिक एवं सैनिक प्रशासन के सभी उच्च पदों पर एकाधिकार। पादरी-तन्त्र की भाँति कुलीनतन्त्र के अन्तर्गत भी अनेक आन्तरिक वर्ग थे जिनकी भौतिक स्थितियों में अन्तर था, यद्यपि उनके विशेषाधिकार समान थे कुलीनवर्ग के अन्तर्गत मुख्यतया दो प्रकार के कुलीन थे- ‘शस्त्र-आधारित कुलीन’ (nobility of the sword), तथा ‘वस्त्र- आधारित कुलीन’ (nobility of।the robe)। ‘शस्र- आधारित कुलीन वर्ग’ में पुराने सामन्त थे जिनके पास बड़ी जमीन-जायदादें तथा सैनिक महत्त्वपूर्ण शक्ति थी। इनमें से कुछ वर्साय के राजदरबार में रहते थे तथा उनके प्रतिनिधि उनके प्रान्तों में प्रशासन चलाते थे अन्य स्वयं प्रान्तों में प्रत्यक्ष प्रशासन का कार्यभार देखते थे राजदरबार में रहने वाले सामंतों की शानोशौकत बड़ी जबर्दस्त थी, उच्चतम पदों पर उनका अधिकार था, राजा से उन्हें विपुल दान, उपहार एवं पेंशने प्राप्त होती थीं; उनकी विलासिता और ऐशोआराम कुलीन वर्ग के अन्य लोगों के लिए ईष्ष्या का कारण था। ऐसे सामन्तों की संख्या अधिक नहीं थी, वे लगभग एक हजार के आस-पास होंगे उनसे संख्या में कई गुना अधिक सामंत प्रान्तों में ही रहते थे और प्रत्यक्ष शासन कार्य संभालते थे, वे भी प्रायः सम्पन्न थे लेकिन दरबारी सामन्तों की तरह उच्च पदों पर आसीन नहीं थे उनमें से कुछ किसानों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख रखते थे।और इस वजह से उनके आदर के पात्र भी थे दूसरे उपवर्ग के अन्तर्गत, ‘वस्त्र- आधारित कुलीन’ (nobility of the robe) थे जिसका अर्थ था कि ऐसे व्यक्ति जो भूमि की प्राचीन सामन्ती जागीरों से सम्बद्ध नहीं थे बल्कि न्यायालय एवं नौकरशाही में उच्च पदों पर आसीन थे। कुलीन वर्ग के सभी लोगों के पास शिकार करने।का विशेष अधिकार था, और शिकार ही उनका मुख्य मनोरंजन था, लेकिन शिकार के खेल से किसानों की फसलों को कभी-कभी बड़ा नुकसान पहुँचता था । कुलीन वर्ग के पास , पादरी वर्ग की भाँति, फ्रांस की भूमि।का लगभग 1/5वाँ हिस्सा था। जाहिर है कि कुलीन वर्ग की विलासिता का भार जनसामान्य को उठाना पड़ता
था यह कहा जाता था कि “पादरी लोग प्रार्थना करते हैं, कुलीन लोग युद्ध, तथा इन सबका खर्चा आम
a a ” (The priests pray, the nobles fight, the commons pay for all)” I तृतीय एस्टेट’ के अन्तर्गत फ्रांस में जनसंख्या का बड़ा हिस्सा था। पादरी वर्ग एवं कुलीन वर्ग के अतिरिक्त अन्य सभी लोगों को ‘तृतीय एस्टेट’ (Third Estate) के अन्तर्गत रखा जाता था। राज्य के करों का लगभग सारा भार इसी वर्ग को वहन करना पड़ता था। यह वर्ग सुविधाओं से वचित था, तथा करमुक्त एवं सुविधाभोगी पादरीतन्त्र तथा कुलीनतन्त्र की विलासिता का बोझा भी इसी वर्ग को ढोना पड़ता था। तृतीय एस्टेट के अन्तर्गत मुख्यतया तीन प्रकार के लोग थे –


(1) कृषक, जो कि फ्रांस की जनसंख्या का सबसे बड़ा हिंस्सा थे;
(2) श्रमिक एवं मजदूर, जो प्रायः नगरों में कार्य करते थे,
(3) मध्यम वर्ग या बुर्जुआ, जिसके अन्तर्गत।व्यापारी, शिक्षक, वकील, शिल्पी आदि आते थे तृतीय एस्टेट के अन्तर्गत आने वाले लोगों की भौतिक।स्थितियों में बड़ा अन्तर था-इसके अन्तर्गत समृद्धतम व्यापारी से लेकर निर्धनतम कृषक तथा प्रबुद्धतम।व्यक्ति से लेकर निरक्षर भट्टाचार्य तक शामिल थे। इस वर्ग में समानता का आधार यह था कि यह पूरा वर्ग विशेषाधिकार रहित था, तथा राजकीय करों का बोझ वहन करता था।

फ्रांस एक कृषि प्रधान देश था और इसकी 80% जनता कृषक थी। देश के विभिन्न क्षेत्रों के कृषकों
की स्थिति में अन्तर था। उत्तरी फ्रांस के किसान अपेक्षाकृत समृद्ध थे, लेकिन दक्षिण के कुछ क्षेत्रों में, जैसा कि आर्थर यंग ने अपनी पुस्तक ‘ट्रैवल्स इन फ्रांस’ में लिखा है, “भीषण निर्धनता, अपर्याप्त भोजन तथा दुःखद जीवन-स्तर के चिह्न देखने को मिलते हैं।’ जो भी हो, कुल मिलाकर फ्रांस के कृषकों की स्थिति यूरोप के बहुत-से अन्य देशों के कृषकों की स्थिति से काफी बेहतर थी। यूरोप के बहुत से देशों में कृषक अभी भी दास।थे, फ्रांस में अधिकांश कृषक स्वतन्त्र थे लेकिन फ्रांसीसी कृषकों पर कर का बोझ अल्यधिक था और समाज।को चलाने का दायित्व उन पर कोल्हू के बैल की तरह पड़ता था हेजन (मॉडर्न यूरोप) के शब्दों में, ‘राजा.।चर्च तथा सामंत, को दिये जाने वाले कर, नमक तथा उत्पाद कर, इन सबको मिलाकर किसान को अपनी आय का 4/5वाँ हिस्सा कर के रूप में देना पड़ता था । शेष बचे 1/5वें हिस्से से उसे अपने तथा अपने परिवार का भरण-पोषण करना पड़ता था।

नगर में काम करने वाले श्रमिकों एवं मजदूरों की माली हालत भी ठीक नहीं थी। कम मजदूरी,
भीड़भाड़युक्त क्षेत्रों का रहन-सहन, पूर्ण आहार की कमी-कुल मिलाकर नगरीय सर्वहारा वर्ग का जीवन भी कष्टमय एवं संकटापन्न था 1788 एवं 1789 के दौरान कृषक एवं श्रमिक दोनों वर्गों के लोग प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बने। 1788 में फसल का अभाव तथा 1788-89 की अभूतपूर्व ठंड ने ग्रामीण तथा नगरीय दोनों क्षेत्रों में बहुत नुकसान पहुँचाया।

तृतीय एस्टेट का सबसे प्रबुद्ध एवं सर्वाधिक असंतुष्ट वर्ग था- मध्यम वर्ग या बुर्जुआ (Bourgeoisie)
जो कि कुल जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत था। मध्यम वर्ग में भी भौतिक स्थिति के आधार पर तीन प्रकार के आन्तरिक वर्ग थे-उच्च मध्यम वर्गे, मध्य मध्यम वर्ग, तथा निम्न मध्यम वर्ग। उच्च मध्यम वर्ग सबसे।समृद्ध था, लेकिन समृद्धि के बावजूद विशेषाधिकारों से वंचित रहने के कारण अत्यन्त दुःखी एवं असंतुष्ट था।

चूंकि पादरी तन्त्र और कुलीन तन्त्र विभिन्न प्रकार के करों के भुगतान से मुक्त था, अत: राजा एवं चर्च क खर्चों का मुख्य बोझ मध्यम वर्ग एवं सम्पन्न किसानों को झेलना पड़ता था। फ्रांस की क्रान्ति की बौद्धिक।पृष्ठभूमि तैयार करने में मध्यम वर्ग ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार फ्रांस के समाज की पुरातन व्यवस्था में विभिन्न वर्गों के मध्य गम्भीर असमानतायें थीं जैसा कि जे.सी. रेविल (वल्ल्ड हिस्ट्री) ने लिखा है, ‘फ्रांस में असंतोष जीवन की कठिनाइयों से उतना उत्पन्न नहीं हुआ जितना कि विभिन्न वर्गों द्वारा झेली जा रही असमानताओं के बोझ से।’ सिन्डर (मेकिंग ऑफ माडर्न मेन) के शब्दों में, ‘फ्रांस के समाज का त्रिभंगी विभाजन ( तीन एस्टेट्स) निरतांत अनुपयोगी हो चुका था, क्योंकि अब इसका तादात्म्य फ्रांस की जनता के विभिन्न वर्गों के हितों के वास्तविक विभाजन से नहीं रहा।’


डेविड थामसन (यूरोप सिन्स नेपोलियन) के अनुसार, फ्रांस का आर्थिक एवं सामाजिक ढाँचा उसके राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढाँचे की तुलना में बहुत अधिक विकसित हो चुका था फ्रांस के आर्थिक दृष्टि से प्रभावशाली तन्त्र तथा राजनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली तन्त्र, इन दोनों के मध्य बड़ा तीक्ष्ण एवं कड़वाहट भरा विभेद या वैषम्य था। फ्रांस के परंपरागत वैधानिक एवं राजनीतिक ढाँचे ने उच्च पादरी वर्ग तथा कुलीन तन्त्र को विशेष सुविधायें एवं अधिकार दे रखे थे, और ये दोनों वर्ग फ्रांस के कृषक वर्ग तथा मध्यम वर्ग के हितों एवं दृष्टिकोणों से सर्वथा उदासीन या असंपूक्त थे।’ जी. साल्वमेनी (दि फ्रेंच रिवोल्यूशन) के अनुसार, ‘अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ्रांस के समाज को देखकर ऐसा लगता था जैसे नवीन ठोस इमारतों के मध्य पुराने जर्जरित भवनों को इकट्ठा कर दिया गया है।

02 व्यापक आर्थिक असंतोष

अनेक कारणों से फ्रांस की जनता में गहरा आर्थिक असंतोष था, और सरकार के वित्तीय कुप्रबन्ध ने
उनकी वेदना को और अधिक तीक्ष्ण बना दिया था, जबकि विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को करों के भुगतान से आंशिक रूप से मुक्त रखा गया था, तृतीय एस्टेट के लोग विशेषकर कृषक वर्ग अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष एवं।अप्रत्यक्ष करों के बोझ से दबे हुए थे।

किसान को अपने सामन्त, चर्च तथा राजा को अनेक प्रकार के कर देने पड़ते थे। यद्यपि फ्रांस में दास-प्रथा नहीं थी, फिर भी वहाँ के किसान को अपने सामन्त को अनेक प्रकार की सेवाओं एवं खर्चों के द्वारा खुश रखना पड़ता था। किसानों से सामन्ती क्षेत्र की सड़कों, नहरों तथा सामन्त के भवनों तथा दुर्गों में काम करवाया जाता था। उन्हें अपने सामन्त की मिल से आटा पिसवाना पड़ता था, सामन्त के बड़े तंदूर में रोटियाँ सेकनी पड़ती थीं तथा सामन्त के शराब के भट्टे में ही अपने उपभोग की शराब बनानी पड़ती थी। जैसा कि मैजेनिस एवं ऐपल (संसार का इतिहास) ने लिखा है, ‘बहुधा एकमात्र तंदूर, मिल और शराब का भट्टा वहाँ के लार्ड का होता था । ऐसी स्थिति में किसान लार्ड को रोटी, आटे और शराब को जो वे बनाते थे, कुछ अंश देते थे। सामन्तों को अब भी अधिकार था कि जहाँ उनकी मर्जी हो, शिकार खेलें, चाहे उनके ऐसा करने से किसानों की बोई हुई फसल बरबाद क्यों न हो। इसके अलावा किसानों को यह अनुमति नहीं थी कि वे हिरन, खरगोश, कबूतर और उनकी फसलें नष्ट करने वाले अन्य जानवरों को मारें। ये सभी विशेषाधिकार मध्य युगीन थे और वे इतनी अच्छी तरह जड़ जमा चुके थे कि उन्हें समाप्त कर देना मुश्किल था ।

कृषकों तथा तृतीय एस्टेट के अन्य लोगों को चर्च को ‘टाइथ’ (Tihe) नामक धार्मिक कर देना पड़ता
था किसान को सबसे अधिक कर राजा को देने पड़ते थे। ये कर दो प्रकार के थे-प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष।कर। प्रत्यक्ष करों में प्रमुख थे-‘भूमि कर’ (Taille), “व्यक्ति कर’ (Capitation or poll-tax) तथा ‘आय कर’ (Vingtieme)। पादरी तन्त्र तथा कुलीन तन्त्र को प्रत्यक्ष करों के भुगतान से छूट प्राप्त थी अप्रत्यक्ष करों के अन्तर्गत थे- नमक कर (gabelle), चुंगी, उत्पाद-शुल्क, निय्यात कर आदि। इसमें नमक कर ‘गाबेल’ ने फ्रांस की जनता को बहुत दुःखी कर रखा था। नमक पर राज्य का अधिकार था और ‘गाबेल’ (नमक- कर) के कारण नमक अपनी वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक कीमत पर मिलता था मांस को सुरक्षित।रखने के लिए नमक अत्यावश्यक वस्तुओं में से था, और प्रत्येक व्यक्ति को नमक सरकारी एजेन्टों से ही।खरीदना पड़ता था। प्रत्येक परिवार के लिए आठ वर्ष से ऊपर के प्रति व्यक्ति के लिए कम से कम सात पौंड नमक प्रतिवर्ष के हिसाब से खरीदना अनिवार्य कर दिया गया। नमक कर की दरों में विभिन्न क्षेत्रों में बहुत।अन्तर था। नमक कर न देने वालों को जेल भेज दिया जाता था या कोड़ो से पोटा जाता था। कानून द्वारा फ्रांस।की जनता पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया था कि वह भोजन पकाने या किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य में फ्रांस की क्रान्ति (1789) समुद्र के पानी का उपयोग नहीं करेगी, न लवण-कच्छों में अपने पशुओं को चरायेगी, न उन्हें लवणयुक्त झरनों से पानी पिलायेगी कुल मिलाकर ‘गाबेल’ को फ्रांस की सरकार ने जनता के गले में फंदे की तरह बाँध रखा था। सिन्डर (दि मेकिंग ऑफ माडर्न मेन) के अनुसार, ‘अन्यायपूर्ण एवं घृणित गाबेल फ्रांस में क्रान्तिकारी भावना को उत्पन्न करने के लिए महत्त्वपूर्ण कारणों में से था।

फ्रांस में कर व्यवस्था का एक दुःखद पक्ष यह भी था कि कर सरकारी कर्मचारियों द्वारा वसूल नहीं
किया जाता था, बल्कि ठेकेदारों द्वारा किया जाता था सरकार उच्चतम बोली लगाने वाले व्यक्ति को कर वसूलने का ठेका देती थी। ये ठेकेदार जबकि सरकार को एक निश्चित रकम देते थे, स्वयं अधिकाधिक व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा में, बड़े मनमाने एवं अत्याचारपूर्ण तरीके से, फ्रांस की गरीब जनता से कर की।उगाही करते थे। अठारहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुई कीमतों की अप्रत्याशित वृद्धि ने पफ्रांस की जनता की आर्थिक वेदनाओं को विषमतर बना दिया। 1726 से 1741 के मध्य उपभोक्ता वस्तुओं की औसत कीमतों की तुलना में, 1785 से 1789 के मध्य कीमतें 65 प्रतिशत अधिक बढ़ गयी दूसरी ओर मजदूरी में वृद्धि अपेक्षाकृत बहुत कम हुई थी, कीमतों की वृद्धि की तुलना में लगभग एक-तिहाई ही इसका परिणाम यह हुआ कि जीवन- निर्वाह की लागत बढ़ गई और जो लोग भरण-पोषण के न्यूनतम स्तर पर थे उनके लिए जीवन बड़ा दुष्कर।हो गया। फ्रांस में बेकारों एवं भिखारियों की संख्या बढ़ गई । फ्रांस में जनसंख्या भी बढ़ गई थी, जिससे अर्थव्यवस्था पर और अधिक दबाव पड़ा। डेविड थामसन (यूरोप सिन्स नेपोलियन) के अनुसार, फ्रांस में दीर्घकालीन मुद्रास्फीति के कारण उत्पन्न आर्थिक संकट ने क्रान्ति की परिस्थितियों में एक विशेष विस्फोटक।तत्व का कार्य किया।

03 राजनीतिक निरंकुशता, अकर्मण्यता एवं विलासिता

फ्रांस के राजा स्वयं को दैविक अधिकार से सम्पन्न मानते थे, और इस अर्थ में ईश्वर की इच्छा से शासन करते थे, न कि जनता की इच्छा से। प्रकारान्तर से, वे निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी थे । इस प्रकार की स्थिति जनता के लिए तभी सुखद हो सकती थी जबकि राजा एक ‘जनहितैषी तानाशाह’ (benevolent despot) की भूमिका का निर्वाह करे। लेकिन दुर्भाग्य से फ्रांस की क्रान्ति का समकालीन राजा लुई सोलहवाँ और उसके पूर्ववर्ती राजा तानाशाह होने के साथ-साथ जनहितैषी होने का ढोंग भी भरते थे, लेकिन जनहित से उनका कोई वास्तविक तादात्म्य नहीं था, वे वर्साय के महल की विलासिता और शानोशौकत में डूबे रहते थे, तथा अपने राजनीतिक कर्त्तव्यों के प्रति उदासीन थे ।

लुई सोलहवें का प्रपितामह लुई चौदहवों (1643-1715) एक बहादुर एवं काबिल नरेश था, लेकिन उसने फ्रांस को युद्धों में इस कदर डुबोए रखा कि अपनी मृत्यु से पूर्व, वह फ्रांस को आर्थिक दिवालिएपन की कगार पर छोड़ गया। उसका एक पुत्र एवं एक पोता भी युद्ध को भेंट चढ़ गया। फ्रांस की जनसंख्या 190 लाख से घटकर 170 लाख हो गयी फ्रांस की जनता युद्ध-जनित वेदनाओं एवं यंत्रणाओं से आक्रान्त थी और हेजन के शब्दों में, ‘क्रान्ति के अस्पष्ट विचारों को अस्फुट रूप में बड़बड़ा रही थी।’ लुई चौदहवाँ, इतिहास के एक दीर्घतम राज्यकाल अर्थात् 72 वर्ष (1643- 1715 ) तक शासन करने के बाद जब मृत्यु को प्राप्त हुआ तो फ्रांस की जनता ‘खुशी से काँप उठी’ और उसने ‘ ईश्वर को इस उद्धार के लिए धन्यवाद दिया लई चौदहवें के बाद उसका पड़पोता लुई पन्द्रहवाँ (1715-1774) पाँच वर्ष को अवस्था में ही फ्रांस का शासक बन गया लुई चौदहवें ने अपने अन्तिम समय में, अपनी मृत्युशैय्या पर लेटे हुए, अपने पाँच वर्षीय उत्तराधिकारी लुई पन्द्रहवें को यह सलाह दी थी कि, ‘मेरे बच्चे, तुम अपने पड़ोसियों के साथ शान्ति से रहने का प्रयास करना, युद्धों के प्रति मेरी तरह चाव मत दिखाना, न मेरी तरह अमयादित खर्चे करना-जनता का ध्यान रखना।’ यह एक अनुतप्त नरेश की नेक सलाह थी, लेकिन लुई पन्द्रहवें ने अपने लम्बे राज्यकाल
(1715-1774) के दौरान इसकी पूरी तरह उपेक्षा की। उसने फ्रांस को अनेक अन्तर्राष्ट्य युद्धों में झोंक
दिया-पौलेण्ड के चुनाव का युद्ध (1733-1738), आस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध (1740-1774) तथा सप्तवर्षीय युद्ध (1756-1763) । इन युद्धों में भाग लेने के कारण फ्रांस के मानवीय एवं भौतिक, दोनों प्रकार के संसाधनों का विनाश हुआ। दूसरे, लुई पन्द्रहवों राजकीय दायित्वों को बोझिल और बोरियत भरा कार्य मानता था; वह नृत्य, आखेट और स्त्रियों का शौकीन था। वह दो रूपसियों-मैडम द पंपाडुअर तथा मैडम द बेरी के मोहजाल में फैसा हुआ था, वह उन पर न केवल धन और जागीरें न्यौछावर करता था, बल्कि राजनीतिक मामलों में उनकी छिछली सलाहों को भी स्वीकार करता था जैसा कि हेज (माडर्न यूरोप टू 1870) ने लिखा है, ‘लुई पन्द्रहवें के अधीन फ्रांस की सरकार प्रतिभासम्पन्न व्यक्तियों की सरकार नहीं थी, बल्कि पेटीकोट या घाघरों की सरकार थी। ‘ लुई पन्द्रहवें के शासन के बारे में पेरिस में आस्ट्रिया के राजदूत काम्टे डि मर्सी ने लिखा है कि, ‘वस्साय के दरबार में संभ्रान्ति या उलझन, अपयश तथा अन्याय के सिवाय कुछ नहीं है। शासन के श्रेष्ठ सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, सब कुछ भाग भरोसे छोड़ दिया गया है।’ जी.पी. गूच (लूई XV, दि मोनाक्की इन डिक्लाइन) के शब्दों में, ‘अपने देशवासियों केलिए लुई पन्द्रहवें की विरासत थी-एक कुप्रशासित, क्षुब्ध एवं कुण्ठित फ्रांस।’ यद्यपि अभी गणतन्त्रवाद का विचार क्षीण था, लेकिन राजतन्त्र का तिलिस्म खत्म हो रहा था।

लुई पन्द्रहवें के बाद उसका पोता, लुई सोलहवाँ (1774-1793), बीस वर्ष की अवस्था में फ्रांस का
शासक बना। लुई जब छोटा था तब किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि वह प्रांस का शासक बन जायेगा लेकिन अन्य प्रत्यक्ष उत्तराधिकारियों के अनपेक्षित रूप से दिवंगत हो जाने की वजह से, लुई सोलहवाँ सिंहासन पर आसीन हुआ। वह स्वयं इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था कहा जाता है कि वह नेक इरादों वाला सहृदय व्यक्ति था, लेकिन उसमें राजकार्य के लिए अपेक्षित समझ एवं संकल्प का अभाव था। वह शीघ्र निर्णय लेने में अक्षम था तथा डरपोक था। ‘वह वर्साय के परिष्कृत परिवेश का एक अनाड़ी तथा गरिमाशून्य केन्द्र था।’ बह अपने महल की खिड़कियों से ही हिरण का शिकार करना पसन्द करता था। अपने राज्यकाल के आरम्भ में वह फ्रांस के एक बुद्धिमान राजनीतिज्ञ तु्गों के प्रभाव में था, लेकिन बाद में वह अपनी रानी मेरी एन्तोइनेत (Marie Antoinette) के प्रभाव में रहा जो उसके एवं उसके देश फ्रांस के लिए बड़ा दुर्भाग्यकारी सिद्ध हुआ। फ्रांस की सरकार ‘पेटीकोट सरकार’ बन कर रह गई।

हेजन के शब्दों में, ‘फ्रांस में बूबों राजवंश के काल में महिलाओं का प्रभाव कुछ विशेष ही रहा, और
मेरी एन्तोइनेत भी इस प्रक्रिया का अपवाद नहीं थी।’ स्वेन के अनुसार, ‘लुई सोलहवें की युवा सुन्दर पत्नी मेरी एन्तोइनेत, उसके गले में चक्की के पाट की तरह लटकी हुई थी। हेजन के अनुसार, वह (मेरी एन्तोइनेत) सुन्दर, लावण्यमयी तथा चुलबुली थी। उसमें बहुत-सी ऐसी विशेषतायें थीं जो राजा में नहीं थी। उसमें दृढ़ इच्छा शक्ति थी, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता थी, पहल लेने का साहस था। लेकिन उसमें बुद्धिमता तथा निर्णय लेने की खुली दृष्टि का अभाव था। वह फ्रांसीसी जनता की मन:स्थिति या समय की भावना को नहीं समझती थी। मेरी एन्तोइनेत कम पढ़ी-लिखी थी, घमण्डी एवं फिजूल खर्च थी, असहिष्णु एवं सुविधाप्रिय थी। वह उन लालची लोगों से घिरी हुई थी जो फ्रांस में किसी भी प्रकार के सुधार के विरोधी थे।

वर्साय का महल एवं राजदरबार फ्रांस के राजाओं एवं कुलीन वर्ग के लोगों की बेपनाह विलासिता एवं
अकर्मण्यता का जीवन्त प्रतीक था । फ्रांस की राजधानी पेरिस थी, और राजा उससे बारह मील दूर अवस्थित वर्साय के महल की शानोशौकत में डूबा रहता था वस्साय का दरबार यूरोप के अन्य राजाओं की ईष्ष्या का केन्द्र था। इस दरबार में लगभग 18,000 व्यक्ति थे। इनमें से 2,000 व्यक्ति राजा के चुनिंदा दरबारी थे जो कुलीन वर्ग एवं पादरी वर्ग से सम्बद्ध थे, शेष 16,000 व्यक्ति राजा की व्यक्तिगत सेवा के लिए थे। वसर्साय के महल में राजा, राजपरिवार के अन्य अन्तहीन सिलसिलों में मशगूल रहते थे विलासिता, वर्साय के महल का केन्द्रीय तत्त्व था । राजनीतिक अकर्मण्यता तथा उदासीनता इसके प्रतिफल थे फिजूलखर्ची बेहिसाब थी, 1789 में वसर्साय के महल के रखरखाव का खर्चा लगभग 2 करोड़ डालर था । हेजन के शब्दों में, ‘कोई आश्चर्य नहीं कि लोग वसर्साय के राजदरबार को राष्ट्र का जीवित कब्रिस्तान कहते थे ।

04 प्रशासनिक अव्यवस्थाएँ

फ्रांस का प्रशासनिक ढाँचा बड़ा अव्यवस्थित एवं असंतोषजनक था। प्रशासनिक तंत्र न केवल जटिल,
अस्पष्ट एवं असंगठित था, इसके विभिन्न विभागों में कोई आपसी तालमेल नहीं था प्रकारान्तर से, फ्रांस का प्रशासनिक तंत्र पूर्णतः अवैज्ञानिक एवं अकार्यकुशल था । हेज के अनुसार, ‘फ्रांस की सरकार एक बेतरतीब ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया का नतीजा थी; यह स्वैच्छाचारी भी थी, तथा अव्यवस्थित भी। समय के अन्तराल में, संस्थाओं एवं कर्मचारियों के एक समूह को पूर्ववर्ती दूसरे समूहों पर आरोपित कर दिया गया था।’ सिन्डर के शब्दों में, ‘फ्रांस का सरकारी तन्त्र फूहड़ एवं अकार्यकुशल तरीके से संगठित था, इसकी विशेषतायें थीं- अधिकारों में मतभेद,कार्य का ह्वैधीकरण, प्रक्रियात्मक संभ्रान्ति तथा एकरूप कानूनों का अभाव। फ्रांस की क्रान्ति (1789) फ्रांस के राजा और फ्रांस की प्रजा के मध्य एक बड़ी गहरी खाई थी। राजाओं को वसाय का शानदार एवं ऐश्वर्यपूर्ण एकान्त पसन्द था, वे प्रजा के दुःख-दर्द को समझने का प्रयास नहीं करते थे और अपने राजनीतिक दायित्वों के निर्वहन के प्रति उदासीन थे ।

प्रशासनिक निर्णयों के मामले में फ्रांस के राजा निरंकुश, मनमौजी तथा स्वेच्छाचारी थे, क्योंकि उनका
मानना था कि वे ईश्वर की इच्छा से शासन कर रहे हैं प्रशासनिक कार्यों की सहायता के लिए राजा के पास पाँच समितियों थीं, जो कानून बनाने, आदेश पारित करने तथा राज्य की गतिविधियों को संचालित करने का कार्य करती थीं। इन समितियों में राजा द्वारा मनोनीत उसके चुनिंदा कृपापात्र होते थे इन पाँच समितियों को राजा की पाँच अंगुलियाँ कहा जाता था ।

प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण की दृष्टि से देश को 36 प्रदेशों, जिन्हें ‘इन्टेन्डेन्सीज’ (Intendancies) या
जनरलिटीज’ (generalities) कहा जाता था, में बाँटा गया था प्रदेश का प्रमुख अधिकारी ‘इन्टेन्डेण्ट’
(Intendant) या ‘गवर्नर’ (Governor) कहलाता था जो कि राजा द्वारा नियुक्त होता था इन्टेन्डेण्ट्स’ अपने प्रदेशों में मनमाने ढंग से शासन करते थे और अधिकांश प्रान्तों की जनता उनसे असंतुष्ट थी। हर प्रदेश के अपने अलग कानून कायदे थे, कुल मिलाकर फ्रांस में लगभग “चालीस सरकारें” थीं, जिनमें से 32 सरकारें फ्रांस के प्राचीन सामन्तीय आधार पर बने प्रान्तों में थीं उपर्युक्त ‘इन्टेन्डेन्सीज’ में विभाजन के अतिरिक्त फ्रांस में कई अन्य प्रकार के विभाजन भी प्रचलित थे, और उनके पारस्परिक अधिकारों में कोई स्पष्टता नहीं थी। मध्यकाल से प्रचलित, एक आन्तरिक विभाजन के अन्तर्गत, फ्रांस को बहुत से ‘जिलों’ (districts) में।बाँटा हुआ था, जो ‘बैलिफ्स’ (bailifis) एवं ‘ सेनेशल्स’ (seneschals ) नामक अधिकारियों के अधीन थे, इन अधिकारियों के कार्यालय अब विशुद्ध सजावटी थे इसके अतिरिक्त प्रांस ‘ न्यायिक जिलों’ (judicial districts), ‘धार्मिक जिलों’ (ccclesiastical districts ), तथा ‘शैक्षणिक जिलों’ (educational districts)
में भी बँटा हुआ था।

फ्रांस में स्थानीय स्वप्रशासन जैसी किसी इकाई का कोई वास्तविक अ त्व नहीं था। राष्ट्रीय प्रशासन
की भाँति स्थानीय प्रशासन का निर्धारण भी वसर्साय के राजदरबार से किया जाता था पेरिस से सैकड़ों मील दूर अवस्थित किसी गाँव के टूटे पुल के निर्माण का प्रश्न हो या किसी सार्वजनिक भवन की छत के मरम्मत का,।इसका निर्णय पेरिस में लिया जाता था, लम्बे विलम्ब के बाद। हेजन के शब्दों में, ‘यह पूरी तरह से लालफीताशाही का काल था ।

फ्रांस का प्रशासन लगभग पूरी तरह वस्साय में केन्द्रीभूत था, ऐसे अत्यधिक केन्द्रीकृत प्रशासन के माध्यम से फ्रांस के विभिन्न क्षेत्रों के प्रशासनिक नियमों और घटकों में आसानी से एकरूपता लाई जा सकती थी, लेकिन राजनीतिक उदासीनता इतनी अधिक थी कि इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। फ्रांस के विविध क्षेत्रों में अलग-अलग एवं बहुरूपीय व्यवस्थायें प्रचलित थीं। एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में, यहाँ तक कि कभी- कभी एक गाँव से दूसरे गाँव में जाने पर तौल-माप की इकाइयों के अलग-अलग नाम एवं मूल्य प्रचलित थे।

फ्रांस के तेरह प्रदेशों में मुक्त व्यापार प्रचलित था, जबकि उन्नीस अन्य प्रदेशों में सामान के आने जाने पर चुंगी एवं अन्य कर देने पड़ते थे कानून व्यवस्था की स्थिति तो और भी खराब थी। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कानून चलते थे। कुछ क्षेत्रो में रोमन कानून व्यवस्था प्रचलित थी, कुछ क्षेत्रों में पारम्परिक सामन्ती कानून चलते थे एक अनुमान के अनुसार पफ्रांस में लगभग 285 विभिन्न प्रकार की पारम्परिक कानन।व्यवस्थायें चलती थीं दूसरे, कानून राजा एवं प्रभावशाली व्यक्तियों के हाथ की कठपुतली मात्र थे। किसी भी।व्यक्ति को, बिना कोई कारण बताए, वारण्ट जारी करके, जिसे ‘लेत्न द केशे’ (Lettre de cachet) कहा जाता था, गिरफ्तार किया जा सकता था और बिना किसी अभियोग के अनिश्चित काल तक जेल में रखा जा सकता था।

05 बौद्धिक जागृति

फ्रांस की क्रान्ति की वैचारिक पृष्ठभूमि बनाने में फ्रांस के चिंतकों एवं लेखकों का महत्त्वपूर्ण योगदान
है। इन लेखकों ने फ्रांस की जनता के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक असंतोष को बड़ी प्रखर अभिव्यक्ति दी. तथा फ्रांस के लोगों के समक्ष उनकी तत्कालीन दशा से मुक्ति के सुधार मारगों को प्रस्तुत किया। यह मानना गलत होगा कि ‘फ्रांस की क्रान्ति का विचार’ इन्हीं लेखकों ने प्रस्तुत किया था। जैसा कि डेविड थामसन (यूरोप सिन्स नेपोलियिन) ने लिखा है, ‘इन लेखकों के विचारों तथा 1789 में क्रान्ति की शुरुआत के Preai पुरतsieय, लापनगर मध्य सम्बन्ध किंचित् सुदूर एवं अप्रत्यक्ष है। उन्होंने क्रान्ति का उपदेश नहीं दिया था और वे किसी भी ऐसे निरकुश राजा का सहयोग देने के लिए तैयार थे जो उन्हें संरक्षण प्रदान करता तथा उनकी शिक्षाओं को स्वीकार कर लेता। इन लेखकों के अधिकांश पाठक भी न क्रान्ति चाहते थे, न क्रान्ति के लिए कार्य करना चाहते थे; वे अधिकांशत: अभिजात वर्ग के कुलीन थे; वकील, व्यापारी या स्थानीय लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति, जिनकी स्थिति तत्कालीन व्यवस्था में दु:खमय नहीं थी ।

यह सही है कि फ्रांस की क्रान्ति फ्रांस के लेखकों के विचारों का प्रतिफलन नहीं थी, वह मूलतः फ्रांस
के राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त असंतोषजनक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों तथा उनके सुधार के प्रति तत्कालीन सरकार की उदासीनता का परिणाम थी। लेकिन फिर भी क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त करने में इन लेखकों का योगदान इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने तत्कालीन समाज एवं व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया, तथा उनसे मुक्ति की आशा और आकांक्षा जाग्रत की, यद्यपि इसके लिए क्रान्ति का विचार उन्होंने प्रस्तुत नहीं किया। जैसा कि हेजन ने लिखा है, ‘उन्होंने ( पफ्रांस के लेखकों) क्रान्ति को उत्पन्न नहीं किया, लेकिन उन्होंने बड़ी प्रखरता से क्रान्ति के कारणों को उद्घाटित किया, उन पर ध्यान केन्द्रित किया, बहस-मुबाहिसे का माहौल बनाया, तथा जनआवेश को जाग्रत किया। फ्रांस की क्रान्ति की पृष्ठभूमि में, अठारहवीं शताब्दी के तीन फ्रांसीसी विचारक महत्त्वपूर्ण हैं- मान्तेस्क्यू (Montesquieu), वॉल्तेयर (Voltaire), एवं रूसो (Rousseau)। मान्तेस्क्यू (1689-1755) की प्रसिद्ध कृति थी ‘दी स्पिरिट ऑफ लॉज’ (The Spirit of Laws), जिसका प्रकाशन 1748 में हुआ था। इस पुस्तक ने जबर्दस्त लोकप्रियता हासिल की और अठारह महीनों में इसके बाईस संस्करण छप गए। यह राजनीतिक दर्शन की पुस्तक थी और शासन की विभिन्न पद्धतियों का, इसमें बड़े वस्तुनिष्ठ एवं सन्तुलित तरीके से मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया था विभिन्न शासन-पद्धतियों के विश्लेषण के पश्चात् मान्तेस्क्यू ने इस पुस्तक में इंग्लैण्ड की ‘संवैधानिक राजतन्त्र’ (constitutional monarchy) पद्धति को श्रेष्ठतम घोषित किया, क्योंकि वह नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का सम्मान करती थी। मान्तेस्क्यू ने प्रशासन पद्धति में कुशलता के लिए सरकार की तीनों शक्तियों विधायी (legislative),।कार्यकारी (executive) तथा न्यायिक (judicial) के सावधानीपूर्वक विभाजन पर बल दिया। तत्कालीन फ्रांस की प्रशासनिक अव्यवस्था में इस प्रकार के सुधार की सख्त आवश्यकता थी। मान्तेस्क्यू शासन में निरंकुशतावाद के खिलाफ था, लेकिन वह प्रजातान्त्रिक पद्धति की सफलता के प्रति भी आश्वस्त नहीं था उसके अनुसार प्रजातन्त्र की सफलता उस देश की जनता के राजनीतिक गुणों पर निर्भर रहती है, अन्यथा उसके भीड़तन्त्र में बदलकर भ्रष्ट होने की सम्भावनायें अधिक रहती हैं। मांतेस्क्यू ने निरंकुशतावाद तथा भीड़तन्त्र के मध्य एक सुनहरे मध्यममार्ग (golden mean ) को प्रस्तुत किया, जिसका उदाहरण उसके अनुसार ब्रिटिश संसदीय पद्धति में देखा जा सकता है। मान्तेस्क्यू ने अपनी दूसरी पुस्तक ‘पसियन लेटर्स’ (Persian Letters) में फ्रांस के समाज में व्याप्त विषमताओं, भ्रष्टाचार तथा बर्बरताओं का चित्रण किया है तथा निरंकुशतावाद के घातक परिणामों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

वॉल्तेयर ( 1694-1778) : फ्रांसुआ द वॉल्तेयर को अपनी तीक्ष्ण मेधा, प्रभावशाली लेखन तथा
अपने स्वतन्त्र निर्भीक स्पष्ट विचारों के कारण फ्रांस में ‘प्रबोधन के युग’ (The Age of Enlightenment) का नेता माना जाता है। वह यूरोपीय इतिहास के चुनिंदा मस्तिष्कों में से एक था और उसके नाम को एक युग के साथ जोड़ा जाता है। यूरोप में प्रबोधन के युग में वॉल्तेयर का वही महत्त्व है जो कि पुनर्जागरण काल में इरैस्मस का तथा धर्मसुधार के युग में लूथर का। सम्भवत: इसीलिए लोगों ने उसे ‘राजा वाल्तेयर’ (King Voltaire) की उपाधि दी।

वॉल्तेयर बुद्धि की स्वाधीनता एवं विचार की स्वतन्त्रता का प्रबल समर्थक था। हेजन के शब्दों में,
‘संसार ने उससे अधिक मुक्त एवं निर्भीक आत्माओं को प्रायः नहीं देखा है। वाल्तेयर की लेखन-क्षमता एवं प्रतिभा अद्भुत थी। वह एक कवि, आलोचक, इतिहासकार, नाटककार व्यंग्यकार, उपदेशक, यहाँ तक कि वैज्ञानिक लेखक भी था। पच्चीस वर्षों के अन्तराल में उसने फ्रांस को अपनी बहुविध रचनाओं से आप्लावित कर दिया- कविताएँ, लेख, नाटक, इतिहास, पत्र, व्यंग्य-रचनायें, दार्शनिक कथायें, प्रहसन, चर्च- विरोधी विज्ञप्तियाँ, देववादी (deistic) आख्यान आदि। वह वास्तव में अपने युग का ‘बौद्धिक नियंता’ था। उसकी सबसे अधिक प्रभावशाली रचनायें उसके निबन्ध तथा उसके पत्र थे।

वॉल्तेयर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से फ्रांस की तत्कालीन व्यवस्था की विद्रूपताओं, बर्बरताओं
तथा आडम्बरपूर्ण गतिविधियों की दो टूरक आलोचनायें कीं। उसकी इस स्पष्टवादिता से फ्रांस की सरकार नाराज हो गई तथा उसे दो बार गिरफ्तार करके बास्तील के दुर्ग की जेल में रखा गया। कुछ समय के लिए उसे फ्रांस से निर्वासित भी रहना पड़ा। लेकिन वॉल्तेयर ने अपनी लेखनी का क्रम जारी रखा मैजेनिस एवं ऐपल के।अनुसार, ‘उसकी रचनाओं ने फ्रांसीसियों में अपनी सरकार में सुधार करने की आवश्यकता की चेतना जगाई। वॉल्तेयर ईसाई धर्मशास्त्र एवं चर्च व्यवस्था का कट्टर आलोचक था उसके अनुसार, चर्च आडम्बर, असहिष्णुता एवं पूर्वाग्रह युक्त मानसिकता के केन्द्र थे। चर्च ने विगत शताब्दियों में मनुष्य के विवेक और उसकी स्वतन्त्र विचारशक्ति को कुण्ठित किया है, और अनेक प्रकार की बर्बरताओं और अत्याचारों को जन्म।दिया है। वॉल्तेयर का कहना था कि सारे पादरी ढोंगी और पाखण्डी हैं तथा ईसाइयत में वर्णित चमत्कार (miracles) तथा रहस्योद्घाटन (revelations) मनुष्य की भ्रमात्मक कल्पनायें। वॉल्तेयर ईसाई या हिब्रू धर्म।के ईश्वर में विश्वास नहीं करता था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह नास्तिक था। वह ‘देववाद’ (Deism)।में विश्वास करता था। ‘देववाद’ यूरोप में प्रबोधन के युग में प्रचलित हुई एक धार्मिक विचारधारा थी जिसका प्रारम्भ इंग्लैण्ड में हुआ था देववाद का अर्थ है-प्रकृतिमूलक धर्म (natural religion)। देववाद प्रकृति में अन्तर्हित ईश्वर को मानता है जो ब्रह्माण्ड की सभी प्राकृतिक शक्तियों एवं नियमों का कारक है।


अपनी कृति ‘लेटर्स आन दि इंग्लिश’ (Letlers on the English) में वॉल्तेयर ने इंग्लैण्ड में प्रचलित विचार-स्वातन्त्र्य की प्रशंसा करते हुए, अप्रत्यक्ष रूप से, उन प्रांसीसी प्रतिक्रियावादियों की आलोचना
की जो सुधार का विरोध कर रहे थे अपनी पुस्तक ‘एन एसे आन कस्टम्स फ्रॉम दि टाइम ऑफ शालेंमन टू TT (An Essay on Customs From the Time of Charlemagne to Our Own Day) में वॉल्तेयर ने सभ्यता का इतिहास लिखा है, जो आधुनिक दृष्टि से ओतप्रोत माना जाता है। इस रचना में वॉल्तेयर ने प्रबोधन के युग के विचारों को बड़े पारदर्शी रूप में प्रस्तुत किया है।

वॉल्तेयर मूलत: एक राजनीतिक विचारक नहीं था। उसने फ्रांस की राज्य- व्यवस्था में प्रचलित बुराइयों की आलोचना की, लेकिन एक संस्था के रूप में वह राजतन्त्र का विरोधी नहीं था। वह ‘प्रबुद्ध (Enlightened) तथा शुभकारी (Benevolent) निरंकुशतावाद (despotism)’ में विश्वास रखता था। वह प्रजातन्त्र में आस्था नहीं रखता था। उसका कहना था कि वह सैकड़ों चूहों को बजाय एक शेर द्वारा शासित होना पसन्द करेगा। रूसो (1712-1778): जॉ जैक रूसो (Jean Jacques Rousseau) ने अपने क्रान्तिकारी राजनीतिक एवं सामाजिक दर्शन के माध्यम से फ्रांस एवं यूरोप के वैचारिक परिदृश्य पर अपनी बौद्धिक मौलिकता की एक अनूठी छाप छोड़ी है। जहाँ मान्तेस्क्यू और वाल्तेयर का रुख सुधारात्मक था अर्थात् वे व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य के हित में तत्कालीन व्यवस्था में सुधार की माँग कर रहे थे, वहाँ दूसरी ओर, रूसो का दृष्टिकोण आमूलचूल परिवर्तन के पक्ष में था, क्योंकि उसके अनुसार समाज का नये सिरे से पुनर्गठन ही मनुष्य को वास्तविक स्वतन्त्रता एवं समानता प्रदान कर सकता है।

रूसो की सबसे प्रसिद्ध कृति है-‘सामाजिक अनुबन्ध’ (Social Contraet), जो राजनीतिक चिन्तन की एक क्रान्तिकारी एवं महत्त्वपूर्ण रचना मानी जाती है। रूसो की इसी पुस्तक ने फ्रांस की क्रान्ति का मुख्य आदर्श वाक्य या नारा प्रदान किया-“स्वतन्त्रता, समानता एवं बन्धुत्व” (Liberyy Equality and Fraternity)”I रूसो ने अपनी उक्त पुस्तक ‘सामाजिक अनुबन्ध’ में स्पष्टत: प्रजातान्त्रिक सरकार की अवधारणा को प्रस्तुत किया। उसने प्रजातन्त्र की दो मूलभूत आवश्यकताओं पर बल दिया-जनता की प्रभुसत्ता तथा सभी नागरिकों के समान अधिकार। पुस्तक के प्रारम्भ में ही रूसो ने कहा है कि, “मनुष्य स्वतन्त्र पैदा हुआ था और अब सब तरफ से बंधनों में बंधा हुआ है” (Man was bom free and is everywhere in chains )।

अपनी मौलिक मुक्त अवस्था को त्याग कर मनुष्य ने सरकार के बन्धन को स्वीकार किया । लेकिन कोई भी।सरकार एक ‘सामाजिक अनुबन्ध’ पर आश्रित होती है जिसके अनुसार एक व्यक्ति, समाज के सभी सदस्यों की सहमति से, किसी केन्द्रीय सत्ता के प्रति अपने अधिकारों का समर्पण करता है। यदि कोई शासक जनता।की प्रभुसत्ता को अस्वीकार करता है तो वह उक्त ‘सामाजिक अनुबन्ध’ का उल्लंघन करता है; ऐसी स्थिति में जनता को यह स्वाभाविक अधिकार है कि वह ऐसे शासक को हटा दे। रूसो को शीघ्र ही आधुनिक प्रजातन्त्र।एवं गणतन्त्रवाद के पिता के रूप में देखा जाने लगा। रूसो के विचार यूरोप की तत्कालीन राजतन्त्रात्मक।सरकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थे । रूसो के विचार फ्रांस में क्रान्ति की घटनाओं के सबसे महत्त्वपूर्ण।प्रेरणास्रोत बन गये और हेजन के अनुसार, ‘रूसो के सिद्धान्तों ने बड़े सशक्त ढंग से क्रान्ति की गतिविधियों को प्रभावित किया सिन्डर के शब्दों में, ‘रूसो ने प्रजातन्त्र को स्पष्टत: मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों से सम्बद्ध किया, एक अवधारणा के रूप में उसे व्यवस्थित किया, तथा उसे एक दिशा प्रदान की। बल्कि उसके (रूसो के) अनुसार, प्रजातन्त्र मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार ही नहीं है, अपितु उसकी आत्मिक प्रकृति की।दृष्टि से भी श्रेष्ठतम है।’

रूसो ‘नैसर्गिक मनुष्य’ (natural man) के अस्तित्व में विश्वास रखता था उसका नारा था’प्रकृति
की ओर लौटो’ (Back to Nature)। रूसो का मानना था कि मनुष्य अपनी प्रारम्भिक नैसर्गिक अवस्था में मुक्त एवं प्रसन्न था। बाद में सभ्यता के विकास ने, अपने विचारों, कानूनों एवं संस्थाओं के माध्यम से मनुष्य।को दुष्टता एवं वेदना की स्थिति में ला दिया। इसलिए रूसो ऐतिहासिक ज्ञान के प्रति, वितृष्णा का भाव रखता।था। उसका मानना था कि सभ्यताओं ने, मनुष्य की प्रकृतिस्थ श्रेष्ठ न्यायपूर्ण तथा प्रसन्न अवस्था को, भ्रष्ट तथा पतनोन्मुख किया है। अपने एक महत्त्वपूर्ण निबन्ध ‘डिस्कोर्सेस ऑन आर्ट्स एवं साइंसेज’ (Discourses on Aris and Science) में रूसो ने प्रारम्भिक मानव की नैसर्गिकता और स्वभावमूलक श्रेष्ठता की तुलना सभ्य।मनुष्यों की कृत्रिमता तथा उनकी उपार्जित दुष्टता से की है, और ‘प्रकृति’ की ओर मनुष्य के पुनरागमन (A return to “nature”) के सुख एवं आह्वाद को चित्रित किया है ।

रूसो ने अपनी एक दूसरी पुस्तक ‘एमिल’ (Emile) में एक नवीन शिक्षा पद्धति की अनुशंसा की है।
उसके अनुसार, बच्चों पर पूर्वनिर्धारित कृत्रिम पाठ्यक्रमों की शिक्षा नहीं लादनी चाहिये, बल्कि उन्हें अपनी।स्वाभाविक अभिरुचियों के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। रूसो का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे विद्यार्थियों की विचारशक्ति एवं तर्क्षमता विकसित हो। रूसो ने लैटिन और यूनानी भाषाओं को सीखने के बजाय, व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकता पर बल दिया।

06 वित्तीय संकट

फ्रांस की क्रान्ति का तात्कालिक कारण प्रांस की सरकार का वित्तीय संकट था जिसके समाधान के लिए लुई सोलहवें को 1789 में ‘एस्टेट्स-जनरल’ (फ्रांस के तोनों एस्टेट्स’ या सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों की सभा) का अधिवेशन बुलाना पड़ा।

लुई चौदहवें और लुई पन्द्रहवें के शासन-काल में फ्रांस के अनेक युद्धों में संलग्न रहने के फ्रांसीसी सरकार की आर्थिक हालत बहुत शोचनीय हो गई थी अपनी इस दयनीय आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए सरकार को अनेक बार ऋण लेने पड़े और उसका परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय आय का लगभग आधा हिस्सा ऋणों पर ब्याज चुकाने में ही चला जाता था इसके अलावा राष्ट्रीय आमदनी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा वस्साय के महल की शानौशौकत और विलासिता में खर्च हो जाता था। राष्ट्रीय खर्चा प्राय: राष्ट्रीय आमदनी से अधिक होता था, और इससे उत्पन्न घाटे को पूरा करने के लिए पुन: ऋण लिया जाता था। लुई सोहलवें के काल में, बारह वर्षों के अन्तराल में (1776 से 1788) राष्ट्रीय ऋण की मात्रा बढ़कर लगभग 60 करोड़ डॉलर हो गयी। सरकार आर्थिक दिवालियेपन की स्थिति में आ गई, लोग सरकार को और ऋण देने केलिए तैयार नहीं थे ऐसी स्थिति में वित्तीय हालत को दो ही तरीके से सुधारा जा सकता था-करों में वृद्धि के द्वारा, या खर्चों में कटौती के द्वारा । फ्रांस के विशेषाधिकार युक्त वर्ग, कुलीनतन्त्र तथा पादरीतन्त्र, प्रत्यक्ष करों के भुगतान से मुक्त थे। वे वित्तीय संकट की अवस्था में भी, किसी भी प्रकार का कर भार नहीं लेना चाहते थे तृतीय एस्टेट के लोग पहले ही करों के बोझ से बुरी तरह दबे हुए थे। दूसरी ओर वसाय के राजदरबार के खर्चो में कटौती के लिए रानी मेरी एन्तोइनेत तथा अन्य लोग तैयार नहीं थे। इस स्थिति का समाधान कैसे हो ?

लुई सोलहवें ने, अपने राज्यकाल के आरम्भ से ही, वित्तीय संकट को सुलझाने की दिशा में कुछ
प्रयास किये थे, लेकिन वे सफल नहीं हो पाये लुई सोलहवें ने सन् 1774 में फ्रांस की वित्तीय व्यवस्था का नियन्त्रण एक बहुत ही योग्य एवं प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति, तुरगौ (Turgot) के हाथों में सौंपा। उसे फ्रांस का वित्तीय प्रबन्धक (Comptroller-general) बनाया गया । तुर्गों ने अपने आर्थिक कार्यक्रम की घोषणा की-‘न दिवालियापन, न करों में वृद्धि, न और अधिक ऋण’ (No bankruptcy, no increase of taxation, no more borrowing)। तु्गों ने इसके बाद आर्थिक सुधार के अनेक कार्यक्रम आरम्भ किये। तुर्गों का ध्येय था कि कृषि, उद्योग एवं वाणिज्य में उंदारीकरण द्वारा राष्ट्रीय सम्पदा को बृद्धि की जाये और इस प्रकार राष्ट्रीय आय कारण का विस्तार किया जाये। दूसरी ओर, तुर्गों राज्य के अनावश्यक खर्चों को कम करना चाहता था। तु्गों फ्रांस की वित्तीय व्यवस्था को सुधारने की दिशा में बहुत सफलतापूर्वक आगे चल रहा था, लेकिन उसके द्वारा दरबार के खर्चों में कटौती किये जाने तथा सुविधाभोगी वर्ग के लोगों की पेंशनों में कमी किये जाने से, रानी एन्तोइनेत तथा विशेषाधिकार युक्त वर्ग के दरबारी लोग, तुर्गों से नाराज हो गये और उन्होंने लुई सोलहवें पर दबाव डालकर दो वर्ष के अन्तराल में ही, सन् 1776 में, तुर्गों को अपने पद से हटवा दिया। लुई सोलहवें ने तुगों के बहुत से सुधार कार्यक्रमों को भी वापिस ले लिया इस प्रकार, सिन्डर के शब्दों में, ‘उसने (लुई सोलहवें) स्वयं ही अपने विनाश को सुनिश्चित कर लिया ‘ हेजन के अनुसार दोनों शासकों ने बड़ी दुःखद गलती की, लुई सोलहवें ने इच्छा शक्ति में कमी के कारण तथा मेरी एन्तोइनेत ने अपनी हठधर्मिता के कारण।’ तुरौ जैसे योग्य एवं सफल व्यक्ति ‘ तु्गों के स्थान पर सन् 1776 में नेकर (Necker) को फ्रांस का वित्तीय प्रबन्धक नियुक्त किया गया।
नेकर ने खर्चों में कटौती एवं नए ऋणों के माध्यम से फ्रांस की वित्तीय स्थिति को सुधारने का प्रयास किया।

लेकिन 1778 में फ्रांस द्वारा अमेरिका उपनिवेशवासियों की इंग्लैण्ड के विरुद्ध युद्ध में सहायता करने से, फ्रांस की वित्तीय स्थिति और खराब हो गई । 1781 में नेकर ने फ्रांस की जनता से आर्थिक सहायता की अपील करते हुए सरकार की वार्षिक आय एवं वार्षिक खर्चे के विवरण को प्रकाशित कर दिया। इस प्रकार के विवरण को इससे पूर्व गुप्त रखा जाता था इस विवरण में सरकार द्वारा सुविधाभोगी वर्ग के लोगों को दी जाने वाली पेंशनों की विशाल राशि भी शामिल थी कुलीनतनत्र के लोग इस विवरण के प्रकाशन से बहुत नाराज हुए और 1781।में उन्होंने नेकर को बर्खास्त करवा दिया। नेकर के बाद 1981 में चार्ल्स कैलोन (Charles Calonne) को फ्रांस का वित्तीय प्रबन्धक बनाया गया। वह खर्चों में कटौती के पक्ष में नहीं था, और सभी को प्रसन्न रखना चाहता था। वह अधिकाधिक ऋण लेने की नीति में विश्वास रखता था उसका मानना था कि ‘ऋण लेने के लिए अमीर दिखाई देना जरूरी है, और अमीर दिखने के लिए खुले हाथ से खर्च करना चाहिए ।’ कैलोन की मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण अगस्त, 1786 में फ्रांस का खजाना लगभग खाली हो गया, और अब फ्रांस की सरकार को ऋण देने के लिए कोई तैयार नहीं था। कैलोन ने फ्रांस को इस संकट से उबारने के लिए एक ऐसा सामान्य कर लगाने का प्रस्ताव रखा, जिसे सभी से-विशेषाधिकार युक्त वर्ग तथा सामान्य प्रजाजन दोनों से वसूल किया जाये। उसके उस प्रस्ताव से सुविधाभोगी वर्ग नाराज हो गया । कैलोन को भी इसके बाद उसके पद से हटा दिया गया।

वित्तीय संकट के समाधान के लिए लुई सोलहवें ने 1787 में ‘असेम्बली ऑफ नोटेबल्स’ (Assembly
of Notables) की एक सभा बुलाई। यह फ्रांस के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक सभा थी, जिसके लगभग 144 सदस्य थे। लुई को यह उम्मीद थी कि यह सभा विशेषाधिकार युक्त वर्गों पर कर लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे देगी। लेकिन इस सभा के सदस्यों ने राजा की बात को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि केवल ‘एस्टेट्स-जनरल’ के अधिवेशन में ही इस प्रकार की बात तय की जा सकती है।

फ्रांस की सरकार न तो कर में वृद्धि कर पा रही थी, न उसे नये ऋण मिलने की सम्भावना थी। लई
सोलहवें की स्थिति बड़ी विकट हो गयी। फ्रांस के वित्तीय संकट के निदान का कोई मार्ग नजर नहों आ रहा था। अंत में विवश होकर लुई ने ‘एस्टेट्स-जनरल’ के चुनाव कराकर उसका अधिवेशन बुलाने का निर्णय लिया। ‘एस्टेट्स- जनरल’ नामक प्रतिनिधि सभा की बैठक 175 वर्षों के अन्तराल के बाद बुलाई जा रही थी। ‘एस्टेट्स-जनरल’ फ्रांस की एक पुरानी संस्था थी, जिसमें फ्रांस के तीनों एस्टेट्स अर्थात् तीनों सामाजिक वर्गों पादरीतन्त्र, कुलीनतन्त्र तथा सामान्य जनता के प्रतिनिधि भाग लेते थे एस्टेट्स-जनरल फ्रांस की सरकार का एक वैधानिक अंग थी, यद्यपि 1789 से पूर्व इसकी सभा 1614 ई. में बुलाई गई थी (175 वर्ष।पूर्व)।’एस्टेट्स-जनरल’ की पहली सभा राजा फिलिप द्वारा सन् 1302 में आहूत की गई थी और उसके बाद 1614 ई. तक इसकी सभायें अनियमित अन्तराल से समय-समय पर बुलाई जाती रही। लुई ग्यारहवें (1461) के समय से ही फ्रांस के निरंकुश शासक ‘एस्टेट्स जनरल’ को उनकी सत्ता के ऊपर थोपा हुआ एक मध्यकालीन नियन्त्रण या कांटा मानते थे और इसकी सभाओं को न बुलाकर उनसे बचने का प्रयास करते थे,।विशेष सार्वजनिक विभ्रम या आर्थिक आवश्यकताओं के समय ही ‘एस्टेट्स- जनरल’ का अधिवेशन बुलाया जाता था। एस्टेट्स-जनरल के पास यद्यपि विधायी शक्ति नहीं थी, वह एक प्रकार की परामर्शदात्री सभा थी. लेकिन उसकी अनुशंसाओं को राजाओं द्वारा प्रायः स्वीकार किया जाता था । हटाना एक भारी भूल थी।

‘एस्टेट्स – जनरल’ पूरी तरह सामन्ती संस्था थी, क्योंकि इसके तीन सदनों में दो सदन विशेषाधिकार
युक्त वर्गों से सम्बद्ध थे जो बहुमत एवं बीटो के अधिकार द्वारा तृतीय एस्टेट की किसी भी माँग को स्वीकार।नहीं करते थे और अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित बनाये रखते थे। ‘एस्टेट्स-जनरल ‘ की मीटिंग में तीनों एस्टेट्स से सम्बन्धित सदन, का एक वोट, द्वितीय एस्टेट (कुलीन तन्त्र) के सदन का एक वोट, तथा तृतीय एस्टेट (जनसामान्य) के सदन का एक वोट। इस प्रकार से मतदान की प्रक्रिया में प्रथम दोनों एस्टेट्स के दो वोट तृतीय एस्टेट के एक वोट से, बहुमत के आधार पर भारी पड़ते थे।

लुई ने ‘एस्टेट्स- जनरल’ का अधिवेशन इस उम्मीद से बुलाया था कि सम्भवत: इसके माध्यम से देश के गम्भीर वित्तीय संकट का कोई समाधान निकल सके। दूसरी ओर, फ्रांस के प्रथम दोनों एस्टेट्स (पादरी तन्त्र तथा कुलीन तन्त्र) को यह विश्वास था कि एस्टेट्स-जनरल के अधिवेशन में पारम्परिक वोटिंग पद्धति से उन्हीं की जीत होगी और उनकी सुविधाओं में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा, उन पर किसी भी प्रकार का नया कर लगा पाना सम्भव नहीं होगा गुडविन (दि फ्रेंच रिवोल्यूशन) के अनुसार, ‘1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के तात्कालिक कारण कृषकों की आर्थिक वेदनाओं या मध्यमबर्ग के राजनीतिक असंतोष में निहित नहीं थे। वे निहित थे फ्रांस के कुलीन तन्त्र की प्रतिक्रियावादी अपेक्षाओं में …. क्रान्ति टाली जा सकती थी यदि कुलीनतन्त्र राजनीतिक एवं वित्तीय समानता के परिणामों को पहले ही स्वीकार कर लेता।’ 1789 में ‘एस्टेट्स- जनरल’ के अधिवेशन में फ्रांस के सुविधाभोगी वर्गों द्वारा अपने विशेषाधिकारों को, राष्ट्रीय हित के पक्ष में, रंचमात्र भी न त्यागने की हठधर्मिता के कारण ही, तृतीय एस्टेट के लोगों को अपना रास्ता स्वयं बनाना पड़ा और इसी से क्रान्ति की शुरुआत हुई। यह कुछ-कुछ वैसा ही किस्सा हो गया जैसा कि महाभारत के युद्ध से पूर्व हुआ था। युद्ध से बचने के लिए पाण्डवों ने दुर्योधन से उन्हें केवल पाँच ग्रामों का अधिकार देने को कहा था। लेकिन दुर्योधन मदान्ध एवं अडिग था, उसने कहलवाया कि पाँच ग्राम तो क्या, मैं पाण्डवों को सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा। इकाइयों के रूप में वोट देते थे, अर्थात् प्रथम एस्टेट (पादरी तन्त्र) के सदन के रूप में !

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