समुद्री मार्गो की खोज के 09 परिणाम

समुद्री मार्गो की खोज के 09 परिणाम

एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी महाद्वीप के अनेक देशों में पहुँचने के नवीन समुद्री मार्गों की खोजों ने यूरोप के जीवन में अनेक तात्कालिक एवं दूरगामी परिवर्तनों का सूत्रपात किया न केवल यूरोप में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में एक नयी हलचल की शुरूआत हुई। नये खोजे गए क्षेत्रों पर यूरोप के देशों ने एक प्रकार का व्यापारिक एवं सांस्कृतिक आक्रमण सा कर दिया, उनके उपनिवेशीकरण एवं शोषण का एक दीर्घकालीन.सिलसिला आरम्भ हुआ, आधुनिकता के छद्म प्रसार के नाम पर एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिका महाद्वीप के.अनेक देशों को श्रीविहीन कर दिया गया । दूसरी ओर, यूरोप के देशों की आर्थिक समृद्धि बहुत बढ़ गई, वहाँ.की उपभोक्ता जीवन शैली के रंग बदल गए, वाणिज्यवाद एवं पूँजीवाद का बोलबाला हो गया, साम्राज्यवादी.प्रतिद्वन्द्विता को शुरूआत हुई जिसकी अंतिम परिणति लोमहर्षक युद्धों एवं रक्तपात में हुई जो भी हो, इस.सारी प्रक्रिया का एकमात्र सुखद परिणाम यह रहा कि विश्व-ज्ञान का विस्तार हुआ, एक इकाई के रूप में.सम्पूर्ण विश्व की पहचान कर ली गई, और विश्व के देशों में क्रमशः आधुनिक चेतना का सूर्योदय हुआ।.कालान्तर में उपनिवेशवाद के खिलाफ नये क्षेत्रों में प्रतिक्रियाएँ हुईं, उनका स्वाभिमान जगा, वहाँ मुक्ति संग्राम हुए, और धीरे-धीरे स्वतन्त्र राष्ट्रों के रूप में उन्होंने अपनी पहचान स्थापित कर ली।

01 व्यापारिक क्रान्ति का सूत्रपात

एशिया,अफ्रीका एवं अमेरिकी महाद्वीप के अनेक देशों तक पहुँचने के समुद्री मार्गों ने यूरोप में व्यापारिक एवं वाणिज्यिक क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया। विविध नये क्षेत्रों की खोज से व्यापारिक माल की खपत एवं माँग बहुत अधिक बढ़ गई, और व्यापार के विस्तार की सम्भावनाओं का एक नया आकाश खुल गया। यूरोप के देशों में अनेक बड़ी-बड़ी व्यापारिक कम्पनियों की.स्थापना हुई, जैसे-डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी, ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी आदि। पूर्वी देशों से मसाले, सूती कपड़े तथा रेशम का आयात बड़े जोरशोर से किया जाने लगा, अमेरिकी महाद्वीप से सोने एवं चाँदी का दोहन किया जाने लगा यूरोप में इटली के व्यापारियों का पूर्वी देशों की वस्तुओं के व्यापार पर एकाधिकार समाप्त हो गया। अब व्यापार का केन्द्र भूमध्यसागरीय क्षेत्र के स्थान पर अटलांटिक महासागर के क्षेत्र में स्थापित हो गया। मध्यकाल के व्यापारिक केन्द्रों- फ्लोरेंस, जेनोआ, वेनिस, सिकंदरिया आदि का व्यापारिक महत्त्व अब बहुत कम हो गया, और एन्टवर्प लिस्बन, लंदन, कार्डिज, सेविले, पेरिस, एमस्टरडम आदि व्यापार के नये केन्द्र बन गए। 1869 में स्वेज नहर की स्थापना के काल तक, पूर्वी और पश्चिमी देशों के मध्य व्यापार का मुख्य मार्ग दक्षिणी अफ्रीका के छोर पर स्थित उत्तमाशा अंतरीक्ष से होकर जाता था। इस व्यापारिक मार्ग की खोज वास्कोडिगामा द्वारा की गई थी।

02 धात्विक धनसमृद्धि एवं वाणिज्यवाद

नये खोजे गये भौगोलिक क्षेत्रों से यूरोप के नाविकों एवं व्यापारियों ने विपुल मात्रा में बहुमूल्य धातु स्वर्ण एवं रजत का संचय किया, जिससे यूरोप की धात्विक धनसमृद्धि में एकाएक बहुत वृद्धि हो गई । मध्यकाल के दौरान यूरोप में सोने और चाँदी की मात्रा बहुत कम रही थी। अमेरिकी महाद्वीप के नवीन भौगोलिक क्षेत्रों मेक्सिको, पेरू आदि में स्वर्ण एवं रजत की खानों के.विपुल भण्डार थे। यूरोपीय देशों, विशेषकर स्पेन ने इन क्षेत्रों पर अपना सैनिक एवं राजनीतिक वर्चस्व स्थापित.कर यहाँ से बड़ी विशाल मात्रा में सोना एवं चाँदी इकट्ठा की और उसे अपने देश ले गए । यूरोप के देशों में,.सोने एवं चाँदी की भरपूर सम्पदा के आधार पर मुद्रा का अधिक निर्गमन आसान हो गया जिसके कारण मौद्रिक अर्थव्यवस्था को बहुत बढ़ावा मिला मुद्रा के अधिक प्रचलन से बैंकिंग व्यवस्था का विकास हुआ। पूँजी अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बन गई और पूँजीवाद का विकास होने लगा। यूरोपीय देशों के राजाओं ने.अपने देश में स्वर्ण एवं चाँदी के आगमन की प्रवृत्तियों को और प्रोत्साहित करने के लिए नवीन व्यापारिक वर्ग.को समर्थन प्रदान किया। ल्यूकस के शब्दों में, ‘निरंकुश राजकुमारों एवं वाणिज्यिक हितों के इस गठबंधन ने.पुनर्जागरण एवं आधुनिक युग का आरम्भ वाणिज्यवाद नामक नीति को जन्म दिया जिसने आगामी शताब्दियों में युद्ध, राजनय एवं उपनिवेशीकरण के क्षेत्रों में अपना आधिपत्य बनाए रखा।’

03 यूरोप की उपभोक्ता जीवन शैली में परिवर्तन

एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी महाद्वीप के नवीन क्षेत्रों की खोज एवं उनसे व्यापारिक सम्बन्धों की शुरूआत के बाद यूरोप के उपभोक्ता जीवन में अनेक नवीन वस्तुओं का आगमन हुआ, जैसे-चाय, काफी आलू, कोको, तम्बाकू, चाकलेट, ईख से बनने वाली शक्कर, चीनी मिट्टी, नील आदि। यूरोप की आर्थिक समृद्धि के कारण, लोगों में विलासिता की वस्तुओं की माँग भी बहुत बढ़ गई। इन सबका परिणाम यह हुआ कि यूरोपवासियों की जीवन शैली में बड़ा परिवर्तन आया; वे भौतिकवादी एवं विलासिताप्रिय हो गए।

04 उपनिवेशवाद का विकास

नये खोजे गए भौगोलिक क्षेत्रों के कारण मिलने वाले व्यापारिक एवं वाणिज्यिक लाभ को दृष्टिगत रखते हुए, यूरोपीय देशों ने आर्थिक लाभ की प्रक्रिया को अनवरत बनाए रखने के लिए, इन क्षेत्रों में अपना सैनिक एवं राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका, अमरीका एवं एशिया के नवान्वेषित क्षेत्रों का ठपनिवेशीकरण आरम्भ हुआ। इन क्षेत्रों में यूरोपीय देशों ने अपनी बस्तियाँ बना ली, और अपनी सैनिक कुशलता एवं कूटनीतिक चातुर्य के आधार पर स्थानीय प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। इस प्रकार उपनिवेशवाद के युग का आरम्भ हुआ। उपनिवेश स्थापित करने में भौगोलिक खोजों के अग्रगामी देशों-पुर्तगाल एवं स्पेन ने पहल की। बाद में यूरोप के अन्य देश-पफ्रांस, हालैण्ड, इंग्लैण्ड, इटली आदि भी उपनिवेश स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गए ।

05 साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ एवं प्रतिद्वन्द्विताएँ

एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के नए खोजे गए।.क्षेत्रों में यूरोपीय शक्तियों द्वारा उपनिवेश स्थापित करने की प्रक्रिया ने, उनकी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की.आग में घी का काम किया उपनिवेशों से मिलने वाले विपुल लाभ को देखते हुए, यूरोप के राज्यों की राष्ट्रवादी.चेतना विकासमान होकर साम्राज्यवादी स्वरूप ग्रहण करने लगी। यूरोपीय राज्यों ने नवनिर्मित क्षेत्रों को अपनी साम्राज्यवादी शिकंजे में जकड़ना प्रारम्भ किया और उन क्षेत्रों के स्थानीय लोगों की सहायता से वे अपने साम्राज्य का विस्तार करने की दौड़ में लग गए, जिसने आपसी प्रतिद्वन्द्विताओं एवं संघर्ष को जन्म दिया ।

यूरोपीय राज्यों की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं ने उपनिवेशों के आर्थिक शोषण की प्रक्रिया को घनीभूत.बनाया, दास व्यापार को बढ़ावा दिया, एवं यूरोपीय राज्यों में पारस्परिक अविश्वास एवं संघर्ष की स्थिति को.विकट बना दिया। साम्राज्यवादी आकांक्षाओं एवं प्रतिद्वन्द्विताओं के मूल में उपनिवेशवाद था और उपनिवेशवाद के मूल में था नये खोजे गये भौगोलिक क्षेत्रों की समृद्धि का आकर्षण।

06 उपनिवेशों का आर्थिक शोषण एवं दास व्यापार

नवीन क्षेत्रों की भौगोलिक खोजों की एक घृणित परिणति उपनिवेशों के आर्थिक शोषण एवं दास व्यापार के रूप में हुई । यूरोपीय शक्तियों द्वारा किए गए अविरल दोहन के कारण एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी महाद्वीप के अनेक देश समृद्धि से दरिद्रता की कगार पर आ गये। स्वयं भारत इसका उदाहरण है जहाँ ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण भारत से धन का निर्गम ( ड्रेन ऑफ वेल्थ) हो गया, और सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत गरीबी की चपेट में आ गया। उपनिवेशों की स्थापना के बाद, दासों का व्यापार बड़े संगठित तरीके से एवं वैधानिक रूप में किया जाने लगा। अमरीकी उपनिवेशों में मजदूरों की बहुत कमी थी, अत: अफ्रीका से बड़ी भारी संख्या में नीग्रो लोगों को दास बनाकर शक्कर के कारखानों तथा गर्ने, तम्बाकू एवं कपास के खेतों में लगा दिया गया। अफ्रीकी गुलामों के इस आयात से ईसाई धर्म प्रचारकों ने भी विरोध नहीं किया। यूरोपीय देशों की सरकारें दास व्यापार के लिए कम्पनियों को लाइसेंस प्रदान किया करती थी दक्षिणी अमेरिका तथा वेस्टइंडीज के स्पेनी, पुर्तगाली एवं ब्रिटिश उपनिवेशों में भी भारी संख्या में अफ्रीकी दासों को काम पर लगाया गया इन दासों के साथ बड़ा क्रूर एवं अमानवीय व्यवहार किया जाता था।

07 ईसाई धर्म का प्रचार


ईसाई धर्म के प्रचारक भी नवीन भौगोलिक क्षेत्रों में बड़ी त्वरित गति से पहुँच गये और उन्होंने इन क्षेत्रों में तथाकथित ‘असभ्य’ मूल निवासियों को ईसाइयत में दीक्षित करने का अभियान छेड़ दिया। कुछ उपनिवेशों में सैनिक शक्ति के दबाव में, स्थानीय निवासियों को ईसाई धर्म स्वीकारने के लिए विवश किया गया मध्यकाल में हुए धर्मयुद्धों में विफलता के कारण, ईसाई धर्माधिकारियो का जोश कुछ ठंडा पड़ गया था और विश्व को ईसाइयत का पाठ पढ़ाने का उनका स्वप्न अधूरा रह गया था। पुनर्जागरण युग में भी चर्च की प्रतिष्ठा में अपेक्षाकृत कुछ कमी आई थी। लेकिन नवीन क्षेत्रं में धर्मप्रचार की सम्भावना ने ईसाई धर्माधिकारियों में एक नवीन जोश का संचार कर दिया पश्चिमी देशों द्वारा इस काल में उपनिवेशीकृत अनेक देशों में आज भी ईसाई धर्म के प्रभूत अनुयायी हैं। यह ईसाई धर्म प्रचारकों का ही कार्य था ।

08 पश्चिमी संस्कृति का प्रसार

एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिकी द्वीप के नये खोजे गये भौगोलिक क्षेत्रों में यूरोपवासियों के पहुँचने के साथ ही पश्चिमी संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान का इन क्षेत्रों में धीरे धीरे प्रसार हुआ और इन देशों में आधुनिक चेतना के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह एक ऐतिहासिक संयोग है कि पुनर्जागरण युग में यूरोप की जड़वादी मानसिकता को तोड़ने में, धर्मयुद्धों के माध्यम से यूरोपवासियों को उपलब्ध हुए पूर्वी देशों के उदारवादी विचारों के सम्पर्क ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । बाद में इन्हीं प्रेरक विचारों के आधार पर यूरोप में आधुनिक चेतना की नींव रखी गई जिसके तीन आधार स्तम्भ थे बुद्धिवाद, मानववाद एवं वैज्ञानिक मन:स्थिति । ये विचार विकसित होकर अब यूरोपवासियों के माध्यम से पुन: पूर्वी देशों में प्रसारित हुए और वहाँ आधुनिकता के उत्कर्ष की आधारभूमि बने । यूरोपियनों ने उपनिवेशों में अनेक शिक्षण-संस्थान स्थापित किए, यद्यपि उसके पीछे उनका प्रयोजन प्रशासन में उन्हें सहयोग देने के लिए, एक स्थानीय शिक्षित नौकरशाह वर्ग का निर्माण करना था। लेकिन प्रकारान्तर से इन शिक्षण संस्थानों के माध्यम से उदारवादी सिद्धान्तों का प्रसार हुआ, जिन्होंने कालान्तर में स्थानीय निवासियों को अपने अधिकारों के प्रति चेतनशील एवं जागरूक बनाने में मदद की।

09 विश्व ज्ञान का विस्तार

पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से प्रारम्भ होकर अठारहवीं शताब्दी तक चले समुद्री मार्गों के अन्वेषण एवं नये भौगोलिक क्षेत्रों की खोज के अभियान ने सम्पूर्ण विश्व के बारे में मानव के ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि की। पूरे विश्व को खोज लिया गया, महाद्वीपों, उनमें स्थित देशों, विशाल समुद्रों, खाड़ियों, द्वीपों, जलडमरूमध्यों आदि की पहचान कर ली गई । संसार के विविध क्षेत्रों के भौगोलिक ज्ञान के साथ-साथ मानव के सांस्कृतिक ज्ञान में भी वृद्धि हुई। पश्चिमी विचारकों ने प्राचीन भारतीय संस्कृति के देदीप्यमान स्वरूप को जाना, उसे पहचाना, लेकिन उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार करने में उन्हें हिचकिचाहट हुई। पश्चिमी देशों ने अपनी संस्कृति को ्रेष्ठ सिद्ध करने का अभियान छेड़ दिया, और अनेक उपनिवेशों में उन्होंने विसांस्कृतिकरण अर्थात् उन देशों की मूल संस्कृति को नष्ट करने की दिशा में अनेक प्रयास किए। संस्कृतियों की टकराहट ने सांस्कृतिक चिन्तन की प्रक्रिया को घनीभूत किया, भारत में इस सिलसिले में धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन हुए।

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