पूर्वी समस्या एवं यूरोप के लिए उसकी जटिलता

पूर्वी समस्या एवं यूरोप के लिए उसकी जटिलता

17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक तुर्की या ओटोमन साम्राज्य का यूरोप में बर्चस्व था। अपने उत्कर्ष काल
में तुर्की या ओटोमन साम्राज्य और अरब में तुर्कों का राज्य एशिया में था। बोसनिया, सर्बिया, यूनान, रोमानिया, बल्गेरिया आदि क्षेत्र पूर्वी यूरोप में शामिल थे। यूरोपीय इस क्षेत्र को ‘बाल्कन प्रायद्वीप’ (Balkan Peninsula) कहते हैं। अफ्रीका में मिस्र तुर्की साम्राज्य के अधीन था। 18वीं और 19वीं शताब्दी में यह साम्राज्य अवसान की ओर बढ़ गया। इस प्रकार यूरोपीय क्षितिज से तुर्की के गायब होने के साथ-साथ यह प्रश्न खड़ा हुआ कि अब तु्को का स्थान कौन ग्रहण करे ? तुर्की के यूरोपीय क्षितिज से विलुप्त होने से उत्पन्न रिक्तता को भरने की समस्या यूरोपीय इतिहास में ‘पूर्वी समस्या या पूर्वी प्रश्न’ (Eastern Question or Problem) के नाम से जानी जाती है।

तुर्की साम्राज्य के विभाजन से उद्भूत इस पूर्वी समस्या को यूरोपीय इतिहासकारों ने अलग-अलग ढंग
से परिभाषित किया है। मिलर कहता है कि, “पूर्वी समस्या यूरोप से धीरे-धीरे समाप्त होते हुए तुर्की साम्राज्य के रिक्त स्थान की पूर्ति की समस्या थी ।” सी.डी. हेजन ने लिखा है कि “पूर्वी समस्या प्रमुखतया यूरोपीय तुर्की के भाग्य की समस्या थी।” मार्ले की मान्यता है कि “पूर्वी समस्या बहुत जटिल, उलझी हुई तथा विभिन्न राष्ट्रं के परस्पर विरोधी हितों से सम्बन्धित थी। एक रूसी विद्वान ने तो पूर्वी समस्या की तुलना गठिया रोग से कर।डाली, जो कभी हाथों को जकड़ लेता है तो कभी पैरों को। यह पेट में प्रवेश न कर पाए तो इसे सौभाग्य मानना होगा।

मध्यकाल में तुर्की साम्राज्य का उदय हुआ। सुलेमान सम्राट के शासन काल में तुर्क साम्राज्य की तूता
विश्व में बोलती थी। दक्षिणी-पूर्वी यूरोप पर तुर्कों का वर्चस्व था । इस क्षेत्र में स्लाव, बल्गार, सर्व आदि ईसाई जातियाँ निवास करती थीं 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दो परिवर्तन हुए- 1. रूस की साम्राज्ञी (जारीना कैथरीन द्वितीय) ने साम्राज्य विस्तार करते हुए सीमा को कालासागर से अजोव तक पहुँचाया, 2. फ्रांस की क्रान्ति एवं नेपोलियन की विजय ( राष्ट्रवाद के सिद्धान्त) से यूरोप प्रेरित हुआ।

बाल्कन प्रायद्वीप में अनेक जाति के लोग নिवास करते थे जिनकी भाषाएँ अलग-अलग थीं, उनमें
राष्ट्रीयता का भाव विकसित होने लगा इस प्रकार ईसाई बाहुल्य बाल्कन प्रदेश में तुर्कों का शासन असहनाय होने लगा। इसी समय तुर्की साम्राज्य अवसान की ओर बढ़ने लगा।

19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में तुर्की साम्राज्य (ऑटोमन साम्राज्य) के पतनोन्मुख होने के कारण बाल्कन
में उत्पन्न रिक्तता को भरने के लिए कई ताकतों ने प्रयास शुरू किया।

रूस और ऑस्ट्रिया का बाल्कन से निकट सम्बन्ध था। रूस का सम्राट स्लाव जाति से सम्बन्ध रखता
था। रूस की अधिकांश जनता आर्थाडाक्स चर्च की अनुयायी थी और बाल्कन में निवास करने वाले ईसाई भा इसी चर्च में विश्वास प्रकट करते थे इस प्रकार रूस बाल्कन लोगों से जातीय, सांस्कृतिक और धार्मिक निकटता दिखाकर वहाँ के लोगों का सहयोग करने के बहाने स्वयं का प्रभाव बढ़ाना चाहता था। ऑस्ट्रिया अपने दक्षिण-पूर्व में विस्तार करना चाहता था, अतः वह बाल्कन प्रदेश में रूस का प्रतिद्न्दी हो गया। फ्रांस एवं इंग्लैण्ड भी बाल्कन में रुचि बनाये हुए थे । जर्मनी अपने एकीकरण से पहले पूर्वी समस्या में रुचि नही लेता था। एकीकरण के बाद भी बिस्मार्क ने घोषणा की कि वह जर्मनी का विस्तार नहीं चाहता है। परन्तु, 1878 में जब तुर्की समस्या के निपटार के लिए बलिन कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो बिस्मार्क को उसका फलक एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका में फैला हुआ था। मेसोपोटामिया, ईरान पूर्वी समस्या एवं यूरोप के लिए उसकी जटिलताएँ प्रधान बनाया गया और नहीं चाहते हुए भी उसका आस्ट्रियां का पक्ष लेना पड़ा, क्योंकि वह रूस के प्रभाव को रोकना चाहता था। इस प्रकार 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ की ‘पूर्वी समस्या’ ने जटिलतम रूप से यूरोप की महाशक्तियों को परस्पर उलझाये रखा। यह एक दीर्घकालीन, रक्तरंजित, कोलाहलपूर्ण, जटिल एवं शौर्यपूर्ण यूरोपीय इतिहास की गाथा बन गयी।

सर्बिया राष्ट्रीय आन्दोलन (1804-17 ई.)

तर्की आधिपत्य में निवास करने वाली जातियों के साथ उन्होंने अच्छा बर्ताव नहीं किया। इसलिए उन
जातियों ने अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष किया सबसे पहले सर्व जाति ने तुर्की सत्ता के खिलाफ विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया। कारा जॉर्ज की अगुवाई में 1804 में विद्रोह का शंखनाद किया। 1812 ई. में रूस ने भी इसका समर्थन किया, परन्तु इसी समय नेपोलियन द्वारा रूस पर हमला बोल देने के कारण जार को 1812 ई. में सन्धि करनी पड़ी। तुर्को ने उचित अवसर का फायदा उठाते हुए 1813 में सर्बिया को अपने अधिकार में पुनः ले लिया और कारा जॉर्ज की हत्या कर दी। सर्बिया निवासियों में इस घटना से पुनः आक्रोश उत्पन्न हो गया। सर्बिया के क्षितिज पर नये नेता ‘मिलोस ओब्रोनोविच’ का उदय हुआ। उसके नेतृत्व में सर्बिया ने 1817 ई. में स्वायत्त शासन की स्थापना की। 1820 ई. में उसने राजा की उपाधि धारण की रूस के सहयोग से उसने सर्बिया में स्वतन्त्रता संघर्ष सुचारु रखा । 1830 ई. में मिलोस को सुल्तान के निर्देशानुसार ‘सर्बिया निवासियों के वंशानुगत राजा’ की उपाधि प्रदान की गई इस प्रकार सर्बिया और तुर्की के सम्बन्ध नाममात्र के रह गये। सर्बिया तुर्की का प्रान्त नहीं, बल्कि कर देने वाली रियासत बन गया जो स्वायत्त थी। तुर्की के विघटन से 19वीं शताब्दी में पैदा होना वाला सर्बिया प्रथम राज्य था जिसकी राजधानी बेलग्रेड में थी।

यह उल्लेखनीय है कि स्वतन्त्रता के पश्चात् सर्बिया ने समस्त ‘सर्व’ जाति का नेतृत्व किया बोसनिया
और सर्बिया के अधिकांश लोग ‘सर्व’ जाति के थे, इन पर ऑस्ट्रिया का शासन था । इन प्रदेशों को अपने में विलीन करने का ऑस्ट्रिया को कोई अधिकार नहीं था 1908 में ऑस्ट्रिया और सर्बिया के मध्य विवाद बढ़ गया। सर्बिया को रूस से तथा ऑस्ट्रिया को जर्मनी से समर्थन मिल रहा था। इस प्रकार ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया विवाद ने दो बाल्कन युद्धों को जन्म दिया।

यूनान का मुक्ति संघर्ष (1814-29 ई.)

यूरोप के दक्षिण में स्थित बाल्कन प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग का एक पहाड़ी देश ‘यूनान’, तीन ओर से
भूमध्य सागर से घिरा हुआ है; कटा हुआ समुद्री तट, जो समुद्र के बहुत अन्दर तक धँसा हुआ है। यहाँ नौ- परिवहन की हमेशा से ही सम्भावनाएँ रही हैं। प्रायः यूनान में भूकम्प आते रहते हैं। यूनान को प्रकृति ने तीन भागों में बॉटा हुआ है-दक्षिणी, मध्य तथा उत्तरी। पहाड़ ने यूनान को कई भागों में बॉँट रखा है। एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में सागर मार्ग या पहाड़ी पगडंडियों से ही पहुँचा जा सकता है।

यूनान बहुत पुराना देश है, जहाँ यूरोपीय देशों में सभ्यता का उदय सर्वप्रथम हुआ। 8वीं से छठी
शताब्दी ई.पू. यूनानी नगरों में स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो चुकी थी। इन छोटे-छोटे नगर राज्यों में प्रजातन्त्र का विकास हुआ। साहित्यिक प्रगति, विचार, दर्शन, कला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व यूनानी सभ्यता का ऋणी है। यूनानियों ने अतीत में एक विस्तृत साम्राज्य स्थापित किया, जिसका कालान्तर में सिकन्दर ने विस्तार किया। परन्तु तृतीय शताब्दी ई.पू. के पश्चात् यूनान अवसान की ओर अग्रसर हुआ। परिणामस्वरूप वह स्वयं अपने अतीत को सम्भाल नहीं पाया।15वीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण नामक बीज का अंकुरण हुआ, जो साहित्य, कला, विज्ञान और दर्शन के रूप में फलीभूत हुआ। यूनान का गौरवमयी इतिहास होते समय ने करवट बदली और यूनान पर तुर्की आधिपत्य स्थापित हो गया। तर्क-बुद्धिवाद के आविर्भाव के परचात् अपने अतीत से प्रेरणा लेकर यूनानियों ने तुर्की साम्राज्य को उखाड़ने का प्रयत्न किया।

1789 ई. की फ्रांसीसी क्रान्ति से यूरोप में राष्ट्रीयता का भाव विकसित हुआ। यूनान की एक भाषा, एक चम (ग्रोक ऑर्थोडोक्स चर्च), एक जाति एवं एक सांस्कृतिक पहचान थी। इसके अलावा यूनानी भाषा एवं दतान से यूनानियों में राष्ट्रवादी विचार उत्पन्न हुए। इसके अलावा यूनान से तुर्कों को निष्कासित करने के उद्देश्य से रूस के ‘ओडेसा’ नगर में 1814 ई. में कुछ व्यापारियों ने ‘हिटेरिया फिल्के’ नामक सशस्त्र क्रान्तिकारी सगठन को स्थापना की। 19वीं शताब्दी में यूनान में शक्तिशाली मध्यम वर्ग का उदय हुआ। वह वर्ग राजनीतिक एव आर्थिक अधिकार चाहता था यह यूनान के स्वतन्त्र होने पर ही सम्भव था। यूनान के साथ इंग्लैण्ड एवं रूस की भी सहानुभूति थी।

1821 में यूनानियों ने विद्रोह का शंखनाद कर दिया। उनका प्रथम विद्रोह ‘हिप्सलांटी’ के मनैतळक
‘मोल्डेविया’ में शुरू हुआ। यूनानी इस विश्वास में थे कि उनका मुक्ति संग्राम गति पकड़ेगा तो रूस उनक मदद करेगा। परन्तु रूस का जार अलेक्जेण्डर मेटरनिख के प्रभाव में था। इसलिए उसने यूनानियों की मतक नहीं की। इस प्रकार तुर्की को अवसर प्राप्त हुआ और उसने मोल्डेविया के विद्रोह को दबा दिया। लेकिन यूनान में जो राष्ट्रीयता की चिंगारी फूटी, उस पर नियन्त्रण कर पाना संभव नहीं था मोल्डेविया के विद्रोह के अन्त के पश्चात् मोरिया एवं ईजियन सागर में स्थित द्वीपों में विद्रोह प्रारम्भ हो गये इस प्रकार यूनानियों में राष्ट्रीयता का जोश चरम पर था, जिसे अन्य लोगों की सहानुभूति प्राप्त हो रही थी विश्व के अनेक देशों के स्वयंसेवकों ने यूनान पहुँचकर यूनानी ईसाइयों की मदद की इन स्वयंसंवकों में इंग्लैण्ड के कवि ‘बायरन’ भी थे। इस प्रकार की स्थिति में तुर्की के लिए विद्रोह को कुचलना मुश्किल था मोरिया विद्रोहियों ने नारा बुलन्द किया-‘तुर्क अब अधिक दिन तक न मोरिया में रहेंगे और न समस्त संसार में अन्यत्र कहीं भी ‘ अप्रैल, 1821 में तुर्कों का भीषण हत्याकाण्ड शुरू हुआ, जिसमें 25 हजार तुर्क मारे गये तु्कों ने इस घटना का प्रतिशोध लेने के लिए यूनानियों के धर्माध्यक्ष कुस्तुन्तुनिया निवासी ‘पैट्रीआर्क’ को मौत के याट उतार दिया। सी.जे.एच. हेज (माड्न यूरोप टू 1870) ने कहा है कि, “इतना होते हुए भी यूनानी विद्रोह ने।यूरोप की कल्पना एवं उत्साह को सर्वाधिक जाग्रत किया।”

तुर्को का सुल्तान इस विद्रोह को दबाने में जब असफल रहा, तो उसने मिस्त्र के सूबेदार (पाशा)
मेहमत अली से विद्रोह को दबाने में सहयोग की अपील करते हुए, बदले में उसको मोरिया, सीरिया और दश्मिक का सूबेदार (पाशा) नियुक्त करने का आश्वासन दिया। मेहमत अली ने अपने पुत्र इब्राहिम के नेतृत्व में 11 हजार जवानों की सेना एवं जहाजी बेड़ा तुर्की सुल्तान की सहायता के लिए भेजा । इब्राहिम ने ‘क्रीट’ को सैनिक कार्यवाही का केन्द्र बनाकर यूनानियों के विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया जिससे यूनानी स्वतन्त्रता संग्राम कमजोर स्थिति में पहुँच गया। मेटरनिख, जार अलेक्जेण्डर एवं इंग्लैण्ड ने यूनानी स्वतन्त्रता संग्राम में हस्तक्षेप करना नहीं चाहा। परन्तु, इब्राहिम के अत्याचार बढ़ने पर पाशा पलट गया और 1827 की लन्दन सन्धि के अनुसार रूस, इंग्लैण्ड और फ्रांस इस बात के लिए राजी हुए कि यूनान को तुकी की सम्प्रभुता के अधीन स्वशासित राज्य बनाते हुए उस स्थिति में रखा जाए जिसमें सर्बिया था। इस प्रकार 1827 की लन्दन सन्धि ने यूनान की परिस्थिति को बदलते हुए हस्तक्षेप किया। लन्दन सन्धि के अनुसार तुर्की के युद्ध विराम स्वीकार करने के लिए विवश किया गया। अगस्त, 1827 को तीनों राज्यों (रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस) ने इसी आशय का एक संयुक्त प्रपत्र (Note) तुकी सुल्तान महमूद-II के समक्ष प्रस्तुत किया।


20 अक्टूबर, 1827 को इंग्लैण्ड, रूस और फ्रांस के समुद्री बेड़े “नेवारिनो की खाड़ी’ में प्रवेश कर
गये। तुर्की के सैनिकों ने मित्र राष्ट्रों के जहाजों पर गोलीबारी शुरू कर दी। युद्ध शुरू होने के दिन ही तुर्की तथा मिस्र के संयुक्त जहाजी बेड़े को मित्र राष्ट्रोंकी सेना ने नष्ट कर दिया। मेटरनिख ने नेवारिनो युद्ध के बारे में लिखा था कि, “20 अक्टूबर की घटना ने यूरोप में एक नये युग का सूत्रपात कर दिया।”

नेवारिनो युद्ध के पश्चात् तुर्की सुल्तान ने 1827 ई. में रूस के खिलाफ जिहाद की घोषणा कर दी,
जिसने रूस-तुर्की युद्ध को अवश्यम्भावी बना दिया। 27 अप्रैल, 1829 को रूस के जार निकोलस प्रथम ने तुर्की के खिलाफ युद्ध का शंखनाद कर दिया। शुरुआत में रूसी सेना को सफलता नहीं मिली परन्तु शीघ्र ही स्थिति बदल गई और वलाशिया एवं मोल्डाविया पर रूस का अधिकार हो गया। डोडेनेलीज पर भी रूसी कुब्जा हो गया। जुलाई, 1828 को फ्रांस, रूस और ब्रटेन के प्रतिनिधियों ने मिलकर फ्रांस को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वह मोरिया से मेहमत अली की सेनाओं को हटाए।

अगस्त, 1829 में रूसी सेनापति ‘डीबित्स’ ने बाल्कन पर्वतमाला को पार करते हुए एड्रियानोपल पर
आधिपत्य कर लिया और कुस्तुन्तुनिया की ओर अग्रसर हुआ। दूसरी तरफ कार्स एवं अजरूम पर रूस का कब्जा हो गया। इस प्रकार तुर्की युद्ध में पराजित हो गया और अन्ततः 14 सितम्बर, 1829 को उसे एडियानोपल की सन्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस सन्धि के प्रावधान अग्रलिखित थे-

  1. तुर्की ने यूनान को स्वायतता देते हुए निश्चित किया कि जिस व्यक्ति को मित्र राष्ट्र यूनान का राजा घोषित करेंगे, उसे ही तुर्की सुल्तान स्वीकार कर लेगा।
  2. वलाशिया और मोल्डेविया को स्वतन्त्रता देकर रूस के संरक्षण में रख दिया गया ।
  3. जॉर्जिया एवं कॉकेशस के प्रदेश रूस को दे दिये गये। सुल्तान को 173 पूर्वी समस्या एवं यूरोप के लिए उसकी जटिलताएँ
  4. शान्तिकाल में कालासागर एवं डेन्यूब नदी के द्वार सभी देशों के लिए खुले रहेंगे, परन्तु युद्ध का स्थिति में बन्द हो जायेंगे।
  5. तुर्की में रूसी व्यापारियों को सुविधाएँ एवं सुरक्षा देना तय किया गया।

एड्रियानोपल की सन्धि से यूनान को स्वतन्त्र राष्ट्र की मान्यता प्राप्त हो गई। यूनानी मुक्ति.संग्राम से
यूनानियों ने निरंकुश एवं अत्याचारी तुर्की शासन से निजात पाई और अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया।

यूनानियों की विजय मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी सोच के खिलाफ राष्ट्रीयता की जीत थी। यूनानियों की इस सफलता से ही 1830 की क्रान्ति के बीज का प्रस्फुटन हुआ। यूनान के मुक्ति संघर्ष के खात्मे के पश्चात् बाल्कन क्षेत्र में रूसी वर्चस्व स्थापित हो गया। इस संघर्ष ने तुर्की साम्राज्य की कमजोरी एवं खोखलेपन को जगजाहिर कर दिया। इसके परिणामस्वरूप बाल्कन प्रदेश के अन्य ईसाई राज्यों में भी स्वतन्त्रता की आशा का संचार हुआ। यूनान की समस्या ने यह साबित कर दिया कि बाल्कन की समस्या यूरोप की ही नहीं अपितु अन्तरराष्ट्रीय समस्या है, जिसमें ब्रिटेन, रूस तथा ऑस्ट्रिया तीनों के स्वार्थ निहित थे।

यूनानियों ने ‘केपोडिस्ट्रियास’ को राष्ट्रपति बनाया। केपोडिस्ट्रियास तुर्की के प्रभुत्व में यूनान राज्य के
निर्माण के पक्ष में नहीं था ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया भी यूनान की पूर्ण स्वतन्त्रता चाहते थे। फरवरी, 1830 में लन्दन समझौता हुआ जिसमें कोबर्ग के ‘ लियोपॉल्ड’ को स्वतन्त्र यूनान का शासक बनाया जाना तय हुआ, परन्तु यूनान के राष्ट्रपति ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। अक्टूबर, 1831 में ‘केपोडिस्ट्रियास’ के हत्या से यूनान में अराजकता का माहौल बन गया । इससे निपटने के लिए सितम्बर, 1833 ई. में फ्रांस, ब्रिटेन और रूस में एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार यूनान को पूर्ण स्वतन्त्र राज्य स्वीकारते हुए बवेरिया के शासक के ‘आटो’ को यूनान का राजा बनाने का निर्णय लिया। 27 जनवरी, 1833 ई. को राजकुमार आटो ने यूनान के प्रथम शासक के रूप में ग्रीस में प्रवेश किया।

मिस्र और तुर्की साम्राज्य

पूर्व एवं पश्चिम का संगम स्थल ‘मिस्र’, अफ्रीका के उत्तर- पश्चिम में नील नदी के किनारे स्थित है।
उत्तर में भूमध्यसागर, दक्षिण में नील नदी तथा पूर्व में लाल सागर, पश्चिम लीबियन रेगिस्तान से घिरा हुआ है। उत्तरी अफ्रीका का यह प्रदेश पहले रोमन साम्राज्य नियन्त्रण में धा, जो कालान्तर में 640 ई. में अरब के आधिपत्य में चला गया 7वीं शताब्दी में इस्लाम के प्रसार के कारण उसके प्रभाव में आ गया 1517 ई. में इस पर तुर्की साम्राज्य का कब्जा हो गया। 1798 में नेपोलियन के समय मिस्र फ्रांस के अधीन हो गया। नेपोलियन का मिस्र पर आक्रमण उसके आधुनिकीकरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा। नेपोलियन अपनी सेना के साथ अनेक विद्वान, वैज्ञानिक एवं कई दार्शनिकों को मिस्र ले गया था। फ्रांस के मिस्त्र पर प्रभाव को कम करने के लिए ब्रिटेन एवं तुर्की की संयुक्त सेनाएँ मिस्त्र पहुँची, परन्तु ब्रिटिश सेना अधिक समय तक नहीं ठहर सकी।

इस स्थिति का फायदा उठाते हुए तुर्की सेनापति मेहमत अली ने मिस्र का शासन अपने हाथों में ले
लिया। 1805 में वह मिस्र का पाशा (सूबेदार) बन गया। 1805 से 1849 तक वह मिस्र का प्रमुख बना रहा। मेहमत अली ने अनपढ़ होते हुए भी पाश्चात्य विचारों से प्रभावित होकर मिस्न का आधुनिकीकरण करने का प्रयास किया। 10-15 वर्षों में मेहमत अली का इतना उत्कर्ष हुआ कि तुर्की का सुल्तान भी उससे मदद की अपेक्षा करने लगा।

मिस्र ने यूनानियों के स्वतन्त्रता संग्राम में तुर्की के सुल्तान के सहयोग के प्रतिफल में क्रीट प्राप्त कर
लिया, परन्तु इससे सन्तोष नहीं हुआ। उसने सीरिया पर अधिकार करने का निश्चय किया 1831 ई. में
मेहमत अली ने अपने पुत्र इब्राहिम को सीरिया विजय के लिए भेजा। उसने जाफा, गाजा और येरूशलम पर अधिकार कर लिया। मई, 1832 में अक्रा जीतकर जून, 1832 में दमिश्क हथिया लिया। जुलाई, 1832 में इब्राहिम ने बेलन दरें को कब्जे में लेते हुए एशिया माइनर में प्रवेश किया। दिसम्बर, 1832 में इब्राहिम के हाथों तुर्की सेना की पराजय से सुल्तान भयभीत हो उठा और उसने यूरोपीय महाशक्तियों की ओर मदद के लिए हाथ बढ़ाया। अनेक परिस्थितियों के कारण यूरोपीय शक्तियों में से केवल रूस ने तुर्की की मदद की। रूस द्वारा तुर्की की सहायता करने का मूल उद्देश्य कॉस्टेन्टिनोपल, बासफोरस एवं डार्डेनेलीज पर वर्चस्व स्थापित करना था रूसी सेना के तुर्की के पक्ष में एशियामाइनर तट पर पहुँचने पर इंग्लेण्ड एवं फ्रांस के हस्तक्षप के पश्चात् तुर्की सुल्तान को मेहमत अली के साथ अप्रैल, 1833 ई. में सन्धि कहनेी पड़ी। इस संधि के अनुसार तुर्की के सीरिया, दमिश्क, अलेण्पो और अदन के बन्दरगाह पर मिस्र के पाशा का अधिकार मान लिया।

अप्रैल, 1833 की सन्धि के पश्चात् रूस ने तुर्की से मेहनताना माँगा और उसे दवाव में लाने का प्रयास
किया। रूस ने सेना भेजकर बासफोरस और डार्ेनेलीज का दुर्गीकरण शुरू कर दिया। असहाय होकर तुर्की सुल्तान महमूद द्वितीय ने रूस के जार निकोलस प्रथम के साथ 8 जुलाई, 1833 को सन्ध्रि की, जिसे ‘अंकिएर-स्केलेसी’ की सन्धि के नाम जाना जाता था इस सन्धि की शर्ते निम्नानुसार थी :-

  1. जरूरत होने पर रूस तुर्की को सैनिक मदद देगा।
  2. अगर रूस किसी देश के साथ संघर्षरत होगा तो तुर्की उसका सहयोग करेगा।
  3. युद्धकाल में सिर्फ रूसी सैनिक ही बासफोरस एवं डार्डेनेलीज से

अंकिएर-स्केलेसी की सन्धि के परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड एवं फ्रांस में डर पैदा हो गया। दोनों देशों ने
इस सन्धि की खिलाफत की। ऑस्ट्रिया के शासक मेटरनिख के हस्तक्षेप के पश्चात् रूस ने अंकिएर-स्केलेसी सन्धि द्वारा प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करने का वचन दिया इसके पश्चात् युद्ध का खतरा टल गया। तुर्की के सुल्तान के मन में मिस्र के पाशा के खिलाफ प्रतिशोध का भाव था । इसलिए तुर्की ने प्रशा एवं ब्रिटेन से मित्रता कर ली। इस मित्रता के पश्चात् तुर्की सुल्तान ने मेहमत अली से बदला लेने के व से सीरिया पर अधिकार करने की योजना बनाई। तुर्की सुल्तान महमूद-II ने सेनापति हफीज पाशा के नेतृत्व में अप्रैल, 1839 में सीरिया पर आक्रमण कर दिया। जून, 1839 नजीब युद्ध में इब्राहिम ने तुरकी की सेना को परास्त कर दिया। 1 जुलाई, 1839 को तुर्की के सुल्तान महमूदII की मृत्यु हो गई । इसके पश्चात् उसका 16 वर्षीय पुत्र मजीद सुल्तान बना।

तुर्की का अल्पवयस्क सुल्तान मिस्त्र के पाशा की सभी शतों को मानकर युद्ध को विराम देना चाहता
था, परन्तु मित्र राष्ट्रों ने तुर्की एवं मिस्र विवाद को अन्तरराष्ट्रीय प्रश्न बतलाते हुए हल नहीं होने दिया। रूस एवं फ्रांस तुर्की पर आधिपत्य स्थापित करना चाहते थे इससे ब्रिटेन का विदेश मंत्री पामस्स्टन चिंतित था। इसलिए उसने समस्या समाधान के लिए 15 जुलाई, 1840 को लन्दन में सम्मेलन बुलाया जिसमें इंग्लैण्ड, रूस, ऑस्ट्रिया और प्रशा ने भाग लिया। 1840 के लन्दन सम्मेलन के निम्नलिखित प्रावधान थे :-

  1. मेहमत अली को मिस्र का वंशानुगत पाशा स्वीकार कर लिया गया।
  2. यह निश्चित किया गया कि मेहमत अली की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र इब्राहिम सीरिया को
    तुर्की सुल्तान को सुपुर्द कर देगा।
  3. इंग्लैण्ड, रूस, ऑस्ट्रिया और प्रशा ने सम्मिलित रूप से तुर्की साम्राज्य की सुरक्षा का आश्वासन
    दिया। इस प्रकार लन्दन सम्मेलन से अंकिएर-स्केलेसी की सन्धि भंग हो गई| मेहमत अली ने लन्दन सम्मेलन की शर्तों को नकार दिया। इसके अलावा फ्रांस भी रुष्ट हो गया। जुलाई, 1841 में लन्दन में दूसरा सम्मेलन हुआ जिसमें इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रिया, रूस और प्रशा के साथ फ्रांस भी शामिल हुआ। इसके प्रावधान निम्नलिखित थे :
  4. मेहमत अली को मिस्र का वंशानुगत पाशा स्वीकार कर लिया गया।
  5. सीरिया, अरब एवं क्रीट को खाली करने के लिए मेहमत अली बाध्य हो गया।
  6. बासफोरस एवं डार्डेनलीज में किसी भी देश के युद्धपोतों का प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया।
    इस प्रकार ब्रिटेन विदेशमंत्री लॉर्ड पामस्स्टन ने तुर्की साम्राज्य में रूस और फ्रांस के प्रभाव को कम कर दिया। इस समझौते के पश्चात् 10 वर्षो तक तुर्की साम्राज्य में शान्ति बनी रही । क्रीमिया युद्ध

1828-29 के रूसी-तुर्की युद्ध का अन्त एड्रियानोपल की सन्धि के साथ हुआ। इस सन्धि ने रूस का
बाल्कन प्रायद्वीप में वर्चस्व स्थापित कर दिया मोल्डेविया एवं वैलेशिया प्रदेश भी रूसी संरक्षण में आ गये, परन्तु रूस की साम्राज्य विस्तारवादी महत्तवाकाक्षा कम नहीं हुई। रूसी सम्राट जान निकोलस प्रथम रूस का पूर्वी समस्या एवं यूरोप के लिए उसकी जटिलताएँ और विस्तार करना चाहता था। बाल्कन प्रदेश में रूसी महत्त्वाकांक्षा ने कालान्तर में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दी कि यूरोप में क्रीमिया युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध काले सागर के उत्तर में स्थित क्रीमिया प्रायद्वीप पर 1854 से
1856 के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध में एक तरफ रूस तथा दूसरी ओर इंग्लैण्ड, तुर्की, फ्रांस एवं साडीनिया ने भाग लिया। 19वीं शताब्दी में लड़ा जाने वाला यह एक बेकार युद्ध माना जाता है। रूस ‘यूरोप के बीमार’ तुर्की साम्राज्य का विभाजन कर एक बड़े भाग पर अधिकार करना चाहता था इस युद्ध के निम्नलिखित कारण थे:

  1. तुर्की साम्राज्य पर रूसी प्रभाव का खतरा : साम्राज्यवादी सोच रखने वाले इंग्लैण्ड एवं फ्रांस को तुर्की साम्राज्य में रूस का दखल असहनीय था। तुर्की साम्राज्य में रूसी दखलंदाजी से यूरोपीय शक्ति संतुलन खराब हो गया था।
  2. रूस द्वारा तुर्की साम्राज्य के विभाजन की पहल : जार निकोलस प्रथम ने 1844 ई. में ब्रिटेन
    की यात्रा की। यात्रा के दौरान ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एबरडीन से मुलाकात के समय निकोलस प्रथम ने तुर्की साम्राज्य के बँटवारे का प्रस्ताव रखा। 1853 में जार ने सेंट पीटर्सवर्ग स्थित ब्रिटिश राजदूत से भी कहा कि तुर्की ‘यूरोप का रोगी’ (Sickman of Europe) है। इसलिए तुर्की का विभाजन कर लेना चाहिए इसके अलावा यह भी कहा कि वह (इंग्लैण्ड) मिस्र, साइप्रस अथवा क्रीट पर अधिकार कर ले और रूस कुस्तुन्तुनिया पर तुर्की के ईसाई लोगों को स्वतन्त्रता दे दे । इंग्लैण्ड द्वारा रूस के सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया गया, क्योंकि ये सभी प्रस्ताव इंग्लैण्ड की तुर्की को अखण्ड बनाए रखने वाली नीति के खिलाफ थे। इस प्रकार रूस एवं इंग्लैण्ड के सम्बन्ध खराब हो गये।
  3. पवित्र स्थानों के संरक्षण का विवाद : फ्रांस एवं रूस पवित्र स्थल ‘जेर्शलम’ पर अपना-
    अपना दावा प्रकट करते थे। इससे दोनों देशों में तनाव बढ़ गया, परन्तु यह वास्तविकता नहीं थी। सच यह था कि जार निकोलस और फ्रांसीसी शासक नेपोलियन तृतीय लड़ने का बहाना ढूँढ़ रहे थे नेपोलियन फ्रांस के बहुसंख्यक रोमन कैथोलिक धर्मावलम्बी लोगों का विश्वास अर्जित करना चाहता था।’सीरिया’ के प्रश्न पर लुई फिलिप के काल में फ्रांस की इज्जत धूमिल हुई थी, वह उस स्थिति को ठीक करना चाहता था दूसरी ओर रूस पवित्र-स्थलों की आड़ में अपनी स्वार्थपूर्ति करना चाहता था।

यह विवाद पवित्र- स्थलों के संरक्षण से बढ़कर तुर्की में निवास करने वाले ईसाइयों के संरक्षण तक
पहुँच गया। निकोलस प्रथम ने विशेष राजदूत मैसीकोफ को तुर्की भेज कर ईसाई प्रजा को रूसी संरक्षण स्वीकारने की माँग की। तुर्की स्थित ब्रिटिश राजदूत ‘स्ट्रेडफॉर्ड डी-रेडक्लिफ’ ने चतुराईपूर्ण तरीके से पवित्र- स्थल और ईसाइयों के संरक्षण को अलग-अलग कर दिया। तुर्की ने रूस के पवित्र स्थलों पर संरक्षण को तो स्वीकार लिया, परन्तु ईसाइयों के संरक्षण के दावे को खारिज कर दिया। इससे रूस असन्तुष्ट हो गया और फ्रांस की क्रोधाग्नि और तीव्र हो उठी।

मोल्डेविया और वैलेशिया पर रूसी प्रभुत्व : 31 मई, 1853 को जार निकोलस ने रूस की माँगों को स्वीकार करने का पत्र तुर्की सुल्तान को लिखा, परन्तु उसने पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। अन्तत: जुलाई, 1853 में रूसी सेनाओं ने प्रुथ नदी को पार करके मोल्डेविया एवं वैलेशिया पर अधिकार कर लिया। जैसे ही यह सूचना इंग्लैण्ड एवं फ्रांस को मिली तो उनकी घबराहट बढ़ गयी। ऑस्ट्रिया भी इस घटना पर नजर बनाये हुए था। इसकी वजह यह थी कि यह संघर्ष उसकी सीमा के निकट ही था । इसलिए वह युद्ध को टालना चाहता था। ऑस्ट्रियाई विदेश मन्त्री ‘काउन्ट बुओल’ ने युद्ध को टालने के उद्देश्य से इंग्लैण्ड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया और प्रशा के प्रतिनिधियों को जुलाई, 1853 में वियना में आमंत्रित किया। इस सम्मेलन में रूस और तुर्की के विवाद को सुलझाने का प्रेयास किया गया, परन्तु सफलता नहीं मिली। यह ‘वियना नोट’ कहलाता है। युद्ध का घटना क्रम तुर्की सुल्तान ने इंग्लैण्ड एवं फ्रांस द्वारा युद्ध में समर्थन का आश्वासन दिये जाने के उपरान्त 5 अक्टूबर को रूस को 15 दिन में मोल्डेविया और वैलेशिया को छोड़ देने की अन्तिम चेतावनी दे दी। रूस द्वारा तुर्की को चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिये जाने के परिणामस्वरूप 23 अक्टूबर, 1853 को तुर्की ने रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। तुर्की की रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के साथ ही इंग्लैण्ड एवं फ्रांस का संयुक्त जहाजी बेड़ा डाडेनल्स के जलडमरूमध्य में प्रवेश कर गया। इसी समय रूसी बेड़े ने साइनोप (Sinope) के समीप तुर्की बेड़े को नष्ट कर दिया इस प्रकार साइनोप घटना के पश्चात् इंग्लैण्ड एवं फ्रांस का क्रोध परवान चढ़ गया। साइनोप हत्याकाण्ड से ब्रिटिश जनमत रूस के विरुद्ध युद्ध करने को आतुर उठा, परन्तु ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एबरडीन युद्ध के पक्ष में नहीं था 4 जनवरी, 1854 को इंग्लैण्ड एवं फ्रांस का
जहाजी बेड़ा काले सागर में प्रवेश कर गया। नेपोलियन तृतीय ने निकोलस प्रथम को पत्र लिखकर कहा कि रूस अपनी सेनाएँ तुर्की से हटा ले तो इंग्लैण्ड और फ्रांस भी काले सागर से पीछे हट जायेंगे। परन्तु जार निकोलस ने सन्तोषजनक प्रतिक्रिया नहीं दी। अन्ततः 27 फरवरी को इंग्लैण्ड एवं फ्रांस ने रूस को 30 अप्रैल तक मोल्डेविया एवं वैलेशिया को छोड़ने की चेतावनी दे दी। 19 मार्च को ही रूस ने इंग्लैण्ड एवं फ्रांस की चेतावनी को अस्वीकार कर दिया, तो 27 मार्च को इंग्लैण्ड और फ्रांस ने युद्ध की ताल ठोक दी। जार निकोलस प्रथम को आशा थी कि ऑस्ट्रिया उसका सहयोग करेगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ और वह तटस्थ रहा। प्रशा ने भी इस युद्ध में हस्तक्षेप नहीं किया।


क्रीमिया युद्ध का अन्त 25 फरवरी, 1856 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में इंग्लैण्ड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया,
रूस, तुर्की और पीडमांट-सारडीनिया के प्रतिनिधियों के मध्य हुए समझौते के साथ हुआ इस समझौते पर हस्ताक्षर 30 मार्च को किये गये इसे ही पेरिस सन्धि कहते हैं। इसकी शर्तें निम्नानुसार थीं-

तुर्की प्रदेशों की अखण्डता एवं राजनीतिक स्वतन्त्रता को सभी यूरोपीय देशों ने स्वीकार कर लिया।

यूरोपीय शक्तियों ने यह स्वीकारा कि तुर्कीं साम्राज्य के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं
किया जायेगा ।

युद्ध की दृष्टि से काले सागर का तटस्थीकरण कर दिया। अर्थात् सभी राष्ट्रों के व्यापारिक जहाज तो
प्रवेश कर पायेंगे, परन्तु युद्धपोतों का प्रवेश निषिद्ध रहेगा। रूस ने रूमानिया (मोल्डेविया) और सबिया पर संरक्षण अधिकार त्यागते हुए सभी राष्ट्रों ने इन दोनों देशों की स्वतन्त्रता को बनाये रखने की संयुक्त जिम्मेदारी ग्रहण कर नली। बस्सेरिया का प्रदेश जो पहले रूस के नियन्त्रण में था, अब मोल्डविया (रूमानिया) को सुपुर्द कर दिया।

क्रीमिया युद्ध के परिणाम

क्रीमिया युद्ध को विश्व इतिहास में ‘बेकार युद्ध’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि न ही तो इससे
तुर्की साम्राज्य को विभाजन से बचाया जा सका और न ही रूसी साम्राज्यवादी नीति को विराम मिला। तुर्की साम्राज्य की ईसाई जनता पर मुसलमानों द्वारा अत्याचार बरपाया जाता रहा।

ब्रिटेन का उद्देश्य तुर्की को विभाजन से बचाना था, परन्तु उसे इसमें कामयाबी नहीं मिली। इस युद्ध
में इंग्लैण्ड ने 60 हजार सैनिक खो दिये और राष्ट्रीय ऋण भार में भी वृद्धि हुई। नेपोलियन तृतीय की फ्रांस में स्थिति मजबूत हो गई। देश में उसके विरोधियों का मुँह भी बन्द हो गया, परन्तु इस युद्ध के दूरगामी परिणाम नेपोलियन के लिए घातक साबित हुए।। इस युद्ध में सिर्फ सा्डीनिया को लाभ हुआ। कैबूर को सफलता इस रूप में मिली कि उसने इटली के एकीकरण की समस्या को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर दिया। इस युद्ध ने 1815 ई. की वियना-व्यवस्था की चूल हिला दी। 1815 से 1848 ई. तक यूरोप में उदारवाद और राष्ट्रवाद की लहर को पनपने नहीं दिया गया. परन्तु क्रीमिया युद्ध के पश्चात् परिवर्तन का विरोध करने वाली शक्तियाँ पस्त हो गई और जर्मनी एवं इटली का एकीकरण सम्पन्न हो गया| क्रीमिया युद्ध को यूरोपीय इतिहास की विभाजक रेखा माना जाता है। इसने जार निकोलस प्रथम की शासन-नीति को अप्रासांगिक करार देते हुए रूस में प्रजातान्त्रिक आन्दोलनों का वातावरण तैयार कर दिया। रूसी लोगों के आक्रोश से रूस जल उठा तो जार अलेक्जेण्डर ने समय की माँग
को देखते हुए रूस में अनेक सुधार किये। इस युद्ध ने नये युग का आह्वान किया।

1878 ई. का ब्लिन सम्मेलन

ओटोमन साम्राज्य के बिखर जाने के परिणामस्वरूप यूरोप में पूर्वी समस्या का उदय हुआ। इस प्रदेश
की राजनीति में 1866 से पहले ब्रिटेन एवं रूस दो प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी देश थे। 1866 ई. ऑस्ट्रिया-प्रशा युद्ध के परिणामस्वरूप जर्मनी एवं इटली की राजनीति से ऑस्ट्रिया ने अलविदा कह दिया। कालान्तर में ऑस्ट्रिया- हंगरी ने बाल्कन प्रदेश में अपना प्रभाव छोड़ने का प्रयास किया। बाल्कन प्रदेश में ऑस्ट्रिया-हंगरी के बर्चस्व स्थापित करने से पूर्व रूस ने उसे अपने शिकंजे में ले लिया। रूस ने 1867 ई. में मास्को में सर्व- स्लाव सम्मेलन बुलाकर एक ‘केन्द्रीय सर्व- स्लाव समिति’ बनाकर सभी स्लाव लोगों को एकजुट करके ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ उकसाने का प्रयास किया सर्व- स्लाव समिति ने सर्बिया, बोस्नया, बुल्गारिया तथा मांटीनीग्रों में अपनी शाखाएँ खोली।

सर्व-स्लाववाद (Panslavism) के प्रभाव एवं ओटोमन साम्राज्य के शोषणपरक व्यवहार से परेशान
होकर 1874 ई. में बोस्निया में एक विद्रोह उत्पन्न हो गया। तुर्की साम्राज्य ने इसे निर्मम तरीके से दबाने का प्रयास किया तो रूस ने बोस्निया का पक्ष लिया। तुर्की ने जब रूस को अनदेखा कर दिया तो उसने तुर्की के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध में पराजित होकर तुर्की ने रूस के साथ ‘सन-स्टीफानों की सन्थि (1877 ई.)’ की। इस सन्धि के परिणामस्वरूप तुर्की के कुछ क्षेत्रों पर रूसी वर्चस्व स्थापित हो गया तथा सर्बिया एवं रूमानिया को स्वतन्त्र राज्य का दर्जा मिल गया ।

सन-स्टीफानों की सन्धि का इंग्लैण्ड और ऑस्ट्रिया-हंगरी दोनों ने विरोध किया, क्योंकि इसके
पश्चात् ओटोमन साम्राज्य लगभग समाप्त हो गया तथा समस्त क्षेत्र पर रूसी प्रभुत्व स्थापित हो गया। बाल्कन समस्या का हल निकालने के लिए ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया ने एक यूरोपीय सम्मेलन बुलाने की माँग की रूस ने इसकी खिलाफत की। इस स्थिति में तनाव बढ़ गया । बिस्मार्क ने मध्यस्थता करते हुए रूस को सम्मेलन में भाग लेने के लिए आश्वस्त करते हुए कहा कि जर्मनी की पूर्वी समस्या में कोई रुचि नहीं है। वह तो एक ईमानदार दलाल’ की भूमिका अदा कर रहा है। जून, 1878 को बल्लिन सम्मेलन बुलाया गया बलिन सम्मेलन में बाल्कन से सम्बन्धित निम्नलिखित व्यवस्थाएँ की गयीं-

  1. ब्रिटेन को साइप्रस द्वीप मिला।
  2. रूस को बेसरेबिया दिया गया जिससे उसके साम्राज्य की सीमा का विस्तार डैन्यूब नदी तक हो
    गया। बातूम, कार्स तथा आरमेनिया का कुछ क्षेत्र एशिया में भी प्राप्त हुआ।
  3. सर्बिया, मांटीनीग्रो तथा रूमानिया के राज्यों को स्वतन्त्रता प्रदान की गई, परन्तु सान स्टीफेनो की सन्धि से मांटीनीग्रो की जो सीमाएँ निर्धारित की गई थी, वे कम कर दी गईं । सर्बिया को ऑस्ट्रिया के संरक्षण में रखते हुए रूमानिया से बेसरेबिया लेकर बदले में उसे दोबरूजा का 2 /3 भाग प्रदान किया गया
  4. बर्लिन सम्मेलन से ऑस्ट्रिया को बोस्निया, हर्जेगोविना और नोबी बाजार के संजाक को अधिकृत करने तथा शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ। इस नियन्त्रण ने मांटीनीग्रो को सर्बिया से पृथक् कर दिया। सर्बिया का आकार भी छोटा कर दिया गया ।
  5. ‘वृहत् बुल्गेरिया’ की स्थापना सान स्टीफेनो की सन्धि के तहत् हुई, परन्तु बल्लिन सम्मेलन ने उसे तीन भागों में विभाजित कर दिया- (i) बुल्गेरिया राज्य को स्वशासी बनाते हुए, तुर्की की प्रभुसत्ता में रख दिया।
    (ii) बाल्कन पर्वतश्रेणी के दक्षिण में स्थित रोमेलिया, जो तुर्की के अधीनस्थ था, यूरोपीय शक्तियों ने शासन के लिए ईसाई गवर्नर को दे दिया| (iii) ओटोमन साम्राज्य के अन्तर्गत ही रूमानिया और मैसिडोनिया को स्वशासित घोषित कर दिया।

बर्लिन सम्मेलन का मूल्यांकन


बर्लिन सम्मेलन के नीति नियंताओं ने पूर्वी समस्या का सन्तोषप्रद हल निकालने और यूरोपीय देशों के
मध्य एक भीषण युद्ध को टालने का दावा किया परन्तु यह असत्य है। यह समझौता इस बात को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है कि सम्मेलन ने बाल्कन के जनमानस की राष्ट्रवादी इच्छाओं को महाशक्यों की प्रतिद्वन्द्विता पर न्यौछावर कर दिया। पहले की अपेक्षा अब यह सुस्पष्ट हो गया कि कालान्तर में कभी भी बाल्कन ज्वालामुखी फूट सकता है। यह सम्मेलन ऑस्ट्रिया की माँग पर यह विचार करने के लिए आयोजित किया गया था कि सन-स्टीफनों की सन्धि सही है या नहीं। ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया का ध्येय बाल्कन प्रदेश में रूस के प्रसार को रोकना, पूर्वी समस्या का संतोषजनक हल निकालते हुए बाल्कन क्षेत्र में रूस, ऑस्ट्रिया तथा ब्रिटेन के हितों में सन्तुलन बनाये रखना था बल्लिन सम्मेलन में सन-स्टीफेनों की सन्धि का खात्मा हो गया, जिसके परिणामस्वरूप रूस का दायरा सीमित हो गया वृहत् बुल्गेरिया के विभाजन से ऑस्ट्रिया एवं इंग्लैण्ड को संतोष मिल गया। इस कामयाबी पर खुश होकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डिजरैली ने दावा किया कि बल्लिन से मैं सम्मान के साथ शान्ति लेकर लौटा हूँ। परन्तु कालान्तर में यह खोखला साबित हुआ। इस सम्मेलन के निर्णयों से तुर्की को यूरोपीय साम्राज्य का काफी क्षेत्र प्राप्त हो गया परन्तु 1875 से 1878 ई. के मध्य घटित घटनाओं ने उसकी वास्तविक शक्ति को समाप्त कर दिया। बल्लिन सम्मेलन ने बाल्कन प्रदेश को अनेक राज्यों को विभाजित कर दिया। बर्लिन सम्मेलन बड़ी शक्तियों के स्वार्थ के कारण विफल हो गया। यूरोप शक्ति सन्तुलन बनाये रखने की आड़ में राष्ट्रवाद पनप ही नहीं पाया। बर्लिन व्यवस्था द्वारा मेसिडोनिया को तुर्की के नियंत्रण में हस्तान्तरित करना भी एक भयंकर भूल थी। मेसिडोनिया की जनता ने तुर्की के विरोध में आन्दोलन शुरू कर दिया. जिसकी परिणति 1912 ई. बाल्कन युद्धों में हुई। दक्षिण-स्लाव (यूगोस्लाव) राज्यों को भी शान्ति नहीं मिली।

यूनान ने सम्मेलन में थेसली, एपीरस और क्रीट के द्वीपों को स्वयं में मिलाने की माँग की, परन्तु इसे स्वीकार नहीं किया गया। कालान्तर में बिखरे हुए यूनानियों को संगठित करने का अभियान चला, जिससे बाल्कन प्रदेश में तनाव उत्पन्न हो गया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बल्लिन सम्मेलन में अनेक कमियाँ थीं कुछ हद तक इन कमियों का होना
स्वाभाविक भी था, क्योंकि आखिरकार अन्य समझौतों की भौंति यह सम्मेलन भी एक प्रकार की सन्धि ही थी। यह सन्धि भी एक प्रकार से विषम परिस्थितियों का सामना करने तथा महाशक्तियों के मध्य सन्तुलन बनाये रखने के लिए की गयी थी इस ध्येय को उसने पूरा किया और एक पीढ़ी तक बड़े राष्ट् के मध्य कोई युद्ध नहीं हुआ।

बर्लिन सम्मेलन (1878) के पश्चात् भी चार दशकों तक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वातावरण तनावपूर्ण
बना रहा, यूरोपीय महाशक्तियाँ समस्या को उलझाती रही। बाल्कन क्षेत्र में शक्तिशाली राष्ट्रों के अलावा
नवोदित राष्ट्रों में भी परस्पर प्रतिस्पद्ध्धा का सूत्रपात हुआ। बाल्कन राज्यों में परस्पर संघर्ष का पहला विस्फोट 1885 में सर्बिया द्वारा बुल्गारिया पर आक्रमण के साध हुआ।

1896 ई. में दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना क्रीट को लेकर यूनान और तुर्की के मध्य युद्ध का होना थी।
बर्लिन कांग्रेस में यूनान ने क्रीट पर अधिकार जताया परन्तु क्रीट को तुर्की के संरक्षण में रखा गया। इस व्यवस्था के खिलाफ 1896 में क्रीट निवासियों ने विद्रोह का झंडा बुलन्द कर दिया।

1908 ई. तक बाल्कन प्रायद्वीप में औटोमन साम्राज्य अन्तिम रूप से बिखर चुका था। अब तक
बाल्कन प्रदेश में यूनान, सर्बिया, बुल्गेरिया, रूमानिया और माण्टीनिग्रो पाँच स्वतन्त्र राज्य बन चुके थे।
बाल्कन अधिकार वाले बोस्निया, हर्जेगोविना, डोरबुजा तथा क्रीट विदेशी शक्तियों द्वारा शासित हो रहे थे । बोस्निया विद्रोह : तुर्की या ओटोमन साम्राज्य के विषटन से तुर्कीं के राष्ट्रप्रेमी काफी चिन्तित थे।

उनका मानना था कि तुर्की के सुल्तान अब्दुल हमीद की निरंकुश नीति के चलते वहाँ उत्तरदायी शासन
स्थापित नहीं हो पाया, इसलिए ओटोमन साम्राज्य के पतन को नहीं रोका जा सका। 1908 में कुछ युवा तुर्क स्वयं को संगठित कर तुर्की में संसदीय शासन स्थापित करने में सफल हुए। इस ‘युवा तुर्क क्रान्ति’ ने अनेक समस्याओं को उत्पन्न कर दिया। ऑस्ट्रिया के शासकों को यह लगने लगा कि अगर तुर्की शक्तिशाली राष्ट्र बन गया तो उसकी बोस्निया-हर्जेगोविना पर अधिकार जमाने के मंसूबों पर पानी फिर जायेगा 7 अक्टूबर, 1908 को ऑस्ट्रिया ने औपचारिक रूप से बोस्निया और हर्जेगोविना के प्रान्तों पर अधिकार कर लिया । इस कार्यवाही से सर्बिया की चिन्ताएँ बढ़ गई, क्योंकि दोनों राष्ट्रों के निवासी सर्व जाति के थे। वह इस आधार पर उन्हें प्राप्त करने का सपना देख रहा था। सर्बिया के अखबारों में औस्ट्रिया पर बलिन सन्धि की अवहेलना का आरोप प्रकाशित हुआ। सर्बिया युद्ध की तैयारी करने लगा उसे यह विश्वास था कि सबव-सरुत्राववाद का समर्थक रूस उसकी मदद करेगा। इसी समय ऑस्ट्रिया का पक्ष लेते हुए जर्मनी ने भी चेतावनी दे डाली कि आगर सपक सर्बिया को सैनिक मदद करेगा तो वह ऑस्ट्रिया के साथ है। ऐसी स्थिति में रूस पीछे हर गया। इस प्रकार
बोस्निया प्रकरण को तो विराम मिल गया परन्तु अन्तरष्ट्रीय वातावरण अशान्त हो गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि बाल्कन समस्या का हल संघर्ष से ही होगा।

बोस्निया प्रकरण में रूस अपमानित हुआ। इसलिए उसने अपने अपमान का अस्ट्रिया से प्रतिशोध
लेने के लिए बाल्कन प्रदेशों को संगठित किया और रूस की प्रेरणा से 1912 में सर्बिया एवं बुल्गेरिया के मध्य सन्धि हुई। यह ऑस्ट्रिया के खिलाफ थी। दूसरी सन्धि मार्च, 1912 में ही बुल्गेरिया एवं यूनान के मध्य हुई। चह तुर्कों के खिलाफ थी। अगस्त में मांटीनिप्रो इस संघ में शामिल हो गया। इन सन्धियों के पश्चात् बाल्कन प्रदेश के चार राज्यों यूनान, सर्बिया, बुल्गेरिया तथा माण्टीनिग्रो को मिलाकर बाल्कन संघ का निर्माण हुआ। जिससे कालान्तर में यूरोपीय शान्ति पर खतरे के बादल मंडराने लगे और अन्ततः यूरोप में दो बाल्कन युद्ध हुुुुआ ।

बाल्कन युद्ध (1912-1913)

तुर्की की दयनीय स्थिति, युवा-तुर्क आन्दोलन से उत्पन्न अराजक माहौल ने बाल्कन प्रदेशों को
मेसीडोनिया की ओर आकृष्ट किया। ब्लिन सन्धि के अनुसार मेसीडोनिया को तुर्की के संरक्षण में रखा गया था। इस क्षेत्र में बुल्गर, सर्व एवं यूनानी-तीनों जातियों के लोग निवास करते थे। ये तीनों ही जातियाँ मेसीडोनिया के भू-भाग को अपने-अपने राज्यों में मिलाना चाहती थी युवा तुर्कों ने मेसिडोनियाई विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया। तुर्की की इस दमनात्मक रवैये के कारण बाल्कन संघ ने 1912 में तुर्की पर आक्रमण कर दिया। बाल्कन के इस प्रथम युद्ध (1912) में सर्बिया, बुल्गेरिया, यूनान, मांटीनिग्रो ने यूरोप से तुर्की साम्राज्य को लगभग समाप्त कर दिया, तुर्की ने आत्मसमर्पण कर लिया और इंग्लैण्ड के प्रयासों से 30 मई, 1913 को ‘लन्दन सन्धि’ हुई। लन्दन सन्धि ने बाल्कन प्रायद्वीप के राजनीतिक मानचित्र को नये सिरे से तैयार किया। स्वतनत्र अल्बेनिया की स्थापना हुई तथा मेसिडोनिया को यूनान, बुल्गेरिया और सर्बिया के मध्य विभाजित कर दिया। यूनान को सैलोनिका, सर्बिया को उत्तरी एवं दक्षिणी मेसिडोनिया प्राप्त हुआ। श्रेस और एजीयन सागर के तटीय प्रदेश बुल्गेरिया को दिया जाना तय हुआ। इसके अलावा एडियानोपल भी मिला। इस प्रकार लन्दन सन्धि ने बाल्कन राष्ट्रवाद के विजय रथ को आगे बढ़ाते हुए तुर्की साम्राज्य को खत्म कर दिया।
लन्दन सन्धि में ही द्वितीय बाल्कन युद्ध (1913) के बीज निहित थे। यह युद्ध तुर्की के खिलाफ नहीं,
स्वयं बाल्कन प्रदेशों के मध्य होना था। मेसिडोनिया के विभाजन के मामले पर बाल्कन संघ के सदस्यों के मध्य उभरे मतभेदों के कारण बाल्कन संघ विघटन की बलि चढ़ गया। बाल्कन प्रदेश को लेकर मची लूट- खरसोट के कारण जून, 1913 में बुल्गारिया ने सर्बिया और यूनान पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार द्वितीय बाल्कन युद्ध की शुरुआत हुई। तुर्की ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बुल्गेरिया के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और एड्रियानोपल पर पुनः अधिकार कर लिया। 10 अगस्त, 1913 को बुखारेस्ट की सन्धि के तहत् द्वितीय बाल्कन युद्ध समाप्त हुआ। इसके अनुसार उत्तरी मेसिडोनिया का भाग सर्बिया को तथा मेसिडोनिया का दक्षिणी भाग एवं मध्य यूनान को मिला। बुल्गेरिया से उत्तर-पूर्व की संकरी पट्टी रूमानिया को प्राप्त हुई। तुर्की को लन्दन सन्धि से खोया हुआ साम्राज्य पुनः प्राप्त हो गया। इस सन्धि से बुल्गेरिया को सबसे अधिक हानि हुई।

बाल्कन युद्धों से सर्बिया की शक्ति और प्रभाव में आशातीत वृद्धि हुई। लेकिन इनसे आस्ट्रिया दु:खी
हुआ क्योंकि उसे यह भय सताने लगा कि सर्बिया के स्लाव लोग संगठित होने के बहाने ऑस्ट्रिया के स्लावों को भड़का सकते हैं। इसलिए ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में द्वेष उत्पन्न हो गया। 1914 में ऑस्ट्रिया अधिकृत बोस्निया की राजधानी सेराजेवो में आस्ट्रिया के राजकुमार फडीनेण्ड की 28 जून, 1914 को हत्या कर दी गई। इसके लिए ऑस्ट्रिया ने सर्बिया को दोषी मानते हुए उस पर आक्रमण कर दिया। यह प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत थी। इस प्रकार पूर्वी समस्या, जिसे इतिहासकार मैरियट जटिल और विस्फोटक मानता था, वास्तव में साम्राज्यवाद एवं राष्ट्रवाद के टकरावों और राष्ट्रों की अनिवार्य विजय का प्रतीक थी।

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