फ्रांस की क्रान्ति : प्रगति एवं परीक्षण के 03 चरण

फ्रांस की क्रान्ति : प्रगति एवं परीक्षण के 03 चरण

फ्रांस की क्रान्ति का काल स्थूल रूप से 1789 से 1799 के मध्य रखा जाता है। 17 जून, 1789 को तृतीय एस्टेट के लोगों द्वारा ‘राष्ट्रीय महासभा’ की घोषणा तथा 20 जून, 1789 को उनके द्वारा ली गई ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ से क्रान्ति का आरम्भ हुआ, इसके बाद क्रान्ति विभिन्न चरणों से गुजरी, और 1799 में, नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा सत्ता-अधिग्रहण के साथ, क्रान्ति समाप्तप्रायः हो गई। डेविड थामसन ने क्रान्ति के उपर्युक्त काल (1789 से 1799) को ‘क्रान्तिकारी दशक’ की सं्ा दी है। यह इल्लेखनीय है कि इस दशक के प्रारम्भिक छ: वर्षों (1789 से 1795) को क्रान्ति का वेगवान काल माना जा सकता है, इसके बाद के काल (1795 से 1799) में क्रान्ति की लहरें कमजोर एवं शिथिल पड़ें गयीं। फ्रांस के ‘क्रान्तिकारी दशक’ (1789 से 1799) का अध्ययन निम्नलिखित चरणों में किया जा सकता
क्रान्ति का प्रथम चरण : राष्ट्रीय महासभा (1789-1791)-फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र की स्थापना
क्रान्ति का द्वितीय चरण : विधान निर्माणी सभा (1791-92) तथा रष्ट्रीय सम्मेलन (1792-95) फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना
क्रान्ति का तृतीय चरण : डाइरेक्टरी या निर्देशक मण्डल का शासन (1795-1799) पतनोन्मुखी गणतन्त्र

क्रान्ति का प्रथम चरण : राष्ट्रीय महासभा (1789-1791) –
फ्रांस में सवैधानिक राजतन्त्र की स्थापना

‘राष्ट्रीय महासभा’ (National Assembly), जिसे ‘संविधानी सभा’ (Constituent Assembly) भी कहा जाता है, ने फ्रांस में क्रान्तिकारी परिवर्तन की दशा में अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाये, जो इस प्रकार हैं:


0 1. सामन्तवाद, दास प्रथा एवं विशेषाधिकारों की समाप्ति (4 अगस्त, 1789)


4 अगस्त, 1789 की रात्रि को ‘राष्ट्रीय महासभा’ ने लगभग 30 प्रस्ताव पारित कर फ्रांस में सामंतवाद, दास प्रथा एवं सामाजिक वर्गों के विशेषाधिकारों की समाप्ति कर दी । सामन्ती करों, अधिकारों एवं न्यायालयों को समाप्त घोषित कर दिया। दास प्रथा बंद कर दी गई । चर्च द्वारा लिए जाने वाले धार्मिक कर ‘टाइथ’ तथा पादरियों के विशेषाधिकारों को भी समाप्त कर दिया गया। पदों की बिक्री पर रोक लगा दी गई, फ्रांस के सभी निवासियों को सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति के लिए समान रूप से योग्य घोषित कर दिया गया। लगभग सभी प्रकार के वर्ग भेद समाप्त कर दिये गये एक सप्ताह के अन्दर, उपर्युक्त सभी प्रस्तावों के आधार पर एक आज्ञप्ति जासै कर दी गई जिसका शीर्षक था-“सामन्ती व्यवस्था की समाप्ति” (Abolishing the feudel system)। लुई सोलहवें ने इस आज्ञप्ति पर हस्ताक्षर कर दिये। यह आज्ञप्ति फ्रांस में क्रान्ति की दिशा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके साथ फ्रांस में वर्गभेद पर आधारित पाप्परिक सामाजिक व्यवस्था को वैधानिक तौर पर समाप्त कर दिया गया। जैसा कि क्रोपोरटकिन (दि ग्रेट फ्रेंच रिवोल्यूशन) ने लिखा है,’4 अगस्त की रात्रि फ्रांस की क्रान्ति की महान तिथियों में से एक है, इसने क्रान्तिकारी आन्दोलन के एक महान् चरण को सम्पन्न किया ।

02 मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा (27 अगस्त, 1789)

राष्ट्रीय महासभा का एक दूसरा महान् कार्य था, व्यक्तिगत अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं की औपचारिक घोषणा । इस प्रपत्र को नाम दिया गया “मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the rights of man and of the citizen)। इस घोषणा की पृष्ठभूमि में ब्रिटेन का ‘मेग्नाकाटो’ एवं ‘ अधिकारों का विधेयक’; अमेरिका में स्वतन्त्रता की घोषणा का पत्र’; तथा रूसो की विचारधारा, इन तीनों की प्रेरणायें कार्य कर रहीं थी। फ्रांस की राष्ट्रीय महासभा द्वारा 27 अगस्त, 1789 की जारी डपयुक्त प्रपत्र प्रजातीन्त्रिक भावना का एक महत्त्वपूर्ण उद्घोष
था, इसने न केवल फ्रांस की क्रान्ति को एक वैचारिक पीठिका प्रदान की, बल्कि परवर्तीकालीन राजनीतिक चिन्तन को भी व्यापक रूप से प्रभावित किया।


फ्रांस की राष्ट्रीय महासभा द्वारा जारी प्रपत्र ‘”मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” के अनुसार, सभी मनुष्य अधिकारों की दृष्टि से स्वतन्त्र एवं समान रूप से जन्मे हैं और रहे हैं (Men are born and remain the free and equal in rights); सम्प्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है; स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत सम्पत्ति, सुरक्षा तथा अत्याचारों का विरोध-ये मनुष्य के नैसर्गिक अधिकार हैं; विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मनुष्य के बेशकीमती अधिकारों में से एक है; विधि या कानून जन इच्छा की अभिव्यक्ति है (Law is the expression of the general will) और सभी नागरिकों को विधि के निर्माण में भाग लेने का अधिकार है; उन्हें देश की वित्तीय व्यवस्था को नियन्त्रित करने का भी अधिकार है; राज्य के सभी अधिकारी जनता के प्रति उत्तरदायी होंगे; धार्मिक भामलों में सहिष्णुता का ध्यान रखा जायेगा, आदि।

इपयुक्त घोषणा-पत्र फ्रास में ‘पुरातन व्यवस्था का मृत्यु प्रमाण-पत्र’ था और इसने फ्रांस की जनता के
लिए समानता और स्वतन्त्रता पर आधारित नवजीवन की ख़रिड़कियाँ खोल दीं। यह प्रजातान्त्रिक एवं गणतन्त्रवादी विचारों के इतिहास का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज था । लार्ड एक्टन के शब्दों में, ‘इस घोषणा-पत्र की शक्ति नेपोलियन की सभी सेनाओं से अधिक थी।

03 फ्रांस में प्रशासनिक एकरूपता एवं स्थानीय स्वशासन की स्थापना

राष्ट्रीय महासभा ने एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह भी किया कि पुरातन व्यवस्था में प्रचलित फ्रांस के पेचीदा और उलझे हुए प्रशासनिक विभाजन के स्थान पर, एक नवीन एकात्मक प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की। फ्रांस को 83 भागों में बांट दिया गया जो क्षेत्र एवं जनसंख्या की दृष्टि से लगभग समान थे इन भागों को इसके बाद ‘कैण्टन्स’ (Contons) और ‘कम्यून्स’ (Communes) में उपविभाजित किया गया इस प्रकार के विभाजन फ्रांस में अभी भी प्रचलित हैं स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की केन्द्र से होने वाली नियुक्तियाँ बन्द कर दी गईं, स्थानीय समितियों द्वारा उनके चयन की व्यवस्था लागू कर दी गई । स्थानीय समितियों को व्यापक अधिकार प्रदान किये गये। अदालतों की नयी व्यवस्था लागू कर दी गई, यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित कानूनों की विविधता में एकरूपता लाने का कार्य अधूरा रह गया । इस कार्य को बाद में नेपोलियन ने पूरा किया।

04 राष्ट्रीय भावना का सुदृढ़ीकरण

राष्ट्रीय भावना की आकस्मिक तेजस्विता फ्रांस की क्रान्ति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। ‘राष्ट्रीय महासभा’ ने फ्रांस में राष्ट्रीयता की भावना को और अधिक सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया। राष्ट्रीय शिक्षा, राष्ट्रीय सैनिक सेवा तथा राष्ट्रभक्ति के उत्सव-इसी दिशा में प्रयास थे राष्ट्रीय भावना से ‘राष्ट्रीय आत्म-निर्धारण’ (National Self-detcrmination) के सिद्धान्त का उदय हुआ। राष्ट्रीय महासभा ने रोन नदी के किनारे बसे शहर आविन्यों (Avignon) जो मध्यकाल से ही पोप के अधीन था, फ्रांसीसी विरोध के बावजूद आविन्यों में एक जनमत निर्धारण (plebiscite) हुआ, जिसके अनुकूल फैसले के आधार पर राष्ट्रीय महासभा ने आविन्यों को फ्रांस में मिला लिया। इस घटना से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक नयी परम्परा की शुरूआत हुई।

05 वित्तीय संकट का समाधान

राष्ट्रीय महासभा का एक कार्य फ्रांस को आर्थिक दिवालियेपन की स्थिति से उबारना था। यह बिना किसी विशेष व्यवस्था के संम्भव नहीं था। राष्ट्रीय महासभा ने देखा कि चर्च के अधीन फ्रांस की लगभग 1/5 भूमि है । राष्ट्रीय महासभा ने इस भूमि को जब्त कर अपने अधिकार में ले लिया और उसे सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित कर दिया। इस भूमि की सुरक्षा निधि के आधार पर राष्ट्रीय महासभा ने फ्रांस में कागजी मुद्रा ‘आसियाँ (assignats)’ का प्रचलन किया इस कागजी मुद्रा के प्रचलन ने फ्रांस को तात्कालिक वित्तीय संकट से उबार लिया।

06 ‘पादरी तम्त्र का नागरिक संविधान’ (12 जुलाई, 1790 )


राष्ट्रीय महासभा ने 12 जुलाई, 1790 को ‘पादरी तन्त्र के नागरिक संविधान’ (Civil Constitution of the Clergy) को लागू कर दिया, जिसके द्वारा फ्रांस के सभी धर्माधिकारी, बिशप से लेकर यजमानी पुरोहित (parish priests) तक, एक नागरिक संगठन ( Civil body) के अन्तर्गत ले लिये गये; तद्नुसार इनका चुनाव अब जनता द्वारा किया जायेगा, उन्हें वेतन राज्य की ओर से मिलेगा, और ‘विदेशी’ पोप से उनका सम्बन्ध नाममात्र का रह जायेगा। दिसम्बर, 1790 में राष्ट्रीय महासभा ने एक और आज्ञप्ति जारी की जिसके अनुसार फ्रांस के कैथोलिक मूल के लोगों को ‘राष्ट्रीय आत्मनिर्धारण’ की मांग करने के लिए प्रेरित किया 1791 में, पोप के पादरीतन्त्र को ‘नागरिक संविधान’ के प्रति आस्था की शपथ लेना अनिवार्य कर दिया गया। कट्टर कैथोलिकों को यह बात नागवार गुजरी और तत्कालीन पोप पॉयस पष्ठ ने भी नाराज होकर फ्रांस के पादरी तन्त्र को उक्त शपथ लेने के लिए मना कर दिया। इसके बाद फ्रांस के कैथोलिक पादरी दो भागों में विभाजित हो गये ‘न्याय-सभ्य पादरी’ (Juring priests), जिन्होंने फ्रांस के नागरिक संविधान के प्रति आस्था की शपथ ले ली तथा ‘न्याय-असभ्य पादरी’ (non-juring priests), जिन्होंने उक्त शपथ नहीं ली।’न्याय-सभ्य पादरियों’ को पोप ने ईसाई धर्म से निष्कासित कर दिया तथा न्याय-असभ्य पादरियों’ को राष्ट्रीय महासभा ने वेतन आदि से वंचित कर दिया।

राष्ट्रीय महासभा की उक्त कार्यवाहियों का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि फ्रांस के कैथोलिक अनुयायी, क्रान्ति के खिलाफ हो गये।

07 फ्रांस का संविधान (1791)

राष्ट्रीय महासभा का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य यह था कि इसने फ्रांस के प्रथम लिखित संविधान का निर्माण किया और 1791 में उसे लागू कर दिया । इस संविधान पर राजा के हस्ताक्षर थे, यद्यपि राजा ने स्वेच्छा से नहीं, बल्कि विवशता एवं विकल्पहीनता की स्थिति में ही हस्ताक्षर किये थे। यह यूरोप के किसी भी देश में अपनाये जाने वाला प्रथम लिखित संविधान था, और इससे।कुछ समय पूर्व ही अमेरिका का संविधान लागू किया गया था (1787 में निर्मित तथा 1789 में लागू)।
राष्ट्रीय महासभा द्वारा पारित फ्रांस में 1791 का संविधान, राज्य की विधायी, कार्यकारी एवं न्यायिक
शक्तियों के विभाजन पर आधारित था। इस विभाजन की उपयोगिता फ्रांस के विचार मान्तेस्क्यू ने अपने लेखों।में स्पष्ट की थी, तथा इस प्रकार के विभाजन की व्यवस्था अमेरिका के संविधान में भी थी। दूसरे, सरकार के राजतंत्रात्मक स्वरूप को बनाये रखा गया, लेकिन राजा अव एक सीमित शक्ति वाला संवैधानिक शासक था; उसे राज्य का वेतनभोगी प्रमुख बना दिया गया, लेकिन प्रभुसत्ता राष्ट्र या जनता के हाथों में निहित थी । संविधान।द्वारा फ्रांस के सभी निवासियों को कानून के समक्ष समान माना गया, किसी भी व्यक्ति या वर्ग के विशेषाधिकारों।को स्वीकार नहीं किया गया, तथा सभी नागरिकों के लिए अभिव्यक्त एवं धर्म की स्वतन्त्रता स्वीकार की गई।

राज्य की विधायी शक्ति एक ‘विधान निर्मात्री सभा’ या ‘विधान सभा’ (Legislative Assembly) को प्रदान की गई, जिसके लगभग 745 सदस्यों का चयन, दो वर्ष के लिए, फ्रांस के केवल “सक्रिय” नागरिकों द्वारा किया जायेगा स्पष्ट है कि नई विधानसभा के प्रतिनिधियों के चुनाव का अधिकार सभी को नहीं प्रदान किया। “सक्रिय” नागरिकों से तात्पर्य उन व्यक्तियों से था जो एक निश्चित कर सरकार को अदा करते थे: अन्य नागरिकों को “निष्क्रिय” मानकर उन्हें मताधिकार से वंचित रखा गया। इस प्रावधान से जाहिर होता है। नई विधानसभा में बुर्जुआ या मध्यमवर्ग का वर्चस्व बनाये रखने का प्रयास किया, तथा निम्न वर्गों की उपेक्षा की गई। जैसा कि मैजेनिस एवं ऐपल ने लिखा है, ‘गोयाकि 1791 का संविधान अपने जमाने का आमूल परिवर्तनकारी संविधान लगता है, लेकिन यह बहुत ज्यादा लोकतन्त्रात्मक नहीं है।

राज्य का कार्यकारी अध्यक्ष राजा को बनाया गया, जिसका पद आनुवंशिक होगा। राजा के विधान-
निर्माण सम्बन्धी सभी अधिकार छीन लिये गये, उसे सिर्फ ‘स्थगनात्मक वीटो’ (Suspensive veto) का अधिकार था, अर्थात् विधानसभा द्वारा पारित किसी आदेश के क्रियान्वयन को वह कुछ समय के लिए रोक।सकता था। राजा के नागरिक एवं सैनिक प्रशासन सम्बन्धी अधिकार भी नगण्यप्राय थो। हेज के शब्दों में ‘1789 से 1791, इन दो वर्षों के अन्तराल में राजा की शक्ति में बड़ी जबर्दस्त गिरावट आई ।

राज्य के न्यायिक स्वरूप को पूरी तरह रूपान्तरित कर दिया गया । इससे पूर्व, जज अपने पदों को और उनके साथ जुड़े विशेषाधिकारों को खरीदा करते थे, तथा पैतृक सम्पत्ति के रूप में उन्हें अपनी संतानों को हस्तान्तरित कर देते थे। इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया अब सभी स्तरों पर जजों के चयन की व्यवस्था की गई, और उनके कार्यकाल की अवधि भी दो से चार वर्ष तक सीमित कर दी गई ।

सिन्डर के अनुसार, ‘1791 का संविधान मध्यमवर्ग द्वारा किया गया एक ऐसा प्रयास था जिसके द्वारा
उन्होंने क्रान्ति को एक ऐसे बिन्दु पर स्थिर करने का प्रयास किया जो उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप था । क्रोपोटकिन (दि ग्रेट फ्रेंच रिवोल्यूशन) के शब्दों में, ‘संविधान सभा द्वारा किया गया कार्य निस्संदेह मध्यमवर्गीय था, लेकिन विशेषाधिकारों की समाप्ति एवं समानता के भाव को जगाना ही अपने आप में एक विशाल कार्य बहुत था।

राष्ट्रीय महासभा के कार्यों का मूल्यांकन

राष्ट्रीय महासभा ने अपने छोटे-से कार्यकाल (1789- 1791) में फ्रांस की क्रान्ति के आरम्भिक एवं महत्त्वपूर्ण चरण को सम्पन्न कर दिया। इसने निरंकुश राजतन्त्र तथा विशेषाधिकार युक्त सामाजिक वर्गों पर आधारित फ्रांस की पुरातन व्यवस्था (old regime) को समाप्त कर दिया। यह कार्य राष्ट्रीय महासभा द्वारा जनसंकल्प की सशक्त एवं व्यापक अभिव्यक्ति की पृष्ठभूमि में किया गया हेज के शब्दों में, ‘इतने जबर्दसत विध्वंस का कार्य, इतने अल्प समय के अन्तराल में, विधायकों की किसी
अन्य संस्था द्वारा नहीं किया गया दूसरी ओर राष्ट्रीय महासभा ने फ्रांस में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एवं समानता पर।आधारित नये प्रजातान्त्रिक एवं राष्ट्रीय ढाँचे की नींव भी रख दी। यद्यपि राष्ट्रीय महासभा द्वारा लागू किये गये।1791 के संविधान का मध्यमवर्गीय पूर्वाग्रह स्पष्ट था, लेकिन उसके बावजूद यह असमानता से समानता की।ओर एक विशाल कदम था।

क्रान्ति का द्वितीय चरण : विधाननिर्मात्री सभा (1791-92) एवं राष्ट्रीय सम्मेलन (1792-95)-फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना

‘राष्ट्रीय महासभा’ द्वारा 1791 में लागू किये गये फ्रांस के संविधान के अनुसार, फ्रांस में विधान निर्मात्री
सभा (Legislative Assembly) के निर्माण के लिए चुनाव हुये और 1 अक्टूबर, 1791 को इस विधान निर्मात्री सभा की पहली बैठक हुई। इस सभा में 745 सदस्य थे जो सभी नये एवं अनुभवहीन थे, क्योंकि राष्ट्रीय महासभा के भंग होने से पूर्व उसके सदस्यों ने स्वेच्छा से यह प्रस्ताव पारित कर दिया था कि इस महासभा का।कोई भी सदस्य विधाननिर्मात्री सभा का सदस्य नहीं बनेगा।

राष्ट्रीय महासभा के कार्यों से फ्रांस के कुछ वर्ग असंतुष्ट थे। एक वर्ग प्रतिक्रियावादियों (Reactionaries) का था, जिनका मानना था कि इस महासभा ने बहुत अधिक विध्वंस का कार्य कर दिया था। दूसरा वर्ग अतिवादियों या उग्र सुधारवादियों (Radicals) का था, जिनका कहना था कि राष्ट्रीय महासभा ने परिवर्तन की।दिशा में बहुत कम कार्य किया था।

राजनीतिक क्लबवाद

फ्रांस में राजनीतिक क्लबों की संस्कृति पनप रही थी। इनमें से उग्र सुधारवादियों के दो क्लब महत्त्वपूर्ण थे – ‘कार्डेलिए (Cordelier) क्लब’ तथा ‘जैकोबिन (Jacobin) क्लब’। कार्डेलिए क्लब शुरू से ही उग्र सुधारवादी था और उस समय के अनेक प्रमुख क्रान्तिकारी इसके सदस्य थे-मारा (Marat), दांतों (Danton), हेबर्ट (Habcrt) तथा कामीय देमूलें (Camille Desmoulins)। यह क्लब पेरिस के मजदूर वर्ग में लोकप्रिय था, तथा पेरिस के बाहर इसका अधिक प्रचार नहीं था।।राजपरिवार द्वारा वैरेनिज की ओर पलायन के प्रयास की घटना के बाद, यह क्लब फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना के लिए कटिबद्ध था।

‘जैकोबिन क्लब’ फ्रांस का एक अत्यन्त लोकप्रिय क्लब था। इस क्लब ने बाद में फ्रांस के सजनीतिक घटनाक्रम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारम्भ में इस क्लब का रुख नरम था, लेकिन बाद में यह अत्यधिक उग्र सुधारबादी बन गया। इस क्लब का सबसे प्रभावशाली नेता रोबेसपियरे (Robespiere) था विधाननिर्मात्री सभा के अनेक सदस्य भी इस क्लब के सदस्य थे। फ्रांस के विभिन्न नगरों एवं प्रान्तों में जैकोबिन क्लब की लगभग 2,000 शाखायें थीं जैकोबिन क्लब फ्रांस में विधाननिर्मात्री सभा का प्रतिद्वन्द्वो बन गया, जबकि यह।एक निजी संगठन था।

विधाननिर्मात्री सभा में एक और महत्त्वपूर्ण वर्ग था । इस वर्ग के लोगों को ‘जिरोन्दिस्त’ (Cirondists) कहा जाता था। ये लोग भी फ्रांस में गणतन्त्रवाद की स्थापना के समर्थक थे। इनका गणतन्त्रवाद यूनान एवं।रोम के ब्लासिकल आदर्श से प्रेरित था इस वर्ग के प्रमुख नेता थे-ब्रिसो (Brissot), वर्नियाँ (Vergniand),।कन्डोरसे (Condorcet) तथा मदाम रोलां (Madam Roland)।

विधान निर्मात्री सभा में संविधानवादियों (Constitutionalists) का भी एक वर्ग था, इन्हें ‘फहेयाँ’ (Feuillants) कहा जाता था।

फ्रांस का आस्ट्रिया तथा प्रशा से युद्ध ( 1792 )

फ्रांस में क्रान्ति का तेजी से प्रसार हो रहा था और यूरोप के अनेक देशों में राजतन्त्र ने अभी भी जड़ें जमा रखी थी। इस प्रश्न पर फ्रांस और यूरोप के अन्य देशों में अन्तर्राष्ट्रीय तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। आस्ट्रिया और प्रशिया की हरकतों से परेशान होकर फ्रांस।ने अप्रेल, 1792 में आस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध में प्रशा ने आस्ट्रिया का साथ दिया।

फ्रांसोसी सेनाओं को अनेक स्थलों पर पराजय का सामना करना पड़ा। इस दौरान, फ्रांसीसियों को यह
जानकारी मिली कि राजा लुई सोलहवें तथा रानी मेरी एंतोइनेत ने फ्रांसीसी आक्रमण की गुस योजनाओं की।सूचना आस्ट्रिया की सेना को भिजवा दी थी। उधर आस्ट्रिया एवं प्रशिया की संयुक्त सेनाओं के कमाण्डर সविक ने यह घोषणा कर दी (25 जुलाई, 1792) कि यदि फ़्रांस के राजा, रानी या राजपरिवार के किसी । सदस्य को कोई नुकसान पहुँचाया गया तो पेरिस को जला दिया जायेगा ब्रुन्सविक की इस घोषणा से फ्रांस।के निवासियों का यह संदेह पक्का हो गया कि लुई सोलहवां देश के दुश्मनों से मिला है।

राजतन्त्र की समाप्ति

फ्रांस की करुद्ध जनता ने 10 अगस्त, 1792 को राजा के निवास-स्थान, ट्विलरी (Tuilleris) के महल पर धावा बोल दिया। राजा एवं राजपरिवार के सदस्यों ने भागकर विधान निर्मात्री सभा के पास शरण ली; वहाँ उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी के पीछे, एक छोटे-से कमरे में रखा गया, जहाँ वे लगभग तीस घंटे तक रहे। उधर क्रुद्ध भीड़ ने ट्विलरी के शाही सुरक्षा-अधिकारियों को मार डाला और पूरे महल को तहस-नहस कर दिया। विधान निर्मात्री सभा में जैकोबिन तथा जिरोन्दिस्त गुटों के सदस्यों ने यह
प्रस्ताव पारित करवा दिया कि रांजा को पदच्युत कर दिया जाये तथा फ्रांस में राजतन्त्र को पूरी तरह समाप्त कर।दिया जाये। चूँकि 1791 का संविधान राजतन्त्रात्मक था, अत: विधान निर्मात्री सभा ने स्वयं को भंग कर ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ (National Convention) के चुनाव की घोषणा की; इसी राष्ट्रीय सम्मेलन को फ्रांस के नये गणतन्त्र के संविधान के निर्माण का दायित्व सौंपा गया। राष्ट्रीय सम्मेलन के चुनाव के लिए फ्रांस के सभी निवासियों को मत देने का अधिकार प्रदान किया गया इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र का अन्त हो।गया, और गणतन्त्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।

राष्ट्रीय सम्मेलन (1792-1795) एवं पफ्रांस का प्रथम गणतन्त्र

‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ (National Convention) क्रान्तिमय फ्रांस की तोसरी सभा थी जो तीन वर्ष तक अस्तित्व में रही (20सितम्बर, 1792 से 26 अक्टूबर, 1795 तक)। ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ का मुख्य दायित्व था-फ्रांस के गणतंत्रात्मक संविधान का निर्माण जिसकी आवश्यकता राजा के पदच्युत किये जाने के कारण पड़ी थी।

राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा पारित पहला अधिनियम यह था कि “फ्रांस में राजतन्त्र की समाप्ति की जाती है”
(21 सितम्बर, 1792)। इसके बाद 22 सितम्बर, 1792 से फ्रांस में गणतन्त्र के प्रथम वर्ष की गणना का
प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रकार फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हो गई ।

राष्ट्रीय सम्मेलन के तीन वर्ष के कार्यकाल में, क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण दूसरा चरण सम्पन्न हुआ। राष्ट्रीय
सम्मेलन का कार्य इस दृष्टि से दो प्रकार का था। प्रथम, इसने विदेशों के साथ युद्धों में फ्रांस को लगातार विजयश्री दिलवायी और इस प्रकार विदेशियों की क्रूर दृष्टि से बचाकर, फ्रांस की क्रॉंति के प्रथम चरण में हये।(1789-1791) सामाजिक परिवर्तनों को, अक्षुण्ण एवं स्थायी बना दिया। द्वितीय इसने एक गणतंत्रात्मक।सरकार की स्थापना की जो कि प्रजातान्त्क सिद्धान्तों पर आधारित थी।

‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के समक्ष अनेक जटिल समस्यायें थीं। लेकिन उनका क्रमश: सफलतापूर्वक समाधान
कर लिया गया। ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ के प्रतिनिधियों में लगभग 200 जिरोन्दिस्त वर्ग के थे, जिनके प्रमुख नेता थे ब्रिसो वर्नियाँ, कन्डोरसे तथा टॉमस पेन सम्मेलन के अन्तर्गत 100 प्रतिनिधि जैकोबिन दल से सम्बद्ध थे, इन्हें ‘माउण्टेनिस्ट’ (Mountainists) भी कहा जाता था क्योंकि ये सदन में ऊँची पर्वत ( माउन्टेन) जैसी सीटों पर बैठते थे इस दल के प्रमुख नेता थे-दांतों रोबेसपियरे, का्नों एवं सेंट जस्ट। जिरोन्दिस्त तथा जैकोबिन-_ दोनों ही वर्ग के प्रतिनिधि गणतन्त्रवादी विचारधारा के समर्थक थे, उनमें अन्तर कुछ व्यावहारिक प्रश्नों पर था । जैसे कि जैकोबिन वर्ग के लोग फ्रांस के प्रशासन में प्रेरित की नेतृत्वकारी भूमिका देखना चाहते थे, जिरोन्दिस्तो को यह पसन्द नहीं था नेशनल सम्मेलन के प्रतिनिधियों में, जिरोन्दिस्तो तथा जैकोबिनों के अतिरिक्त, बहुमत उन सदस्यों का था जिन्हें ‘सपाट’ (Plain) कहा जाता था, उनकी अपनी कोई निश्चित मान्यतायें नहीं थीं और वे समय की आवश्यकता के अनुसार मतदान करते थे।


लई सोलहवें को प्राणदण्ड : लुई सोलहवें पर फ्रांस के शत्रुओं से मिलीभगत का गम्भीर आरोप था ।
राष्ट्रीय सम्मेलन ने उस पर दिसम्बर, 1792 में मुकदमा चलाया, उसे सर्वसम्मति से दोषी पाया गया और मतदान के द्वारा बहुमत से उसे मृत्यु-दण्ड को सजा सुनाई गई। 21 जनवरी, 1793 को पेरिस के एक सार्वजनिक चौराहे पर लुई सोलहवें का सिर ‘गिलोटिन’ (कर्त्तन-यंत्र) द्वारा धड़ से अलग कर दिया गया।

फ्रांस के विरुद्ध यूरोपीय राष्ट्रों का प्रथम संयुक्त गठबंधन (1793)

राष्ट्रीय सम्मेलन ने बड़े जोशोखरोश से नवम्बर, 1792 में यह घोषित किया कि फ्रांस समूचे यूरोप में स्वातन्त्र्य एवं सुधार की भावना को प्रसारित करेगा यूरोप के सारे राजतन्त्रवादी राष्ट्र चौकन्ने हो गये। लुई सोलहवें को मृत्युदण्ड दिये जाने से वे और दुःखी हो गये। 1793 विरुद्ध एक संयुक्त गठबन्धन (Coalition) बना लिया, जिसका उद्देश्य था, राजा की हत्या करने वाले क्रान्तिकारी फ्रांस का दमन। इस ऊपरी तर्क की पृष्ठभूमि में, उत्त रा्ट्रों की आन्तरिक इच्छा फ्रांस के भू-क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लेने की थी।

प्रारम्भ में, कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि उपर्युक्त गठबन्धन की संयुक्त सेनायें फ्रांस पर अधिकार
कर लेंगी; इन सेनाओं ने बेल्जियम तथा राइन के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था और वे पेरिस जाने वाले रास्तों की ओर चल पड़ी थीं। लेकिन कानो के अनुभवी नेतृत्व तथा जैकोबिन वर्ग के जबर्दस्त सहयोग से, राष्ट्रीय सम्मेलन ने 1793 के अंत तक लगभग 7.70,000 व्यक्तियों की एक क्रान्तिकारी सेना तैयार कर ली। इस सेना की सहायता से राष्ट्रीय सम्मेलन ने यूरोपीय राष्ट्रों के संयुक्त मोर्चे का सफलतापूर्वक सामना किया, और फ्रांस की भूमि से विदेशी सेनाओं को भगा दिया गया कानो के नेतृत्व में 1794 एवं 1795 में फ्रांस की सेनाओं ने एक के बाद दूसरी विजयें प्राप्त कीं। आस्ट्रिया एवं प्रशिया अपनी सुरक्षा के प्रति चिन्तित हो गये संयुक्त गठबन्धन विखण्डन की कगार पर की बजाय अब ‘विजय का प्रबन्धक’ (Organiser of Victory) कहा जाने लगा।

जैकोबिनों का वर्चस्व

राष्ट्रीय सम्मेलन के अन्तर्गत, सत्ता पर अधिकार प्राप्ति के लिए, जिरोन्दिस्तों तथा जैकोबिनों के मध्य निरन्तर संघर्ष चलता रहता था जिरोन्दिन लोग, जैकोबिनों को अवसरवादी कहते थे, तथा जैकोबिनों के अनुसार जिरोन्दिन ‘कुलीन गणतन्त्रवादी’ थे पेरिस की कम्यून ने इस दोनों के मध्य के झगड़े को मिटाने के लिए हिंसात्मक मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। पेरिस की कम्यून को जैकोबिनों का समर्थन प्राप्त था और इसके माध्यम से उन्होंने जिरोन्दिस्तों से छूटकारा पाने की तरकीब निकाली। पेरिस की कम्यून ने 31 मई से 2 जून, 1793 के मध्य जिरोन्दिस्तो के खिलाफ हिंसात्मक विद्रोह (insurrection) का आयोजन किया। इस विद्रोह में 60 तोपों के साथ 80,000 व्यकिति शामिल थे और इनका नेतृत्व जैकोबिन नेता, मारा (Marat) कर रहा था जो स्वयं भी सम्मेलन का सदस्य था विद्रोही सेनाओं ने ट्विलरि के नियमित सभास्थल पर राष्ट्रीय सम्मेलन को घेर लिया, तथा उसके माध्यम से 29 जिरोन्दिस्तों की गिरफ्तारी के आदेश जारी कराये। जैकोबिनों ने, पेरिस की कम्यून की सैनिक शक्ति के बल पर, ‘राष्ट्रीय सम्मेलन पर अपना वर्चस्च स्थापित कर लिया। 1793 में राष्ट्रय सम्मेलन ने फ्रांस की सर्वोच्च कार्यकारी शक्ति एक ‘नागरिक सुरक्षा समिति’ (Committee of Public Safety) को सॉंप दी जिसके प्रारम्भ में नौ एवं बाद में बारह सदस्य हो गये। इस समिति में प्रमुख जैकोबिन नेताओं-दांतों, रोबसपियरे, सेन्ट जस्ट तथा कार्नोट को रखा गया । इस समिति ने शीघ्र ही फ्रांस के सारे प्रशासनिक अधिकार अपने हाथ में ले लिये और अधिनायकवादी तरीके से कार्य करना आरम्भ कर दिया।

आतंक का शासन

उपर्युक्त समिति के माध्यम से जैकोबियन नेताओं ने, फ्रांस में शीघ्र एवं निर्विघ्न गणतन्त्र की स्थापना के कथित उद्देश्य की पृष्ठभूमि में, अधिनायकवादी शैली में ‘आतंक का शासन’ (The Reign of Terror) स्थापित कर दिया। इस कार्य के लिए दो और समितियाँ बनाई गई- ‘सामान्य सुरक्षा समिति’ (Committee of General Sccurity), तथा ‘क्रान्तिकारी न्यायालय’ (Revolutionary Tribunal)। ‘आतंक के शासन’ के अन्तर्गत जैकोबिन नेताओं ने राजतन्त्रवादियों, जिरोन्दिस्तो तथा गणतन्त्र के प्रति अविश्वास रखने वाले संदेहास्यद व्यक्तियों को, बड़ी भारी संख्या में, क्रान्तिकारी न्यायालय से मृत्युदण्ड।दिलवाकर, गिलोटिन के द्वारा मौत के घाट उतार दिया। फ्रांस में ‘आतंक के शासन’ द्वारा गिलोटिन के माध्यम से मारे गये व्यक्तियों की संख्या 16,500 के लगभग आंकी गई है। मृत्यु-दण्ड पाने वालों में फ्रांस की रानी मेरी एन्तोइनेत, मैडम रोलाँ तथा मैडम ड्यू बैरी भी शामिल थी। ‘आतंक का शासन’ चलाने वाले जैकोबिन नेताओं में भी आन्तरिक संघर्ष प्रारम्भ हो गये ।

रेबसपियरे ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुये अपने साथी जैकोबिन नेता, दांतों को भी ‘गिलोटिन’ पर चढ़वा दिया। इसके बाद चार महीने तक रोबसपियरे फ्रांस का सर्वेसर्वा बना रहा। बाद में, एक दूसरे वर्ग ने अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुये, रोबसपियरे को भी गिलोटिन।पर पहुँचा दिया (28 जुलाई, 1794) । रोबसपियरे की मृत्यु के बाद ही ‘आतंक का शासन’ समाप्त हो गया।
ग्रेट ब्रिटेन, स्पेन, हालैण्ड, पुर्तगाल, नेपल्स, आस्ट्रिया एवं प्रशा ने फ्रांस के गया। कार्नो को ‘सुरक्षा के प्रबन्धक’ (Organiser of Defcnce) फ्रांस में आतंक के शासन की समाप्ति को ‘थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया’ (Thermidorian Reaction) के नाम से जाना जाता है।

राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा किये गये नवसृजनात्मक कार्य एवं प्रयोग

विदेशी शक्तियों से युद्धरत रहने तथा गृह स्तर पर आन्तरिक कठिनाइयों में उलझे रहने के बावजूद तथा आतंक के शासन के मध्य भी, राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस में नवीन संस्थाओं तथा नवीन व्यवस्थाओं को स्थापित करने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रयास किये, जो इस प्रकार हैं-
(1) राष्ट्रीय सम्मेलन ने राष्ट्रीय महासभा द्वारा शुरू किये गये राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति के कार्यक्रम को आगे
बढ़ाया। फ्रांसीसी भाषा को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया गया और इस प्रकार के आदेश जारी किये गये कि सम्पूर्ण पफ्रांस के ‘एक तथा अविभक्त गणतन्त्र’ (Republic one and indivisible) क्षेत्र में शिक्षण एवं अनुदेशन का कार्य एकमात्र फ्रांसीसी भाषा में किया जायेगा ।
(2) सम्मेलन ने फ्रांस के विविध क्षेत्रों में प्रचलित अनेक प्रकार के कानूनों को समाप्त करने की दिशा
में, तथा उनके स्थान पर एकात्मक विधि संहिता लागू करने की दिशा में अनेक सार्थक प्रयास किये।
सामाजिक एवं अन्य क्षेत्रों में सुधार की दृष्टि से कुछ ऐसे कानून बना दिये गये जो पफ्रांस के सभी क्षेत्रों में स्वीकार्य होंगे। उदाहरण के लिए, सम्पत्ति पर पुरुषों के साथ महिलाओं का अधिकार भी स्वीकार कर लिया गया। ज्येष्ठाधिकार (primogcniture ) के नियम को समाप्त कर दिया गया । फ्रेंच उपनिवेशों में नीग्रो दास प्रथा समाप्त कर दी गई । सम्पूर्ण फ्रांस के क्षेत्र में तौलमाप की एक व्यवस्था, मीटरी पद्धति (metric system) को लागू कर दिया गया। बाद में अधिकांश देशों द्वारा यही पद्धति अपना ली गई ।


(3) राष्ट्रीय सम्मेलन में, एक प्रबल राष्ट्रीय सेना के निर्माण की दृष्टि से, फ्रांस के सभी स्वस्थ नागरिकों
के लिए किसी न किसी रूप में, सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी। यद्यपि इस कार्य से राष्ट्रीयता की भावनायें सुदृढ़ हुईं, लेकिन इसने यूरोप में सैनिकवाद के विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया।
(4) राष्ट्रीय सम्मेलन ने आर्थिक क्षेत्र में, जैकोबियन नेताओं के दबाव से, समाजवादी नीतियों के
क्रियान्वयन का प्रयास किया। सामन्ती अधिकार एवं द्वासप्रथा की समाप्ति की एवज में कुलीन वर्ग को क्षतिपूर्ति देने का जो आश्वासन पूर्व में दिया गया था, उसे रद्द कर दिया गया। इस बारे में मारा (Marat) का कहना था कि ‘अमीर लोगों ने गरीब लोगों की मज्जाओं से जो खून निकाला है, यह उसी का भारी प्रतिकार है।’ राष्ट्रीय सम्मेलन ने, बृहद् भू-सम्पत्ति वाले क्षेत्रों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया और उन हिस्सों को आसान शर्तों पर विक्रय के लिए प्रस्तुत किया जिससे कि अनेक लोग भूमि के स्वामी बन सके। निम्न वर्गों के हित की दृष्टि से, उत्प्रवासियों की सम्पत्ति को जब्त कर लिया गया धनी व्यक्तियों, कुलीनों तथा पादरियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। सम्मेलन ने “अधिकतम लोगों के हित में कानून” (laws of the maximum) के सिद्धान्त।का अनुसरण करते हुये अनाज एवं अन्य वस्तुओं की कीमतें निश्चित कर दीं तथा मजदूरी की दर भी निर्धारित कर दी। मनुष्यों में समानता की भावना का अहसास बनाये रखने की दृष्टि से, सम्मेलन ने यह अधिनियम।पारित किया कि फ्रांस के प्रत्येक व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी वर्ग का हो, “नागरिक” (citizen) कहकर
संबोधित किया जायेगा सरकारी दस्तावेजों में फ्रांस के पूर्व राजा लुई सोलहवें का उल्लेख उसके व्यक्तिगत नाम ‘नागरिक कापे’ (Citizen Capet) से किया जाने लगा और रानी मेरी एन्तोइनेत की अनत्येष्टि के खर्चे का विवरण सरकारी फाइलों में फ्रेंक खर्च किये गये” सम्पन्न वर्ग के लोगों द्वारा आलंकारिक वस्त्र धारण किये जाने की प्रथा को भी हतोत्साहित किया जाने लगा ।
(5) राष्ट्रीय सम्मेलन ने धर्म के क्षेत्र में कई अनूठे प्रयोग किये। राष्ट्रीय सम्मेलन ने, ‘आतंक के शासन
के दौरान’ ईसाई धर्म के प्रति वितृष्णा प्रदर्शित करते हुये, फ्रांस का वि- ईसाईकरण या अख्नीस्तीकरण।(dechristianize) करने का प्रयास किया। फ्रांस में एक नवीन नास्तिकवादी धर्म “विवेकशक्ति के धर्म” (Religion of Reason ) को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया गया पेरिस कम्यून के तत्वावधान में, इस विवेकशक्ति के नास्तिकतावादी धर्म को, विधिवत रूप से नोत्रे दम के कैथेड्राल में स्थापित कर, इसका औपचारिक उद्घाटन किया गया (नवम्बर, 1973 ) । राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस के गिरजाघरों को ‘विवेकशक्ति धर्म’ के मन्दिरों में रूपान्तरित करने की अनुमति दे दी। बहुत से बिशप एवं पादरियों ने ईसाई धर्म को छोड़ दिया। बाद में रोबसपियरे ने, अपने प्रभुत्व काल के दौरान, ‘विवेकशक्ति के धर्म’ के स्थान पर एक आस्तिकवादी प्रकार दर्ज किया गया ” नागरिक कापे की विधवा के ताबूत के लिए पाँच धर्म ‘परमशक्ति के धर्म’ को अपनाये जाने की औपचारिक घोषणा की (जून, 1794)। रोबसपियरे के पतन के बाद, सम्मेलन का दृष्टिकोण बदल गया। सम्मेलन ने अब यह विचार व्यक्त किया कि धर्म एक निजी आस्था की वस्तु है, और राज्य को किसी धर्म विशेष को स्थापित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 1795 में सम्मेलन ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति की घोषणा की और बहुत सारे गिरजाघरों को पुनः ईसाई धर्मानुयायियों को सौंप दिया गया।
(6) ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ की स्थापना 1792 में मूलत: एक नये संविधान के निर्माण के उद्देश्य को लेकर
की गई थी इसने 1793 में एक संविधान का निर्माण किया, लेकिन फ्रांस की विदेशी युद्धों में संलग्नता एवं आतंक के शासन के कारण इस संविधान को लागू नहीं किया जा सका। आतंक के शासन की समाप्ति के बाद, राष्ट्रीय सम्मेलन ने एक दूसरे संविधान का निर्माण किया और इसे सन् 1795 में लागू कर दिया। इस।संविधान का नाम था, फ्रांस के गणतन्त्र के “तीसरे वर्ष का संविधान” (Constitution of Year IIl ) । इस संविधान के द्वारा सार्वजनिक मतदान का अधिकार सीमित कर दिया गया । मत देने का अधिकार अब उन्हीं को होगा जो भूमिकर या सम्पत्ति कर देते थे या जिन्होंने सेना में काम किया था विधायी शक्ति अब दो सदनों की एक सभा में निहित होगी। एक निम्न सदन होगा, जिसके 500 सदस्य होंगे, यह ‘पाँच सौ का सदन।(Council of Five Hundred) कहलायेगा, यह सदन अधिनियमों को प्रस्तावित करेगा दूसरा उच्च सदन होगा, जिसके 250 सदस्य होंगे, यह ‘पुरातनों का सदन’ (Council of Ancients) कहलायेगा, और इसका कार्य अधिनियमों का परीक्षण एवं उनका क्रियान्वयन होगा। राज्य की कार्यकारी शक्ति एक ‘निर्देशक-मण्डल (Directory) में निहित होगी, जिसके पाँच सदस्य होंगे, जिनका चयन विधायकों द्वारा किया जायेगा पाँच सदस्यों के निर्देशक-मण्डल का प्रावधान इसलिए किया गया कि रोबसपियरे की भाँति कोई एक व्यक्ति अधिनायकवादी शैली में सत्ता हस्तगत न कर लें । 26 अक्टूबर, 1795 को राष्ट्रीय सम्मेलन ने स्वयं को भंग
घोषित कर दिया और इसके बाद फ्रांस में ‘निर्देशक-मण्डल ‘ (Directory) का शासन आरम्भ हो गया।

राष्ट्रीय सम्मेलन’ का मूल्यांकन

राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस में क्रान्ति के द्वितीय चरण को सम्पादित किया; यह चरण था-फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना का । राष्ट्रीय सम्मेलन के समक्ष आरम्भ में अनेक विकट कठिनाइयाँ थीं-विदेशी शक्तियों के संगठित आक्रमण की, आंतरिक गुटबन्दियों की, राजतंत्र को उन्मूलित कर गणतांत्रिक संविधान के निर्माण की। राष्ट्रीय सम्मेलन ने इन सभी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना
किया और फ्रांस के गणतन्त्र को कुशलतापूर्वक स्थापित कर दिया, यद्यपि जैकोबियन नेतृत्व में चले ‘आतंक के शासन’ ने इस गणतन्त्र की छवि धूमिल की और इसने कुछ ऐसी प्रवृत्तियों को जन्म दिया जो बाद में नेपोलियन बोनापार्ट के सैनिक अधिनायकवाद के उत्कर्ष का आधार बन गई। फ्रांस में गणतन्त्र की स्थापना हुई, लेकिन आतंक के अतिवादी एवं आलोच्य संरक्षण में-यह नये फ्रांसीसी गणतन्त्र का एक अन्तर्विरोध था जो उसके जन्म के समय ही प्रकट हो गया। इस अन्तर्विरोध ने बाद में फ्रांस के लिए अनेक संकट उत्पन्न किये।

बहरहाल, राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस में अनेक रचनात्मक कार्य किये जिन्होंने क्रान्ति की लहर को आगे
बढ़ाया जैसे कि राष्ट्रीय शिक्षा का विकास, विधि-संहिता की एकात्मकता के प्रयास, आर्थिक समाजवाद की।नीतियाँ, नवीन धार्मिक प्रयोग तथा अन्त में धर्म एवं राज्य का पृथक्करण। जैसा कि हेजन ने लिखा है कि ‘राष्ट्रीय सम्मेलन के अधीन फ्रांस के प्रथम गणतन्त्र के अपने यशस्वी पुरस्कार तथा सम्मानजनक कीर्तिमान हैं।।जिनसे आने वाले समय ने प्रेरणा एवं निर्देश ग्रहण किये ।


फ्रांस की क्रान्ति का तृतीय चरण : डाइरेक्टरी या निर्देशक मण्डल का शासन

(1795-1799)-पतनोन्मुख गणतन्त्र

फ्रांस में डायरेक्टरी या निर्देशक मण्डल का काल ( 1795 1799) फ्रांस के गणतन्त्र का पतनोन्मुखी
काल था, जिसके अन्तर्गत सरकार की अक्षमता, उसके बुर्जुआ रुझान तथा सैनिकवाद के उत्कर्ष के कारण फ्रांस की क्रान्ति की मूलभूत भावनाओं का स्वर मंद पड़ गया, और 1799 में डाइरेक्टरी के शासन की समाप्ति के बाद फ्रांस नेपोलियन बोनापार्ट के सैनिक अधिनायकवाद की गिरफ्त में आ गया। राष्ट्रीय महासभा, विधान निर्मात्री सभा तथा राष्ट्रीय सम्मेलन के अन्तर्गत फ्रांस में जिन क्रान्तिकारी परिवर्तनों का सूत्रपात एवं विकास हुआ था, उन्हें सुदृढ़ करने एवं आगे बढ़ाने के लिए बड़े प्रतिभाशाली नेताओं की आवश्यकता थी, लेकिन निर्देशक-मण्डल के कार्यकाल के निर्देशक, जैसा कि हेज ने लिखा है कि ये क्रांति बिना किसी अपवाद के, सामान्य प्रतिभा के लोग थे जिनके लिये राज्य के कल्याण से अधिक महत्त्वपूर्ण उनके व्यक्तिगत हित थे।

निर्देशक-मण्डल का कार्यकाल गुप्त योजनाओं एवं षड्यन्वों का काल था विधायिका में जीतकर आने
वालों में, राजतन्त्रवादियों एवं प्रतिक्रियावादियों की संख्या भी कम नहीं थी। सरकार पर पेरिस के नैता बाँबफ।(Babeuf) द्वारा मध्यमवर्गीय नीतियों का अनुसरण करने का आरोप लगाया जा रहा था सरकार की वित्तीय।कठिनाइयों भी बहुत बढ़ गयी थीं और 1797 में सरकार ने आंशिक दिवालियेपन की स्थिति घोषित कर दी।

बाह्य शक्तियों से युद्धों के क्षेत्र में निर्देशक-मण्डल ने अवश्य सफलतायें प्राप्त कीं, लेकिन इसने सैनिकवाद को।बढ़ावा दिया। उपय्युक्त परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में, फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के तानाशाही शासनकाल की।शुरुआत हुई, जिसने आगे आने वाले दो दशकों में यूरोप की राजनीति को झकझोर कर रख दिया। नेपोलियन।बोनापार्ट के काल में यद्यपि राष्ट्रवादी भावनाओं का बड़ा जबर्दस्त उत्कर्ष हुआ, लेकिन क्रान्ति की मूलभूत।भावना ‘स्वतन्त्रता’ का अवसान हो गया। बंदूक की गोलियों की आवाज के तले, क्रान्ति के स्वरों को ठंडा कर दिया गया। लेकिन अधिनायकवाद का यह चरण अस्थायी थी, और अंत:सलिला के रूप में क्रान्ति की लहरें जीवन्त एवं प्रवहमान थी, जो बाद में समय आने पर पुनः भूमि पर अवतरित हो गयी।

फ्रांस की क्रान्ति : प्रभाव, परिणाम एवं महत्त्व

फ्रांस की क्रान्ति परिवर्तन की एक ऐसी अपूर्व एवं सशक्त लहर थी जिसने फ्रांस का तो तात्कालिक नक्शा बदल ही दिया, लेकिन जो अपने साथ ऐसी जीवन्त धारायें छोड़ गयी जो वृहत्तर दिशा एवं काल मेंविसर्जित हो गयीं| मनुष्य के मुक्तिमूलक जिन विचारों का उद्घोष फ्रांस की क्रान्ति ने किया, वे आने वाली शताब्दियों में, यूरोप एवं विश्व के इतिहास के, प्रेरक एवं अनुकरणीय मूल्य बन य। पफ्रांस की क्रान्ति का मूलसदेश था, मनुष्य की ‘स्वतन्त्रता, समानता एवं भ्रातृत्व’-ये ऐसे मूल्य हैं जिनका सौन्दर्य एवं जिनकी उपयोगिता, शाश्वत एवं स्वयंसिद्ध हैं; इसीलिये फ्रांस की क्रान्ति विश्व इतिहास का एक कालजयी पृष्ठ है।

फ्रांस की क्रान्ति मात्र ध्वंस की क्रान्ति नहीं थी, इसकी सृजनात्मक ऊर्जा भी उतनी ही प्रचण्ड थी। इस
क्रान्ति में प्रलय भी था, सृष्टि भी। क्रान्ति ने एक ओर जहाँ निरंकुशता तथा विशेषाधिकार से युक्त पुरातन।व्यवस्था को नष्ट कर दिया, वहीं दूसरी ओर इसने लोकतन्त्र, समाजवाद एवं राष्ट्रवाद के नवीन विचारों पर।आधारित आधुनिक युग का सूत्रपात किया।

दूसरी ओर यह भी सत्य है कि क्रान्ति ने बहुत भारी सफलतायें अर्जित कीं तो उसकी कुछ सीमायें भी
थीं। क्रान्ति के अनेक सकारात्मक परिणाम हुये, तो क्रान्ति के घटनाक्रम के कुछ सूत्रों ने कतिपय नकारात्मक असर भी विकसित । के दौरान हुये आतंक के शासन’ तथा राष्ट्रीय सेना
के गठन के प्रति दिखाये गये विशेष उत्साह ने सैनिक अधिनायकवाद का मार्ग प्रशस्त किया कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उग्र राष्ट्रवाद, सैनिकवाद तथा विदेशो-द्वेष (xenophobia ), ये प्रवृत्तियाँ पफ्रांस की क्रान्ति का प्रतिफलन थीं। लेकिन प्रो. गुडविन का कहना है कि, ‘बहुत सोमित अर्थ में ही फ्रांस की क्रान्ति को आधुनिक अधिनायकवाद का स्रोत माना जा सकता है, क्योंकि फ्रांस में जैकोबिन तानाशाही और 1793 की ‘क्रान्तिकारी सरकार’ शांसन की अस्थायी एवं असामान्य व्यवस्थायें थीं।’ क्रान्ति की एक और सीमा की ओर डेविस (एन आउटलाइन हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड) ने ध्यान आकर्षित किया है; उनके अनुसार, फ्रांस की क्रान्ति अनेक दृष्टियों से मूलत: एक मध्यमवर्गीय क्रान्ति थी।’ दूसरी ओर क्रोपोटकिन(दि ग्रेट फ्रेंच रिवोल्यूशन) फ्रांस की क्रान्ति में ‘वर्तमान साम्यवादी एवं समाजवादी विचारधाराओं का स्नरोत बहरहाल, क्रानित के सकारात्मक प्रभाव बहुत स्पष्ट एवं निर्विवाद हैं। फ्रांस की क्रान्ति के प्रभाव या परिणामों का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है :

01 निरंकुश राजतन्त्र एवं वर्गभेद पर आधारित पुरातन व्यवस्था का अन्त


पुरातन व्यवस्थायें दीर्घ समय के अन्तराल में कई बार इतनी रूढ़ हो जाती हैं कि उनका भौतिक एवं मानसिक विस्थापन बड़ा दुष्कर कार्य होता है। बहुत-सी व्यवस्थायें संवेदनशून्य एवं निर्मम होती हैं, लेकिन शक्ति के केन्द्र का गणित उन्हें मजबूत बनाये रखता है। फ्रांस की पुरातन व्यवस्था, जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की, जनसामान्य के लिए एक भीषण परिस्थिति एवं मनःस्थिति का पर्याय बन चुकी थी। इस पुरातन व्यवस्था की विशेषतायें थीं-निरंकुश राजतन्त्र, सामन्ती अनाचार, विशेषाधिकार युक्त कुलीन तंत्र एवं पादरीतन्त्र, तथा जनसंख्या के इस ऊपरी अल्पांश की विलासिता को बोझ ढोती, अधिकार-शून्य सामान्य जनता ।

फ्रांस को क्रान्ति की यह एक महत् उपलब्धि है कि बहुत अल्प समय के अन्तराल में (1789 से 1791
के मध्य) इसने पुरातन व्यवस्था की जड़ें हिला दीं और उसका मृत्यु-वारण्ट जारी कर दिया। टेनिसकोर्ट को शपथ (20 जून, 1789) पुरातन व्यवस्था के विरुद्ध जनसंकल्प की एक दृढ़ चुनौती थी। बास्तील के पतन।(14 जुलाई, 1789) ने राजतन्त्रीय निरंकुशता के पतन की शुरुआत कर दी। वर्साय की ओर महिलाओं का जो जुलूस गया (अक्टूबर, 1789), वह वसर्साय से राजा और रानी को पेरिस लेकर आ गया; इसके बाद राजा पेरिस को जनसरकार का कैदी बनकर रह गया। मदान्ध राजतन्त्र का मुकुट जनता के कदमों पर झुक गया। अगस्त, 1789 में राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेम्बली) द्वारा जारी आज्ञप्ति “सामन्ती अधिकारों की समासि” के माध्यम से फ्रांस में सामंतवाद, दास प्रथा एवं सामाजिक वर्गों के विशेषाधिकारों की समाप्ति कर दी गई। चर्च द्वारा लिये जाने वाले धार्मिक कर “टाइथ” को भी समाप्त कर दिया गया। 27 अगस्त, 1789 को राष्ट्रीय सभा द्वारा जारो “मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” ने मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एवं समानता के अधिकार।को वैधानिक मान्यता दे दी। 12 जुलाई, 1790 को जारी ‘पादरी तंत्र के नागरिक संविधान’ द्वारा सभी
धर्माधिकारियों को राज्य का वेतनभागी कर्मचारी बना दिया गया 1791 में फ्रांस का प्रथम लिखित संविधान लागू कर दिया गया। इस संविधान द्वारा फ्रांस में संवैधानिक राजतन्त्र की स्थापना की गई; राजा को नाममात्र का प्रधान बनाया गया था। इस प्रकार 1789 से 1791 तक, इन दो बषों के अन्तराल में, फ्रांस का परिदृश्य रूपान्तरित हो गया था इस काल में राष्ट्रीय महासभा (नेशनल असेम्बली) द्वारा किये गये कार्यों के बारे में हेज (मॉडर्न यूरोप टू 1870) ने लिखा है कि ‘इतने जबर्दस्त विध्वंस का कार्य, इतने अल्प समय में, विधायकों की किसी अन्य संस्था द्वारा नहीं किया गया। बाद में ‘विधान निर्मात्री सभा ‘ ने फ्रांस में राजतन्त्र की पूर्ण समाप्ति कर दी और तद्नन्तर ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ ने फ्रांस के प्रथम गणतन्त्र को प्रतिष्ठापित कर दिया।

जनवरी, 1793 को राजद्रोह के अपराध में लुई सोलहवें को ‘गिलोटिन’ द्वारा मृत्यु-दण्ड दे दिया गया । लुई के साथ-साथ फ्रांस की पुरातन व्यवस्था भी कालकवलित हो गयी।

क्रोपोटकिन (दि ग्रेट फ्रेंच रिवोल्यूशन) के अनुसार, ‘फ्रांस की क्रान्ति द्वारा सम्पन्न-सामन्तवाद एवं
निरंकुशतावाद की समाप्ति, ये दो उपलब्धियाँ उन्नीसवीं शताब्दी का मुख्य उद्यम बन गई, जिनका आरम्भ 1789 में फ्रांस में हुआ था और जो एक शताब्दी के अन्तराल में क्रमश: पूरे यूरोप में प्रसारित हो गई |’ डेविड थामसन ( यूरोप सिन्स नेपोलियन) के अनुसार, ‘फ्रांस की क्रान्ति यूरोप में एक युद्ध के रूप में परिणत हो गई;।राजाओं के बीच क्षेत्रीय अधिकारों के लिए होने वाले परम्परागत एवं चिरपरिचित युद्ध में नहीं, बल्कि राजाओं।एवं जनता के मध्य एक नवीनतम वैचारिक युद्ध में, प्राचीन संस्थाओं की समाप्ति के प्रश्न पर…..।’ पुनः ‘1914 तक, फ्रांस की क्रान्ति को आधुनिक यूरोप के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना माना जा सकता है, एवं इसके परिणामों की तुलना सोलहवीं शताब्दी के धर्म सुधार आन्दोलन के परिणामों से की जा सकती है।…..।इसने (फ्रांस की क्रान्ति ने) पुरातन स्थापित व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण स्मारकों को नष्ट कर दिया-राजनीति,।आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन एवं चिन्तन, कूटनीति तथा युद्ध इन सभी क्षेत्रों में।

02 लोकतन्त्र एवं व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य का प्रतिष्ठापन

फ्रांस की क्रान्ति की एक बड़ी महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावकारी देन थी-लोकतन्त्र एवं व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य का प्रतिष्ठापन। 27 अगस्त, 1789 को राष्ट्रीय महासभा द्वारा पारित “मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” में कहा गया था कि ‘सभी मनुष्य अधिकारों की दृष्टि से स्वतन्त्र एवं समान रूप से जन्में हैं’; ‘ सम्प्रभुता का स्रोत (जनता) में निहित है’%3 ‘स्वतन्त्रता, व्यक्तिगत सम्पत्ति, सुरक्षा तथा अत्याचार का विरोध-ये मनुष्य के नैसर्गिक अधिकार हैं’; तथा ‘विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मनुष्य के बेशकीमती अधिकारों में से एक है।’

यद्यपि फ्रांस के प्रथम लिखित संविधान (1791) ने सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं प्रदान किया, किन्तु मनुष्यं की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया गया। बाद में ‘विधान निर्मात्री सभा’ ने राष्ट्रीय सम्मेलन के चुनाव के समय सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार प्रदान कर दिया जिसके बाद फ्रांस के प्रथम गणतन्त्र की स्थापना हुई (1793)। जॉर्ज लेफेब्रे (दि प्लेस ऑफ फ्रेंच रिवोल्यशन।इन वल्ल्ड हिस्ट्री) के अनुसार, ‘फ्रांस की क्रान्ति ने एक गणतन्त्र को ही स्थापित नहीं किया, बल्कि इसने सार्वजनिक मताधिकार की भी वकालत की। मैजेनिस एवं ऐपल (संसार का इतिहास) के शब्दों में, ‘फ्रांस में अब यह सिद्धान्त प्रतिष्ठापित हो चुका था कि सरकार अपना अधिकार शासितों से प्राप्त करती हैं ‘ डेविस ( एन आउटलाइन हिस्ट्री ऑफ दि वल्ल्ड) के अनुसार, “फ्रांस की क्रान्ति आधुनिक इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। इसने महाद्वीपीय राजनीति में एक नयी शक्ति का सुनिश्चित प्रवेश कर दिया; यह शक्ति थी-जनता या तृतीय एस्टेट की शक्ति । यह प्रजातन्त्र के विचारों की बहुत बड़ी विजय थी, यद्यपि इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष था।’ जवाहरलाल नेहरू (विश्व इतिहास की झलक) के शब्दों में, फ्रांस की क्रान्ति के बाद ‘गणराज्य का विचार समूचे यूरोप में फैल गया और इसके साथ ही उन सिद्धान्तों का भी प्रचार हुआ, जिनका ऐलान मानव अधिकारों की घोषणा में किया गया था

03 वर्गभेदहीन सामाजिक ढाँचे का विकास

सामाजिक क्षेत्र में फ्रांस की क्रानित का एक बहुत बड़ा योगदान यह था कि इसने वर्गभेद की बड़ी खाइयों को पूर्णतः नहीं तो आंशिक रूप से पाट दिया। इससे पूर्व फ्रांस की व्यवस्था में वर्गभेद को वैधानिक मान्यता प्राप्त थी, कुलीन वर्ग एवं पादरी तंत्र को अनेक विशेष सुविधायें एवं रियायतें प्राप्त थीं । पफ्रांस की क्रान्ति ने सामाजिक वर्गों के विशेषाधिकार की अवधारणा को वैधानिक स्तर पर समाप्त घोषित कर दिया तथा सभी नागरिकों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं न्यायिक समानता को ही अभीष्ट माना। राष्ट्रीय सभा द्वारा पारित (27 अगस्त, 1789) “मनुष्य एवं नागरिकों के
अधिकारों की घोषणा” में स्पष्ट कहा गया कि ‘सभी मनुष्य अधिकारों की दृष्टि से स्वतन्त्र एवं समान रूप से जन्मे हैं और रहे हैं’; ‘विधि या कानून जन इच्छा की अभिव्यक्ति है और सभी नागरिकों को विधि के निर्माण।में भाग लेने का भी अधिकार है।’ इससे पूर्व राष्ट्रीय सभा द्वारा जारी एक आज्ञप्ति के माध्यम से फ्रांस में सामंतवाद, दासप्रथा एवं सामाजिक वर्गों के विशेषाधिकारों की समाप्ति कर दी गई थी। यह एक प्रकार का क्रान्तिकारी एवं युगांतरकारी सामाजिक परिवर्तन था, जिसका सूत्रपात फ्रांस की क्रान्ति ने किया। जार्ज लेफेब्रे (दि प्लेस ऑफ दि फ्रेंच रिवोल्यूशन इन वल्ल्ड हिस्ट्री) के अनुसार, ‘फ्रांस की क्रान्ति के सभी योगदान क्रान्ति के वास्तविक ध्येय की तुलना में गौण थे; यह ध्येय था- समानता की क्रान्ति (The revolution of equality)।

जहाँ इंग्लैण्ड एवं अमेरिका में, कुलीन वर्ग एवं उच्च मध्यम वर्ग ने मिलजुलकर नागरिक समानता की
अवधारणा पर एक नकारात्मक दबाव बना रखा था, वहीं फ्रांस में अभिजात वर्ग की हृठधर्मिता के कारण मध्यम वर्ग ने नागरिक समानता की अवधारणा पर विशेष बल दिया।

कुछ इतिहासकारों ने फ्रांस की क्रान्ति की आलोचना करते हुये कहा है कि यह पूर्ण समानता स्थापित
नहीं कर पायी। नवीन सत्ता में जनसामान्य को पूरी भागीदारी नहीं मिल पायी। राष्ट्रीय सभा द्वारा लागू फ्रांस के संविधान (1791) ने मताधिकार सभी को नहीं प्रदान किया बाद में विधाननिर्मात्री सभा ने यद्यपि राष्ट्रीय।सम्मेलन ‘राष्ट्रीय सम्मेलन’ द्वारा जारी फ्रांस के गणतन्त्रात्मक संविधान (1795) ने पुनः मताधिकार को सीमित कर दिया। सत्ता पर अब यद्यपि सामन्तों, कुलीनों एवं धर्माधिकारियों का अधिकार समाप्त हो गया था, लेकिन उनके स्थान पर अब मध्यम वर्ग के हाथ में सत्ता आ गई, और जनसामान्य को समानता का पूरा लाभ नहीं मिल पाया । डेविस के अनुसार, ‘फ्रांस की क्रान्ति अनेक दृष्टियों से मूलत: एक मध्यमवर्गीय क्रान्ति थी’ ।

उपर्युक्त आलोचना के बावजूद, फ्रांस की क्रान्ति के सामाजिक महत्त्व को कम नहीं आंका जा सकता।
अपने मध्यमवर्गीय पूर्वाग्रह के बावजूद यह असमानता से समानता की ओर एक विशाल कदम था ।

04 सुखद आर्थिक रूपान्तरण

फ्रांस को क्रान्ति ने फ्रांस के आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया. किसानों, मजदूरों तथा मध्यम वर्ग के लिये क्रान्ति ने कई सुखद आर्थिक रूपान्तरण कर दिये। सामन्तों एवं चर्च के अधिकार से फ्रांस की भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा मुक्त हो जाने से किसानों एवं मध्यम वर्ग को अत्यधिक लाभ हुआ। किसान सामन्ती अधिकार, सामन्ती शुल्क तथा बेगार से मुक्त हो गये। क्रान्ति के वर्षों में फ्रांस में कृषि सम्बन्धी गतिविधियों में अत्यधिक वृद्धि हुई। एक तो बहुत सारी नई भूमि कृषि योग्य बना दी गई, दूसरा कृषकों ने आन्तरिक उत्साह से कृषि कर्म में भाग लिया। 1794 में हुई अच्छी फसल के कारण फ्रांस के लगभग दो-तिहाई लोगों ने चैन की सांस ली। जैसा कि क्रोपोटकिन (दि ग्रेट फ्रेंच रिवोल्यूशन) ने लिखा है, ‘शताब्दियों के बाद पहली बार फ्रांस के कृषकों ने भरपेट भोजन किया, अपनी कमर सीधी की, तथा कुछ बोलने का साहस किया’ 1789 से 1794 के मध्य, चार वर्षों के अन्तराल में, फ्रांस की कृषि व्यवस्था का सुखद रूपान्तरण हो गया। प्रगति का यह चक्र रुका नहीं, आगे ही बढ़ता गया, और नेपोलियन द्वारा फ्रांस को विभिन्न युद्धों की विभीषिका में डालने के बावजूद, 1815 में फ्रांस यूरोप के देशों में सम्पन्नतम देश था, और ‘उसकी सम्पन्नता का आधार उसके उपनिवेश या विदेशी व्यापार नहीं थे, बल्कि उसकी अपनी भूमि थी, भूमि के प्रति उसका प्रेम था, उसकी अपनी दक्षता और अध्यवसाय था ।’ क्रोपोटकिन चुनाव के समय (1793) सार्वजनिक मताधिकार की अवधारणा को स्वीकार कर लिया, विभिन्न तथ्यों के माध्यम से यह स्पाष्ट किया है कि फ्रांस की क्रान्ति ने फ्रांस को एक सशक्त एवं समृद्ध राष्ट्र बनाया।

क्रान्ति के पश्चात् आत्मविश्वास से परिपूर्ण, फ्रांस के मध्यम वर्ग ने व्यापार एवं वाणिज्य के विकास
को प्रोत्साहित किया। जार्ज लेफेब्रे का मानना है कि फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप हुये आर्थिक परिवर्तनों के।कारण फ्रांस के बुर्जुआ या मध्यम वर्ग ने क्रमश: पूँजीवाद के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

05 राष्ट्रीयता की भावना का उत्कर्ष एवं सशक्तिकरण :

फ्रांस की क्रान्ति ने राष्ट्रीयता की भावना के उत्कर्ष एवं सशक्तिकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जे.ई. स्वेन ( ए हिस्ट्री ऑफ बल्ल्ड सिविलाइजेशन) के अनुसार, ‘गतिमान राष्ट्रवाद, अपने आधुनिक स्वरूप में, फ्रांस की क्रांति से उत्पन्न हुआ। बास्तील के पतन (14 जुलाई, 1789) ने फ्रांस को उसका महान् राष्ट्रीय उत्सव प्रदान किया फ्रांस की क्रान्ति ने फ्रांस के निवासियों में शासकीय एवं सामंतीय आस्था के स्थान पर राष्ट्रीय आस्था को जन्म दिया। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन था। क्रान्ति के प्रारम्भ में ‘राष्ट्रीय महासभा’ (नेशनल असेम्बली)।की घोषणा के साथ ही राष्ट्रवाद का विचार जड़ पकड़ने लगा था “मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की।घोषणा” (27 अगस्त, 1789) में स्पष्टत: कहा गया कि ‘सम्प्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है।’ इसके बाद फ्रांस में राष्ट्रीय शिक्षा, राष्ट्रीय सेना तथा राष्ट्रभक्ति के उत्सवों की अवधारणाओं का जन्म हुआ। फ्रांस के।निवासियों में राष्ट्रीय एकता का गहरा भाव जाग्रत हुआ। आने वाली शताब्दियों में राष्ट्रवाद की अवधारणा ने।विश्व के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । राष्ट्रवादी चेतना के सुखद एवं घातक, दोनों प्रकार के परिणाम हुये। डेविड थामसन के अनुसार, ‘फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने सोद्देश्य उदारवाद का प्रसार किया लेकिन अनजाने में राष्ट्रवाद का भी सृजन हो गया।

06 समाजवादी चेतना का अभ्युदय

फ्रांस की क्रान्ति पर यह आरोप लगाया जाता है कि उससे मिलने वाले लाभों का बुर्जुजा या मध्यमवर्ग ने अपहरण कर लिया। ऐसा मानना क्रान्ति की एकांगी समझ होगी। यद्यपि क्रान्ति का नेतृत्व मध्यम वर्र्ग के पास ही रहा, लेकिन क्रान्ति के मूलभूत आदर्श “समानता” की स्थापना के प्रयास नहीं किये गये हों, ऐसा नहीं हुआ। क्रान्ति का समाजवादी रुझान अनेक बार स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। राष्ट्रीय महासभा ने न केवल सामंतवाद एवं सामाजिक विशेषाधिकारों को समाप्त किया, बल्कि चर्च की भूमि को भी जब्त कर लिया। चर्च के अधीन फ्रांस की लगभग 1/5 भूमि थी। राष्ट्रीय सम्मेलन ने, आतंक के शासन के दौरान, समाजवादी नीतियों का बड़ी सख्ती से अनुसरण किया। जैसा किं हमने ऊपर विस्तार से चर्चा की है, इस काल में बृहद् भू-सम्पत्ति वाले क्षेत्रों को छोटे-छोटे खण्डों में बांट दिया गया ताकि भूमिहीन कृषक एवं अन्य वर्ग के लोग भी भू-स्वामी बन सकें। जनसामान्य के हित में अनाज एवं अन्य वस्तुओं की कीमतें निश्चित कर दी गईं । मजदूरों का शोषण न हो, इसलिए मजदूरी की दरें भी निर्धारित कर दी गईं ।

कुलीन वर्ग को क्षतिपूर्ति दिये जाने के पूर्ववर्ती आश्वासनों को रद्द कर दिया। यह नियम बना दिया कि फ्रांस के छोटे-बड़े सभी निवासियों को ‘नागरिक’ कहकर सम्बोधित किया जायेगा यद्यपि उपर्युक् व्यवस्थाओं को क्रान्ति के परवर्ती काल में पूरी तरह नहीं स्वीकार किया गया, लेकिन क्रान्ति की समाजवादी प्रतिबद्धता अभिव्यक्त हो चुकी थी। क्रोपोटकिन का मानना है कि वर्तमान साम्यवादी एवं समाजवादी विचारधाराओं का।स्रोत एवं उद्गम फ्रांस की क्रान्ति में देखा जा सकता है।

07 धार्मिक प्रभाव

फ्रांस की क्रान्ति ने फ्रांस की धार्मिक व्यवस्थाओं में बड़ी उथल-पुथल मचा दी। पादरी तंत्र के विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया। चर्च द्वारा जनसामान्य से लिया जाने वाला कर ‘टाइथ’ भी बन्द कर दिया गया । ‘पादरी तंत्र के नागरिक संविधान’ (12 जुलाई, 1790) द्वारा पफ्रांस के छोटे-बड़े सभी धर्माधिकारियों को राज्य का वेतनभोगी कर्मचारी बना दिया और उनका चुनाव अब जनता द्वारा किया जाना निश्चित किया गया यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन था, क्योंकि कैथोलिक ईसाई धर्माधिकारी इससे पूर्व पोप द्वारा नियुक्त एवं नियन्त्रित किये जाते थे। रा्ट्य सभा ने उक्त ‘नागरिक संविधान’ के प्रति सभी धर्माधिकारियों द्वारा शपथ लेना अनिवार्य कर दिया। इससे फ्रांस के बहुत-से कट्टर कैथोलिक ईसाई धर्मावलम्बी नाराज हो गये, उनमें से अनेक जो इससे पूर्व क्रान्ति के समर्थक थे, अब क्रान्ति के विरुद्ध हो गये। राष्ट्रीय महासभा ने चर्च की सारी भूमि को भी जब्त कर लिया और उसे सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित कर दिया।


राष्ट्रीय सम्मेलन ने धर्म के क्षेत्र में कई नवीन प्रयोग किये।’ आतंक के शासन’ के दौरान फ्रांस के वि- ईसाईकरण (dechristianize) का प्रयास किया गया ईसाई धर्म के स्थान पर फ्रांस में एक नवीन नास्तिकवाद धर्म “विवेकशक्ति के धर्म” (Religion of Reason ) को स्थापित किया गया और फ्रांस के अनेक गिरजाघरों।को उक्त नवीन धर्म के मन्दिरों में बदल दिया गया बहुत सार बिशन एवं पादरियों ने ईसाई धर्म को त्याग।दिया। बाद में रोबसपियरे ने जब वह सत्ता के शिखर पर था, ‘विवेक शक्ति के धर्म’ के स्थान पर एक।आस्तिकवादी धर्म, “परमशक्ति के धर्म’-को फ्रांस में प्रचारित करने का प्रयास किया। रोबसपियरे की मृत्यु।के पश्चात् राष्ट्रीय सम्मेलन ने इस नीति की घोषणा की कि धर्म एक निजी आस्था की वस्तु है और राज्य को।धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । सम्मेलन ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति की घोषणा की, और।बहुत सारे गिरजाघरों को पुनः ईसाई धर्मानुयायियों को सौंप दिया गया इस प्रकार अंत में फ्रांस की क्रान्ति ने।राज्य और धर्म के ‘पृथक्करण’ की नवीन अवधारणा को पुष्ट किया।

न्यायिक व्यवस्था में सुधार क्रान्ति के परिणामस्वरूप फ्रांस की न्यायिक व्यवस्था में बहुत-से सुधार हो गये।” मनुष्य एवं नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” (अगस्त, 1789) में स्पष्ट कहा गया कि ‘विधि या कानून जन इच्छा की अभिव्यक्ति है (Law is the expression of general will) तथा सभी नागरिकों को विधि के निर्माण में भाग लेने का अधिकार है ।’ फ्रांस के प्रथम लिखित संविधान (1791) द्वारा फ्रांस के सभी निवासियों को कानून के समक्ष समान माना गया । इससे पूर्व जज अपने पदों को और उनके।साथ जुड़े विशेषाधिकारों को खरीदा करते थे, तथा पैतृक सम्पत्ति के रूप में उन्हें अपनी संतानों को हस्तान्तरित।कर देते थे। इस व्यवस्था को समापत कर दिया गया। अब सभी स्तरों पर ज्जों के चयन की व्यवस्था की गई।और उनके कार्यकाल की अवधि भी दो से चार वर्ष तक सीमित कर दी गई । राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस के।विविध क्षेत्रों में प्रचलित अनेक प्रकार के कानूनों में एकरूपता लाने की दिशा में अनेक उल्लेखनीय प्रयास।किये। कुछ नये महत्त्वपूर्ण कानून पारित किये गये सम्पत्ति पर पुरुषों के साथ महिलाओं का अधिकार भी।स्वीकार कर लिया गया ज्येष्ठाधिकार (primogeniture ) के नियम को समाप्त कर दिया गया फ्रांस के उपनिवेशों में नीग्रो दास प्रथा समाप्त कर दी गई । सम्पूर्ण फ्रांस में तौल-मौल की एकरूप व्यवस्था-“मीटरी पद्धति” (Metric System) को लागू कर दिया गया।

08 शैक्षिक सुधार

फ्रांस की क्रान्ति ने प्रांस की शिक्षा पद्धति में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों का सूत्रपात किया। राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा फ्रेंच भाषा को फ्रांस की राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया गया, और समस्त शिक्षण एवं अनुदेशन कार्य इसी भाषा में किये जाने के आदेश दिये गये। दांतों का कथन था कि, ‘रोटी के बाद, शिक्षा मनुष्य की पहली आवश्यकता है।’ एक नि:शुल्क, अनिवार्य एवं धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था को स्थापित करने की मांग की गई राष्ट्रीय सम्मेलन ने फ्रांस के कुछ विशिष्ट शिक्षण संस्थानों को अधिक उपयोगी बनाने की दृष्टि से पुनर्गठित किया तथा उन्हें अधिक विस्तृत एवं अधिकार-सम्पन्न बना दिया। ये।शिक्षण संस्थान थे-दि नार्मल स्कूल, दि पोलिटेक्निक स्कूल, पेरिस के मेडिकल स्कूल एवं लॉ स्कूल, दि कंजर्वेटरी ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स, दि नेशनल आक्काइव्स, दि नेशनल लाइब्रेरी आदि।

09 उग्र राष्ट्रवाद, सैनिकवाद एवं अधिनायकवाद का अभ्युदय

कहा जाता है कि फ्रांस की क्रान्ति ने उग्र राष्ट्रवाद, सैनिकवाद एवं अधिनायवाद की प्रवृत्तियों के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाई। राष्ट्रीय सभा द्वारा राष्ट्रीय भावना की अभिवृद्धि के लिए किये गये कार्य; राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा राष्ट्रीय सैनिक सेवा की अनिवार्यता; तथा ‘आतंक के शासन’ के अधिनायकवादी तेवर-इन व्यवस्थाओं के कारण उग्र राष्ट्रवाद, सैनिकवाद एवं अधिनायकवाद को बढ़ावा मिला । लेकिन जैसा कि प्रो. गुडविन (दि फ्रेंच रिवोल्यूशन) ने कहा है, ‘बहुत सीमित अर्थ में ही फ्रांस की क्रान्ति को आधुनिक अधिनायकवाद का स्रोत माना जा सकता है.।क्योंकि फ्रांस में जैकोबिन तानाशाही और 1793 की ‘क्रान्तिकारी सरकार’ शासन की अस्थायी एवं असामान्य व्यवस्थायें थीं, जो फ्रांस ने आन्तरिक एवं विदेशी युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा अपने उदारवादी विचारों की रक्षा के
लिए विवशता में ग्रहण कर ली थीं।

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