चीन में यूरोपीय साम्राज्यवाद का सम्पूर्ण इतिहास

चीन में यूरोपीय साम्राज्यवाद का सम्पूर्ण इतिहास

मानव इतिहास के पृष्ठों में चीन सभ्यता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी हुई है। चीन पूर्वीं एशिया का
विशालतम राष्ट्र है, जिसमें विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या निवास करती है। भौगोलिक दृष्टि से चीन के पूर्व में प्रशान्त महासागर, दक्षिण में हिमालय, काराकोरम पर्वत शृंखलाएँ व पामीर का पठार तथा पश्चिमी में गोबी और तकलामकान रेगिस्तान है। पीली नदी के नाम से जानी जाने वाली ‘हांगहो’ नदी सबसे महत्त्वपूर्ण है।

वर्षांकाल में बाढ़ आने से यह नदी पूरे गाँव व बस्तियों को उजाड़ देती है। इसलिए इसे ‘चीन का अभिशाप’ या ‘भटकती नदी’ नाम से जाना जाता है। प्राचीनकाल में यह बहुत समृद्ध राष्ट्र रहा है। यहाँ अनेक वंशों (हसिया, शांग, चाऊ, छिन, हान, सानकुओ, चिन, सुंग, छी, लिआंग, सुई, मंचु आदि) ने शासन किया। 17वीं शताब्दी में चीन मंचु राजवंश के आधिपत्य में रहा। 1912 में मंचु वंश की समाप्ति के पश्चात् चीन गणतन्त्र की स्थापना हो गई। चीन की आर्थिक सम्पन्नता पश्चिमी राष्ट्रों के आकर्षण का केन्द्र थी। यूरोपीय देश किसी प्रकार से चीन में प्रवेश कर व्यापार करना चाहते थे। इस दिशा में सर्वप्रथम सफलता पुर्तगाल को मिली। 1511 ई. में पुर्तगालियों ने मलक्का पर अधिकार कर लिया। मलक्का पर अधिकार करने के पश्चात्पु र्तगालियों ने पूर्वी एशिया के साथ राजनीतिक एवं व्यापारिक सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास किया पुर्तगाली प्रतिनिधिमण्डल 1517 ई. पीकिंग पहुँचा, परन्तु लक्ष्य की पूर्ति में असफल रहा। पुर्तगालियों का उद्देश्य चीन से व्यापारिक सम्बन्ध ही स्थापित करना नहीं था, बल्कि वे वहाँ उपनिवेश विकसित करना चाहते थे। इसलिए तत्कालीन मिंग वंश (1368-1644 ई.) का प्रशासन उनसे घृणा करता था । परन्तु अपनी कूटनीति से 1557.ई. में पुर्तगाल चीन में बस्ती स्थापित करने में सफल रहा।

पुर्तगालियों की चीन में सफलता के पश्चात् अन्य देशों ने चीन प्रवेश करने का प्रयास किया इनमें
स्पेन, इंग्लैण्ड, रूस प्रमुख थे, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बनाने का प्रयत्न किया। अन्ततः 18वीं शताब्दी में डेनमार्क, स्वीडन, फ्रांस आदि देशों के जहाजों का चीन में आवागमन शुरू हो गया| बहुत प्रयासों के पश्चात् यूरोपीय व्यापारियों को कैण्टन शहर तक व्यापार करने की अनुमति मिली।

चीन की चीनी, रेशम, चाय एवं चीनी मिट्टी के बर्तनों की यूरोप में बहुत माँग थी। यूरोपीय व्यापारी चोन से खरीदकर इन्हें यूरोप के बाजार में बेचकर चीन को इनका मूल्य सोना-चाँदी में चुकाते थे । 18वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में सूती कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा इन कपड़ों का चीन बड़ा खरीददार हो सकता था इस दिशा में इंग्लैण्ड ने कार्य करना प्रारम्भ किया।

अंग्रेज व्यापारी चीन के साथ वस्त्रों के व्यापार से ही सन्तुष्ट नहीं थे वे चाहते थे कि ऐसे माल को खपत
बढ़ाई जाये जिससे इंग्लैण्ड को चीन के माल के लिए सोना चाँदी के रूप में भुगतान करना नहीं पड़े। इसी।दौरान ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारी भारत में अफीम की खेती करवा रहे थे और उनका प्रयास था कि चीन में अफीम का बाजार तैयार हो जाए। इंग्लैण्ड ने चोरी-छिपे चीन में अफीम भेजकर चीनवासियों में इसके सेवन की आदत डालने का प्रयास किया। इस अभियान में उन्हें सफलता मिल गई। 1825 ई. तक चन के लोग अफीम के बहुत आदी हो गये इस स्थिति से चीनी सरकार चिन्तित हो उठी और उसने आपत्तिजनक व्यापार को प्रतिबन्धित करने का निश्चय किया चीनी सरकार ने घोषणा जारी करके अफीम के क्रय-विक्रय को बन्द कर दिया। 1833 ई. में चीन ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया। 1834 में ब्रिटिश सरकार ने ‘व्यापार अधीक्षक’ के रूप में लार्ड नेपियर को चीनी सम्राट से सम्बन्ध स्थापित कर व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए चीन भेजा। इसके विपरीत चीन सरकार चाहती थी कि इंग्लैण्ड चीन की अधीनता में रहकर व्यापार करे, परन्तु लार्ड नेपियर इसके लिए तैयार नहीं था। नेपियर का असामयिक मृत्यु होने से चीन में सफलता नहीं मिली। इस प्रकार ब्रिटेन तथा चीन के मध्य अस्थिरता की स्थिति बन रही। इन परिस्थितियों ने चीन एवं ब्रिटेन को अफीम युद्धों की ओर ढकेल दिया।

प्रथम अफीम युद्ध (1839-1842 ई.)

19वों शताब्दी के प्रारम्भ तक चीन एकान्तिक नोति का पालन करता रहा, परन्तु अफीम के शौक ने
उसकी आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया। चीनी सरकार ने अफीम के व्यापार को रोकने के काफी प्रयत्न
किये, परन्तु सफलता नहीं मिली। अन्ततः चीन एवं ब्रिटेन के मध्य 1839 ई. में प्रथम अफीम युद्ध हुआ।


इस युद्ध के लिए निम्नलिखित कारणों को उत्तरदायी माना जा सकता है : –

01 अफीम व्यापार को प्रोत्साहन

ब्रिटेन एवं चीन के मध्य व्यापार में ब्रिटेन को चीनी वस्तुओं का.मूल्य सोना और चाँदी के रूप में चुकाना पड़ता था। इस स्थिति से निपटने के लिए ब्रिटेन ने ऐसे माल को चीन.भेजना शुरू किया जिससे व्यापार में सन्तुलन स्थापित हो सके। ब्रिटेन को यह मालूम चला कि चीन के निवासियों को मालवा (भारत) की अफीम बहुत पंसद है। इसलिए अंग्रेजों ने भारत में अफीम के उत्पादन को बढ़ाकर चीन भेजना शुरू कर दिया। 1818 से 1833 तक अफीम का व्यापार 17 प्रतिशत से 50 प्रतिशत हो.गया। इस बेतहाशा व्यापार वृद्धि से चीन की आर्थिक स्थिति डांवाडोल होने लगी। इसके अलावा इंग्लैण्ड ने औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् चीन से रेशम मैँगवाना बन्द कर दिया था। ऐसी स्थिति में चीन का आयात अधिक एवं निर्यात कम हो गया। इससे चीन का व्यापारिक सन्तुलन खराब हो गया।

02 चीन का आर्थिक संकट

चीन में अफीम के आयात ने उसकी आर्थिक स्थिति को दयनीय बना दिया। चीनी सरकार ने 1800 ई. में अफीम के आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिया, परन्तु भ्रष्ट कर्मचारियों के कारण यह सफल नहीं हो पाया। 1838 ई. में ‘हय-क्वांग’ ने अफीम के आयात को रोकने के लिए कठोर कदम उठाये। उसने अफीम से भरी सन्दूकों को पाश्चात्य व्यापारियों को लौटा दिया। इसके साथ ही यह भी चेताया कि अंग्रेज व्यापारियों ने अगर अफीम की पेटियों को नहीं लौटाया तो उन्हें बन्दी बनाकर भूखे मरते हुए प्राण त्यागने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा। इस चेतावनी के पश्चात् चार्ल्स ईलियट ने अंग्रेज व्यापारियों को अफीम की 20 हजार पेटियाँ लौटाने की सलाह दी। इस घटनाक्रम से ब्रिटेन एवं चीन के मध्य वैमनस्य बढ़ गया।

03 लॉर्ड नेपियर की नियुक्ति

1834 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफीम के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर देने पर अन्य व्यापारी चीन में अफीम का व्यापार करने लगे। कैन्टन में इंग्लैण्ड के व्यापारियों की देखरेख के लिए 1834 ई. में नेपियर की नियुक्ति कर दी गई। चीनी सरकार ने नेपियर एवं इंग्लैण्ड के व्यापारियों को कोई तवज्जो नहीं दी। इससे नेपियर चीनी सरकार से नाराज हो गया।

नेपियर कैन्टर छोड़कर मकाओ लौट आया कुछ समय पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् एल. वी. डेविस, एवं इसके बाद बी. रोबिन्सन ने कार्यभार संभाला, परन्तु ये दोनों भी चीन एवं ब्रिटेन के मध्य कटुता को कम नहीं कर पाये।

04 यूरोपीय एवं चीनवासियों के अहम् में टकराव

चीनवासी अपने आपको विश्व में सबसे श्रेष्ठ
समझने के कारण हो दूसरों से कोई सम्पर्क नहीं रखना चाहते थे 18वीं शताब्दी के अन्त तक इसीलिए
यूरोपवासियों को चीन में प्रवेश नहीं करने दिया गया । चीन को सबक सिखाने के लिए यूरोपवासी अवसर की तलाश में थे। चीनवासी अफीम के अभ्यस्त होने लगे तो वहाँ की सरकार ने अफीम के व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अन्ततः ब्रिटेन एवं चीन एक-दूसरे के प्रतिद्वन्दी हो गये।

05 ब्रिटेन की को-हांग के नियन्त्रण से मुक्ति की इच्छा

चीन विदेशी व्यापारियों को हेय दृष्टि से देखता था इसलिए मंचू काल में विदेशी व्यापारियों को चीन में व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। 1702 ई. में चौनी सम्राट ने एक प्रतिनिधि नियुक्त किया जिसके माध्यम से विदेशी व्यापारी अपना माल चीन में क्रय – विक्रय कर सकते हैं। कालान्तर में यह व्यवस्था सफल नहीं हो पाई और 1752 ई. में प्रतिनिधि के स्थान पर एक व्यापारियों के संघ का गठन किया जिसे ‘को-हांग’ नाम से जाना जाता है। इसके सदस्यों की संख्या 13 थो। कोई भी विदेशी व्यापारी को-हांग की अनुमति के बिना चीन से माल क्रय – विक्रय नहीं कर सकता था। विदेशी व्यापारियों पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिये गये थे।

06 कैन्टन में लिन-त्जे-शू की नियुक्ति

1839 ई. में लिन-त्जे-शू को कैण्टन में चीन सरकार ने शाही कमिश्नर नियुक्त कर दिया। उसके माध्यम से चीन सरकार अफीम व्यापार को रोकना चाहती थी। लिन-तजे-शू की कड़ाई के कारण ब्रिटेन के अधिकारियों ने चाल्ल्स इलियट की सलाह पर समस्त अफीम चीनी अधिकारियों को सौंप दी। चीनी कमिश्नर के आदेश के उपरान्त 20 हजार अरफीम की पेटियों में नमक एवं चूना मिलाकर नदी में बहा दिया गया, जिससे चीन और इंग्लैण्ड के मध्य बिवाद बढ़ गया। चीजी अधिकारी लिन ने ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया को कठोर भाषा में एक पत्र भी लिख दिया। चीन एवं इंग्लैण्ड के सम्बन्धों की खाई और गहरी हो गई ।


07 ब्रिटेन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा

19वीं शताब्दी के आरम्भ में ब्रिटेन ने लगभग एशिया पर आधिपत्य कर लिया। वह चीन को भी अपने अधीन करना चाहता था, क्योंकि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के बाद उसको कच्चे माल एवं निर्मित माल को बेचने के लिए बाजार की आवश्यकता थी।

08 विवादास्पद अधिकार-क्षेत्र और व्यावसायिक असमानता

यह विवादास्पद मामला था कि कैन्टन में निवास करने वाले ब्रिटिश लोग चीन के अधीन हैं या नहीं। यह मसला तब गम्भीर हो गया जब 1784 ई. में ब्रिटिश जहाज के तोपची द्वारा सलामी के दौरान चीनी नागरिक की मौत हो गई घटना के पश्चात् तोपची को चीन को सौंपना पड़ा और चीनी अदालत ने उसे मृत्युदण्ड दिया। इस न्याय से ब्रिटिश लोग असन्तुष्ट थे। इसके अलावा व्यावसायिक असमानता भी दोनों देशों के सम्बन्धों के खराब होने में सहायक थी।

1757 ई. तक चीन में यूरोपीय व्यापारियों को चीन के तटवर्ती बन्दरगाहों पर व्यापार करने का अधिकार था. परन्तु इसके पश्चात् यह केवल कैन्टन बन्दरगाह तक ही सीमित हो गया। व्यापार की शर्तें चीन के व्यापारियों द्वारा ही तय की जाती थीं।

युद्ध का घटनाक्रम

चीनी कमिश्नर लिन द्वारा अफीम के तस्कर व्यापार के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने पर अंग्रेज व्यापारियों ने ब्रिटिश सरकार को युद्ध करने के लिए तैयार किया। 7 जुलाई, 1839 ई. को चीन और अंग्रेज व्यापारियों के संघर्ष में एक चीनी नाविक की मौत हो गई । चीनी कमिश्नर लिन ने अपराधियों को चीन के सुपुर्द करने की माँग की, जिसका अंग्रेज व्यापार- अधीक्षक इलियट ने विरोध किया। इसी दौरान 1839 ई. में कोलून में कुछ शराबी अंग्रेज नाविकों ने एक चीनी नाविक की हत्या कर दी। अपराधी को पकड़ने के लिए चीन ने अंग्रेज व्यापारियों की खाद्य-आपूर्ति को भंग कर दिया।

फलस्वरूप ब्रिटिश व्यापारियों को कैण्टन के स्थान पर मकाओ में शरण लेनी पड़ी। मकाओ में भी चीनी सरकार द्वारा उन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। अन्ततः उन्होंने हांगकांग में आश्रय लिया। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों में एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिशोध का वातावरण तैयार कर दिया। परिणामस्वरूप 3 नवम्बर, 1839 ई. को दौ ब्रिटिश पोत चीन जहाजों से भिड़ गये और उन्हें मार भगाया। इस घटना के पश्चात् चीन ने ब्रिटिश व्यापारिंयों से सम्बन्ध विच्छेद कर दिये और दोनों देश प्रथम अफीम युद्ध के द्वार पर पहुँच गये। फरवरी, 1840 ई. तक ब्रिटिश सरकार ने चीन के खिलाफ युद्ध करना निश्चित कर दिया, फलत; अप्रैल में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक प्रस्ताव पारित कर दिया। ब्रिटिश विदेशमन्त्री पामस्स्टन ने चौन के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए भारत से सैनिक सहायता प्राप्त की। ब्रिटिश सेना ने जुलाई में कैण्टन पर अधिकार कर लेने के पश्चात् यांग्तसी नदी तक बाड़ाबन्दी कर दी। ब्रिटेन की इस सफलता के पश्चात् चीनी सरकार ने कमिश्नर लिन को अपदस्थ कर चीशान को नियुक्त किया। ब्रिटिश अधिकारी इलियट एवं चीशान की वात्ता के पश्चात् 1841 ई में समझौता हुआ। इसके अनुसार हांगकांग अंग्रेजों को स्थायी निवास के लिए मिल गया, चीन ने ब्रिटेन को क्षतिपूर्ति में 60 लाख डालर देना स्वीकार किया, राजनयिक समानता के अधिकार को स्वीकार किया, कैन्टन पुनः अंग्रेज व्यापारियों के लिये खोल दिया। परन्तु यह समझौता दीर्घकालिक नहीं हो सका।

चीन सरकार ने चीशान को अपदस्थ कर दिया। दूसरी ओर ब्रिटेन ने ईंलियट के स्थान पर हेनरी
पोंटिगर को नियुक्त कर दिया। हेनरी पोंटिगर ने नियुक्ति के पश्चात् ही चीन के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करते हुए चेसर्न द्वीप तथा ‘निगपो’ और ‘अमोय’ नामक नगरों पर अधिकार कर लिया। शंघाई बन्दरगाह के साथ- साथ हांगकांग द्वीप पर ब्रिटिश आधिपत्य हो गया चीन की राजधानी पीकिंग एवं नानकिंग पर भी धावा बोल दिया। चीन में मंचू शासन के खिलाफ विद्रोह भड़क गया ऐसी स्थिति में मंचू शासन के समक्ष ब्रिटेन से समझौता करने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं था अन्ततः 29 अगस्त, 1842 ई. को नानकिंग की सन्धि के पश्चात् प्रथम अफीम युद्ध को विराम दिया गया।

नानकिंग की सन्धि के प्रावधान :

  1. कैण्टन के अतिरिक्त अमोय (Amoy), फूचो (Foochow), निगपो (Nigpo) और शांघाई
    ( Shanghai) के बन्दरगाहों पर अंग्रेज व्यापारियों को व्यापार एवं निवास करने की स्वतन्त्रता मिल गई ।
  2. हांगकांग द्वीप पर ब्रिटेन का आधिपत्य स्वीकार कर लिया गया।
  3. दोनों देशों ने यह तय किया कि आयात-निय्यात के लिए 5 प्रतिशत तटकर लिया जायेगा इसें
    वृद्धि के लिए दोनों देशों की सहमति होना आवश्यक है।
  4. ‘को-हांग’ व्यापारिक संगठन को भंग करते हुए ब्रिटेन के व्यापारियों को चीनी व्यापारियों से लेन- देन करने की स्वतन्त्रता दे दी ।
  5. अंग्रेजों पर मुकदमे उन्हीं के कानून के अनुसार उन्हीं की अदालत में चलाने का अधिकार दे दिया गया।
  6. चीनी सरकार ने 2 करोड़ 10 लाख डॉलर क्षतिपूर्ति देना स्वीकार कर लिया।
  7. यह तय किया गया कि चीन में अन्य देशों के नागरिकों को मिलने वाली सुविधाएँ अंग्रेजों को भी मिलेगी।

इस संधि ने चीन की सार्वभौमिक सत्ता को छिन्न-भिन्न कर दिया। इसके अलावा न केवल आर्थिक
अपितु नैतिक दृष्टि से चीन को हानि पहुँची। यह संधि इंग्लैण्ड को इच्छित लाभ नहीं पहुँचा पाई परन्तु ब्रिटिश साम्राज्य को सुदूरपूर्व में फैलाने में कारगर सायित हुई। सी.डी.एम. कैटलवी ने ‘आधुनिक काल का इतिहास’ में लिखा है कि, “ब्रिटिश बन्दूकों ने चीन में एक दरार बना दी, जिसके बने हुए मार्ग से न केवल इंग्लैण्ड का व्यापार चल पड़ा बल्कि दरार द्वारा यूरोप की अन्य जातियों ने भी चीन में प्रवेश किया।

ब्रिटेन के हाथों चीन की हार के पश्चातू अन्य राष्ट्रों ने भी चीन की कमजोरी का फायदा उठाते हुए
चीन में प्रवेश किया। इस दिशा में अमेरिका अग्रणी रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति टाइलर ने कैलबकशिंग को संधि के उद्देश्य से चीन भेजा। 2 जुलाई, 1844 ई. को चीन एवं अमेरिका के मध्य बांगहिया की सांधि हुई जिसके माध्यम से अमेरिका ने वे सुविधाएँ हासिल कर लों, जो नानकिंग सोंधि के माध्यम से इंग्लैण्ड को प्रात हुई थी। अमेरिका के चीन से संधि करने के पश्चात् क्रमश: फ्रांस ना्ये, स्वीडन और बेल्जियम ने भी चीन से संधि कर ली ।

अनेक राष्ट्रों के साथ चीन द्वारा संधि करने के पश्चात् चीन की सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था
काफी प्रभावित हुई। विदेशियों ने चीनी दा्शनिक कन्य्यूशियस और लाओत्से को आलोचना की। 1856 ई. में फ्रांस के रोमन कैथोलिक पादरी आगस्टे-चेपड़ेलन को चीन में धार्मिक उन्माद फैलाने पर फांसी पर लटका दिया गया। परिणामस्वरूप फ्रांस चीन विरोधी होकर इंग्लैण्ड के पक्ष में आ गया। फ्रांसीसी पादरी की हत्या और चीन के आर्थिक शोषण के परिणामस्वरूप क्रोधाग्नि भड़क उठी और चीन पुन: युद्ध के द्वार पर पहुँच गया। यह युद्ध इतिहास में द्वितीय अफ्रीम युद्ध नाम से जाना जाता है।

ताइपिंग विद्रोह

चीन में राष्ट्र को परिवार मानने की पुरातन अवधारणा है जिसे कुओचिया (राष्ट्रीय परिवार) कहा जाता
था। इसका प्रमुख सम्राट होता था। जनता जब तक हो सम्राट का सम्मान करती थी तब तक कि वह जनता का हितैषी होता था यदि सम्राट पथभ्रष्ट हो जाता तो जनता सम्राट के विरुद्ध विद्रोह कर देती थी। मंचू शासक विदेशी थे परन्तु चीनी सभ्यता एवं संस्कृति को आत्मसात कर उसके अनुयायी बन गये। उन्होंने राज्य की समस्त भूमि एवं सम्पत्ति को मंचू लोगों में वितरित कर दिया जो कि अनुचित था। इस व्यवहार से चीनी लोगों में असंतोष फूट पड़ा जो विद्रोह का कारण बना।

दरिद्रता, बीमारी, भुखमरी और अव्यवस्था चीनी दर्शन के अनुसार जनसाधारण के लिए क्रांति का मार्ग प्रशस्त करती है और सम्राट को अपदस्थ करने को प्रेरित करती है। आन्तरिक अव्यवस्था, कृषक असन्तोष एवं सैन्य दुर्बलताओं ने ताइपिंग विद्रोह को जन्म दिया . इसका नेतृत्व 1814 ई. में कैण्टन में जन्मे हुंग सियू चुआन’ ने किया। वह उच्च शिक्षित व्यक्ति था। अमेरिकन पादरी ईसाशर राबर्ट्स के सम्पर्क में आने से वह ईसाई धर्म से परिचित हो गया उसने ईसाई धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। हुंग ने शांग-ती-हुई’ नामक ईश्वर पूजकों को एक संस्था की स्थापना को। इसी समय 1849 में क्वांगतुंग में एक अकाल पड़ा। मंचू शासक जनता के कष्टों का समाधान नहीं कर पाये। 11 जनवरी, 1851 ई. को हूंग ने अपने अनुयायियों के समक्ष ‘ताइपिंग तिएन-कुओ (महान् शांति का दैवो साम्रान्य) की स्थापना की घोषणा की तथा स्वयं ‘तिएन वांग’ (ईश्वरीय सम्राट) की उपाधि धारण की। उपस्थित सभी सदस्यों ने नवस्थापित सरकार के प्रति निष्ठा एवं स्वामीभकति की शपथ ली। इन लोगों ने क्वांगतुंग के स्थानीय पदाधिकारियों को भागने के लिए मजबूर कर दिया। कालान्तर में विद्रोहियों ने विभिन्न स्थानों पर आक्रमण शुरू कर दिये। 18 प्रान्तों पर हुंग ने अधिकार करके 1853 ई. से नियमित शासन प्रारम्भ कर दिया।

हुंग की सरकार ने प्रत्येक क्षेत्र में सराहनीय कार्य किये उनके सुधार साम्यवादियों से मिलते-লল
उन्होंने स्वियों की स्थिति में सुधार करते हुए वेश्यावृत्ति को प्रतिबंधित कर दिया। बहुविवाह को हतीतहाहिन करते हुए स्त्रियों को सरकारी सेवाओं में नियुक्त किया। सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण करते हुए समाज में यम्बलाता स्थापित करने का प्रयास किया हुंग-सियू-चुआन का ताइपिंग दर्शन दिव्यता के सिद्धांत पर आधारित था ताइपिंग विद्रौहियों की संख्या इतनी नहीं थी कि वे मंचू शासकों के साथ-साथ ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त सेना का मुकावला कर सकें।

अन्ततः 1863 ई. में विद्रोहियों के सुदृढ़ गढ़ ‘सूचाऊ’ पर संयुक्त सेना ने अधिकार कर लिया और 184
ई. में मंचू शासकों ने ताइपिंग विद्रोहियों की राजधानी नानकिंग पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार ताइ़पिंग विद्रोह का पटाक्षेप हो गया इतिहासकार क्लाइड ने इस विद्रोह के सम्बन्ध में लिखा है कि, “ताइपिंग आन्दोलन एक कृषक विद्रोह था, धार्मिक व नैतिक आन्दोलन था और उस वंश के प्रति विद्रोह था जिसके दिव्य अधिकार छिन गये प्रतीत होते थे “

ताइपिंग विद्रोह के परिणामस्वरूप चीन में सर्वत्र बर्बादी और अराजकता का मंजर ननर आने लगा।
जिसने 1911 की क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। द्वितीय अफीम युद्ध (1856-1858) द्वितीय अफीम युद्ध किसी एक कारण का परिणाम नहीं होकर अनेक कारणों का प्रतिफल है। इनमें इंग्लैण्ड की नानकिंग संधि से प्राप्त सुविधाओं से असंतुष्टि, संधि में अफीम के व्यापार को लेकर अस्पष्टता कैन्टन वासियों के हृदय में अंग्रेजों के प्रति अनादर का भाव, अंग्रेजों द्वारा कानून की अवहेलना करना, फ्रांसीसी पादरी को मृत्युदण्ड देना, ताइपिंग विद्रोह ( 1851) आदि प्रमुख हैं। उक्त कारणों की वजह से इंग्लैण्ड एवं चीन के मध्य 1856 ई. में पुनः युद्ध हो गया। 1857 में इंग्लैण्ड ने चीन के कैन्टन बन्दरगाह पर अधिकार कर लिया। इसी समय भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा। इंग्लैण्ड ने फ्रांस, अमेरिका एवं रूस से सहयोग की गुहार की। फ्रांस ने इंग्लैण्ड की सैनिक सहायता की कैन्टन की विजय के पश्चात् अंग्रेजी सेनाएँ ‘टाकु’ (Taku) दुर्ग की ओर बढ़ी। यह ‘टिन्टसिन’ (Tient-sin) की सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान था ब्रिटिश-फ्रांसीसी सेनाओं के ‘टिन्टसिन’ तक पहुँचने पर चीनी सरकार के पास इंग्लैण्ड से समझौता करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहा।

इस प्रकार 1858 में टिन्टसिन की संधि के साथ द्वितीय अफीम युद्ध समाप्त हो गया इस संधि में किये गये प्रावधान निम्नलिखित थे-

  1. यूरोपीय देशों के व्यापार व निवास के लिए चोन ने 11 बन्दरगाह खोल दिये।
    2 . यांग्ल्सी नदी में पश्चिमी देशों के जहाजों को आने-जाने की अनुमति मिल गई ।
  2. पीकिंग में पश्चिमी देशों के राजदूतों को निवास करने की अनुमति मिल गई ।
  3. इंग्लैण्ड एवं फ्रांस को युद्ध हर्जाना देना चीन ने स्वीकार कर लिया।
  4. यह तय किया गया कि पासपोर्टधारी विदेशी चीन में कहीं भी यात्रा कर सकता है।
  5. चीन ने विदेशी धर्म प्रचारकों की प्राण रक्षा का वचन दे दिया|।
  6. अफीम व्यापार को नियंत्रित करने के लिए अफीम के आयात पर कर लगा दिया।

ब्रिटेन फ्रांस एवं चीन के मध्य हुए द्वितीय अफीम युद्ध में चौन की पराजय के परिणामस्वरूप चीनी
दरवाजा यूरोपीयों के लिए पूर्णत: खुल गया। इससे चीन की कमजोरियों जगजाहिर हो गई यूरोपीय साम्राज्यवादी ताकतों ने चीन में आधिपत्य स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

बॉक्सर विद्रोह (1899 ई.)

चीन में विदेशी हस्तक्षेप बढ़ने से साम्राज्यवादी ताकतों ने इसे बाँटने का प्रयत्न किया। चीन की
आर्थिक स्थिति छिन्न-भिन्न हो गई। ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा चीनी जनता के साथ अपमानजनक व्यवहार के कारण चीनी देशभक्तों में सुधार की भावना प्रस्फुटित हुई जिसने विद्रोह का रूप धारण कर लिया। 1899 ई. के अन्त में शाटुंग प्रांत में प्रस्फुटित ‘बॉक्सर विद्रोह’ एक संगठित प्रयास था । विद्रोहियों ने रेलमार्गों को क्षति।पहुँचाई, चर्चों को जलाया तथा यातायात को भी क्षतिग्रस्त किया। 1900 ई. में ये विद्रोही पीकिंग की ओर बढ़े जहाँ विदेशी सैन्य टुकड़ी को उन्होंने भगा दिया साम्राज्ञी ‘त्जू शी’ का विद्रोहियों को समर्थन प्राप्त था। उन्होंने अनेक ईसाइयों का कत्लेआम किया। दूतावासों पर प्रहार किये, जापानी राजदूत की हत्या कर दी उन्होंने विदेशियों को यह चेतावनी दी कि वे 24 घंटे में चीन छोड़ दें। इसके अलावा मंचू सैनिक ने जर्मनी राजदत चांंसलर’ की हत्या कर दी। इस प्रकार के घटनाक्रम से विदेशियों में भय व्याप्त हो गया।

बॉक्सर विद्रोहियों से भयभीत होकर रूसी, ब्रटिश, जापानी एवं अमेरिकी सैनिकों ने संयुक्त रूप से सेना का गठन किया। इस सेना ने हजारों चीनी सैनिकों का कत्लेआम कर दिया। टीन्टसिन को कब्जे में लेकर पीकिंग से बॉक्सर विद्रोहियों का खात्मा कर दिया। साम्राज्ञी ‘त्जू शी’ को जेहोल में आश्रय लेना पड़ा। इस।प्रकार विदेशियों के संयुक्त सैन्य अभियान ने चीन को पुनः विघटन के कगार पर पहुँचा दिया। 7 सितम्बर,।1901 ई. को विदेशियों ने चीन के साथ ‘बॉक्सर प्रोटोकोल’ सम्पन्न किया जिसकी शर्तें निम्नलिखित थीं-

  1. बॉक्सर के विद्रोहियों को कठोर दंड दिया जाएगा।
  2. पीकिंग स्थित विदेशी दूतावासों की सुरक्षा के लिए विदेशी सेना स्थायी रूप से रखी जायेगी।
  3. जापान और जर्मनी के राजदूतों की हत्या के लिए चीनी सरकार क्षमा माँगे।
  4. जिन नगरों में विद्रोह उपजा उनके नागरिकों को नागरिक सेवा प्रतियोगिता परीक्षा में 5 वर्ष तक बैठना निषिद्ध किया गया और उन्हें किसी राजकीय सेवा में भर्ती नहीं किया जाये।
  5. चीन में 2 वर्षों तक शस्त्रों का निर्माण एवं विदेशों से आयात प्रतिबंधित किया गया।
  6. बॉक्सर विद्रोह की क्षतिपूर्ति के रूप में चीन को 45 करोड़ तायल भुगतान करना निश्चित किया गया। इस अपमानजनक बाँक्सर विद्रोह के पटाक्षेप ने मंचूवंश के पतन को दो कदम आगे बढ़ा दिया। पीकिंग में विदेशी स्थायी सेना की नियुक्ति से चीनी आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप बढ़ने लगा । प्रथम एवं द्वितीय अफीम युद्ध के परिणामस्वरूप चीन का दरवाजा विदेशियों के लिए खुल गया। 1860 के पश्चात् अवसरानुकूल यूरोपीय राष्ट्रों ने चीन में लूट-खसोट मचाई। प्रथम अफ्रीम युद्ध के पश्चात् चीन के साथ अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने संधियाँ को जिसके फलस्वरूप वह पाश्चात्य साम्राज्यवाद का शिकार हो गया।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में मध्यकालीन अवस्था से निकलकर आधुनिकीकरण के पश्चात जापान भी साम्राज्य विस्तार करने को आतुर हो उठा। उग्र साम्राज्यवादी नौति का अनुसरण करते हुए जापान ने 1894 ई. में चीन पर आक्रमण किया। इस युद्ध में चीन पराजित हुआ। 1895 के पश्चात, चीन पर रूस का प्रभाव बढ़ने लगा। फ्रांस को चीन में रेल निर्माण, खाने खोदने के साथ-साथ कुछ बन्दरगाहों का प्रयोग करने की सुविधाएँ प्राप्त हुईं। 1897 ई. में शांटुंग प्रांत में दो जर्मन पादरियों की हत्या के बाद जर्मनी ने भी चीन पर आक्रमण कर ‘वयाऊचाओ’ प्रदेश पर कब्जा कर लिया। इसके अलावा जर्मनी को रेल निर्माण एवं सेना रखने की अनुमति प्राप्त हो गई।

इस प्रकार की स्थिति में अनेक राष्ट्रों में यह उत्कंठा बढ़ने लगी कि किस प्रकार चीन में अधिक सुविधाएँ प्राप्त करें? 1897 ई. में रूस ने पोर्ट आर्थर एवं तेलीनवात पर अधिकार कर लिया। इसके बाद फ्रांस ने च्यांगयुआन प्रदेश के साथ टोनकिन से उनान तक रेल निर्माण का अधिकार मांगा। इंग्लैण्ड ने भी हांगकांग से सटे हुए प्रदेशों पर अधिकार का दावा कर दिया। इस प्रकार चीन में यूरोपीय राष्ट्रो का अलग-अलग प्रभाव कायम होने से उसको सम्प्रभुता ध्वस्त हो गई। पश्चिमी राष्ट्रों में संयुक्त राज्य अमेरिका से चीन के सम्बंध मधुर बने रहे थे उसने चीन के साथ संघर्ष नहीं करके व्यापार के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करते हुए ‘मुक्त द्वार नीति’ (Opendoor Policy) का मार्ग प्रशस्त किया। इससे ‘चीनी तरबूज’ (Chinese Melon) को काटने की प्रक्रिया शुरू हो गई। चीन के भू-भाग कालान्तर में केन्द्रीय सरकर के अधिकार से निकलने लगे और उन पर विदेशी राष्ट्रों ने शिकंजा कस लिया।

कोरिया को लेकर चीन-जापान युद्ध (1894-95) हुआ था जिसमें चीन पराजित हुआ। इस युद्ध का अन्त ‘शिमोनोसेकी संधि’ (17 अप्रैल, 1895) के साथ हुआ। इसमें कोरिया की स्वतंत्रता को स्वीकार करते हुए फारमोसा, पेस्काडीरस तथा दक्षिणी मंचूरिया का पूर्वी भाग जापान को दे दिया गया। चीन ने जापान को क्षतिपूर्ति के रूप में 20 करोड़ तायल देना स्वीकार करते हुए 7 नये बन्दरगाह भी खोल दिये। इस प्रकार जापान का प्रभाव एशिया एवं यूरोप में बढ़ने लगा।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि चीन राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र राष्ट्र होकर भी आर्थिक रूप से विदेशियों के शिकंजे में कसा हुआ था। चीन विदेशियों की इच्छा के बिना सांस भी नहीं ले सकता था। चीन- जापान युद्ध, बॉक्सर विद्रोह के पश्चात् चीन पर विदेशी ऋण बढ़ता चला गया विदेशी राष्ट्रों ने आर्थिक साम्राज्यवाद के साथ-साथ राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया। इससे चीन दुर्बल स्थिति में पहुँच गया।

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