Top 04 कला में पुनर्जागरण

Top 04 कला में पुनर्जागरण

पुनर्जागरण युग की कला चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य कला एवं संगीत में मध्यकाल की जड़ एवं -स्पंदनशून्य प्रवृत्तियों के प्रति अस्वीकार एवं विद्रोह की भावना दिखाई देती है, तथा मानव जीवन की सहज, स्वाभाविक एवं जीवंत अनुभूतियों के अंकन के प्रति नवीन उत्साह दृष्टिगोचर होता है। मध्यकाल में कला की आत्मा ईसाई चर्च के कठोर शिक्षाप्रद साँचों में दब-सी गई थी। उस समय कला का उद्देश्य संगठित चर्च के निर्देशानुसार, धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार करना था; ईसाई संतों एवं मरियम के अत्यधिक गम्भीर एवं जीवनविहीन अंकन इस काल में किये गये थे कला का तादात्म्य जीवन के यथार्थ से टूट गया था।

पुनर्जागरण युग में कला धार्मिक विषयों से मुक्त नहीं हो पायी, लेकिन कला की प्रस्तुति एवं शैली में जीवन के यथार्थ एवं नैसर्गिक तत्वों का प्रतिबविम्बन हुआ। साहित्य की भाँति कला में भी मानववादी चेतना का उदय हुआ। कला के प्राचीन क्लासिकी आदरशों से प्रेरणा ग्रहण की गयी। पुनर्जागरण काल की कला की एक मुख्य विशेषता थी-जीवन के सहज सौन्दर्य का जीवंत, पूर्वाग्रहमुक्त एवं स्वाभाविक अंकन।

(01) चित्रकला में पुनर्जागरण

पुनर्जागरण काल में चित्रकला का अधिकतम सृजन इटली में हुआ एवं पुनर्जागरण युग की नवीन भावनाओं को भी सबसे अधिक सशक्त रूप में इटली के चित्रकारों ने व्यक्त किया। प्राचीन यूनान एवं रोम की चित्रकला के अवशेष बहुत कम बचे थे, इसलिये चित्रकारों को कोई निश्चित क्लासिकी आदर्श नहीं मिला; इस शून्यता में उन्हें मौलिकता एवं नवीनता के सृजन का अवसर मिल गया ।
तेरहवीं शताब्दी के अंत तक, इटली की चित्रकला बाइजैन्टाइन कला-परंपरा के पूर्ण नियंत्रण में थी,
जिसमें परंपरागत धार्मिक विषयों की निर्जीव पुनरावृत्तियाँ थीं, जो प्राय: गिरजाघरों की बड़ी दीवारों पर भित्तिचित्रों के रूप में की जाती थीं चित्रण में यथार्थवादी पुट की शुरूआत सिमेब्यू (1240-1302) एवं पियट केवेलिनो (तेरहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नामक इटली के दो चित्रकारों ने की, लेकिन चित्रकला में यथार्थवाद का व्यापक एवं प्रभावशाली प्रयोग पहली बार जियोटो (1276-1337) ने किया, जिसे चित्रकला की नवीन परंपरा का प्रणेता माना जाता है। उसके चित्रों में जीवन की वास्तविक अनुभूतियों का अंकन देखने को मिलता है। उसके बारे में एक कहानी प्रसिद्ध है कि उसने एक मक्खी का ऐसा यथार्थ चित्रण किया कि उसके गुरु,.सिमेब्यू, उसे सचमुच की मक्खी समझकर हाथ से भगाने लगे।

पुनर्जागरण युग के प्रारम्भिक चित्रकारों में उल्लेखनीय नाम हैं- (i) फ्रा एंजेलिको (1387-1455) जिसने चित्रों की पृष्ठभूमि को अधिक वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया; (ii) मेसेकियो (1401-1428) जिसने चेहरे के भावों एवं मानवीय भुजाओं के उभारों को सत्य रूप में चित्रित करने एवं प्रकाश-छाया के प्रयोग से चित्रित वस्तुओं के आकार को अधिक स्पष्ट बनाने का प्रयास किया; (iii) केस्टेगनो ( 1390 1457) ने ऊर्जा।एवं स्फूर्ति से परिपूर्ण मानवीय शरीर को, मांसपेशियों के उभार के साथ, यथार्थ रूप में चित्रित किया; (iv) फ्रा फिलिप्पो लिप्पी (1406-1469) ने पहली बार लोकजीवन की झांकियों को अपने चित्रों का विषय बनाया, (v) बेनोजो गोजोली (1420-1497) ने भी अपने चित्रों के बिम्ब प्रकृति एवं आस-पास के जीवन से लिए; तथा (vi) सेन्ड्रो बोटिसेली (1444-1510) के चित्र अपनी कलात्मक उत्कृष्टता एवं समकालीन जीवन के यथार्थ चित्रण के लिए विख्यात हैं।

पुनर्जागरण के उच्च एवं विकसित काल में, इटली में तीन चित्रकार हुए जिन्होंने नवीन चित्रकला के विकास में क्रान्तिकारी योगदान दिया। ये तीन प्रसिद्ध चित्रकार हैं: लिओनार्डों द विन्ची (1452-1519), राफेल (1483-1520) एवं माइकेल एंजेलो (1475-1564)। लिओनार्डों द विन्ची (1452-1519) एक बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी था; वह कलाकार होने के साथ-साथ कवि, दार्शनिक, वास्तुकार, संगीतकार, वैज्ञानिक एवं इंजीनियर भी था लिओनार्डों की दो सुप्रसिद्ध कलाकृतियाँ (चित्रांकन) हैं: ‘द लास्ट सपर’ (अन्तिम रात्रिभोज ) एवं ‘मोनालिसा’ (एक स्त्री) ।

‘द लास्ट सपर’ (अंतिम रात्रिभोज) नामक चित्र को पुनर्जागरण युग की एक अत्यंत उत्कृष्ट रचना एवं लियोनार्डों की सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। इस कृति में ‘पिछली दो शताब्दियों से कला के क्षेत्र में चल रहे प्रयोगों का सुन्दर निचोड़ देखा जा सकता है। ‘ इस चित्र में ईसा मसीह रात्रिभोज के अवसर पर अपने साथियों के मध्य यह घोषणा कर रहे हैं कि उनमें से एक साथी उन्हें दगा देने वाला है। ईसा मसीह के चेहरे का भाव प्रशांत एवं स्थिरचित्त है, लेकिन उनके सभी साथियों के चेहरे पर अलग-अलग किस्म के भाव हैं। इन सबका बड़ा सजीव चित्रण लिओना्डों ने किया है। यह चित्र ‘एक जीवन्त नाटक’ है। लिओनार्डों ने अपने चित्रों में रंगों और चित्रण की शैलियों के सम्बन्ध में कई नवीन प्रयोग किए; चित्रण से पूर्व विषय-वस्तु एवं उसकी प्रस्तुति की कला का वह एक वैज्ञानिक की भाँति अध्ययन करता था।

उसके चित्रों में प्रकाश एवं छाया का सुन्दर अनुपात देखने को मिलता है। वह अपने चित्रों में व्यक्तियों को त्रिकोणात्मक ढंग से व्यवस्थित करता था उसने मानव शरीर के विभिन्न अंगों का अध्ययन एवं प्रस्तुतीकरण.भी बड़ी सूक्ष्मता से किया लेकिन लिओनार्डों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने आअपने व्यक्ति-चित्रों को.भावात्मक सौन्दर्य से परिपूर्ण बनाया है; नारी को वह भावप्रवण सौन्दर्य का आधार मानता था, और उसने.अपने चित्रों में पौधों, फूलों, शिला-खण्डों एवं शरीर के विभिन्न अंगों का अंकन स्तरियोचित कोमलता के साथ.किया है। लिओनार्डो द विंची द्वारा बनाया गया दूसरा चित्र ‘मोनालिसा’ विश्व कला जगत की एक अमूल्य निधि है। मोनालिसा एक व्यक्ति-चित्र (पोर्ट्रेट) है, जिसमें लिओनाड्डों ने जियोकोंडो नामक एक व्यक्ति की युवा.पत्नी मोनालिसा का चित्रांकन किया है, जिसके चेहरे पर एक हल्की-सी स्मित या मुस्कान अक्सर खेला करती थी। उसी स्मित या मुस्कान को लिओनार्डो ने बड़ी खूबसूरती से अपने चित्र में कैद कर लिया।

मोनालिसा की इस हल्की-सी स्मित या मुस्कान को रहस्यमयी माना जाता है, जिसके अर्थ या भाव की अनेक.व्याख्याएँ संभव हैं। मोनालिसा के चित्र की विशेषता, उसके रहस्यमयी आकर्षण के अतिरिक्त, भंगिमा की.सुन्दरता या लावण्य, परिधान की शोभा एवं जलधाराओं, कुंडों तथा पथरीली चट्टानों से युक्त उसकी पृष्ठभूमि है।.लिओनार्डों के दो अन्य चित्र भी महत्त्वपूर्ण हैं ये हैं-“दि वर्जिन ऑफ दि राक्स” एवं “दि वर्जिन एण्ड चाइल्ड विद सेन्ट एने ” -ये दोनों चित्र जे.ई. स्वेन के शब्दों में ‘एक प्रीतिकर रहस्य एवं दुर्लभ आंतरिक सौन्दर्य के भाव का आभास कराते हैं। फ्रांस एवं इंग्लैण्ड में पुनर्जागरण युग में चित्रकला के क्षेत्र में कोई विशेष उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। स्पेन एवं पुर्तगाल में भी चित्रकला सोलहवीं शताब्दी तक पारंपरिक पद्धतियों एवं विषयों पर केन्द्रित रही।


(02) मूर्तिकला


यह उल्लेखनीय है कि मूर्तिकला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में यूरोप में मध्यकाल के दौरान, अधिकांश
कार्य, उत्तरी यूरोप के क्षेत्र में हुआ, न कि इटली में। उत्तरी यूरोप में इस काल में सर्वत्र गोथिक शैली का
बोलबाला रहा, भले ही वह गिरजाघरों का निर्माण हो या सार्वजनिक महत्त्व के स्मारकों का या निजी भवनों का। लेकिन चौदहवीं शताब्दी से कला के सभी क्षेत्रों मूर्तिकला एवं स्थापत्य कला सहित का नेतृत्व इटली के समृद्धशाली नगरों के हाथ में आ गया। नवधनाढ्य अभिजात वर्ग की धर्मनिरपेक्ष अभिरुचियों की संतुष्टि के लिए, इन नगरों में कला के नवीन रूपों का सृजन किया गया कला, पुनर्जागरण युग की मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त एवं पारदरशी माध्यम बन गई।

पुनर्जागरण युग के मूर्तिकारों ने प्राचीन क्लासिकी युग की मूर्तिकला के धर्मनिरपेक्ष एवं यथार्थमूलक
प्रतीकों से प्रेरणा ग्रहण की। कला के धार्मिक विमुक्तिकरण की प्रक्रिया में नवीन मूर्तिकारों को, मनुष्य के वास्तविक जीवन-रूप को, करीब से पहचानने और उसे कला में रूपान्तरित करने का अवसर प्राप्त हुआ। नये कलाकारों ने मूर्तिकला की गोथिक परम्पराओं जैसे भारी वर्त्र-परिधान, कोणात्मक शरीर, मनुष्य का विषादपूर्ण चेहरा आदि को तिलांजलि दे दी। मूर्तिकला में यथार्थवादी अंकन की शुरूआत इटली में मूर्तिकला की पीसा.शैली में देखी जा सकती है।


इटली में पुनर्जागरण युग के नये प्रयोगधर्मी मूर्तिकारों में इनके नाम विशेष उल्लेखनीय हैं: जेकोपो
देला क्व्सिया (1374-1438); लॉरेन्जी घिबटी (1378-1455); डोनोतेल्लो (1386-1466); ल्यूका देला रोब्बिया (1400-82); एन्द्रिया वेरोचियो (1435-1488); एवं एन्टोनियो पोलाईयूलो (1432-1498)। पुनर्जागरण के उच्च काल का सबसे प्रतिष्ठित एवं अत्यंत प्रतिभाशाली मूर्तिकार, माइकेल एंजेलो (1475-1564) था। जेकोपो देला क्वर्सिया (1374-1438) के मूर्तिशिल्प के श्रेष्ठ उदाहरण सिएना के मैरी फाउन्टेन एवं बोलोग्ना में संत पेट्रोनियो गिरजाघर के मुख्य द्वार के संगमरमरीय तक्षण कार्य में देखे जा सकते हैं । ये मूर्तिशिल्प, क्लासिकी सौन्दर्य के आदर्श से प्रेरित हैं लेकिन इनमें ‘यथार्थवाद की विजय’ देखी जा सकती है ।

पुनर्जागरण युग की मूर्तिकला के विकास में दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण था, फ्लोरेंस के लारेन्जो घिब्टी
(1378-1455) का मूर्तिशिल्प। लारेन्जो घिबर्टी ने अपने जीवन के प्रारंभिक काल में ही फ्लोरेंस की ‘बैपटिस्ट्री’ (बपतिस्मा कक्ष) के उत्तरी द्वारों के मूर्तिशिल्प कार्य (ईसाई धर्म के विषयों से संबद्ध) में प्रदर्शित यथार्थवादिता के लिए ख्याति अर्जित कर ली थी। लेकिन उसकी सर्वोत्कृष्ट कृति या रचना सेंटा मारिया के मुख्य गिरजाघर के पूर्वी द्वारों का मूर्ति शिल्पांकन है। ईसाई धर्म के विषयों से सम्बद्ध ये शिल्पांकन अपनी सत्याभासी प्रकृति, नाटकीय ऊर्जास्विता एवं सूक्ष्म चारुता के लिए विख्यात हैं। माइकेल एंजेलो ने इनकी भव्यता एवं सौन्दर्य से मुग्ध होकर यह कहा कि ये शिल्पांकन वस्तुत: “स्वर्ग के द्वारों को सुशोभित किये जाने के योग्य है।” डोनोतेल्लो (1386-1466) फ्लोरेंस का एक महान् चित्रकार था। ‘उसने गोथिक प्रवृत्तियों से मूर्तिकला को आजाद किया एवं उसमें रूढ़िमुक्त स्वाभाविकता की सृष्टि की।’ डोनातेल्लो की तीन प्रसिद्ध कृतियाँ हैं–
(1) फ्लोरेंस के गिरजाघर की एक ताख में लगी पाषण से बनी ‘संत जार्ज की प्रतिमा’, जो अपनी सूक्ष्म एवं विचारसंपन्न मुखाभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है।

(2) डेविड की कांस्य मूर्ति, जिसके शरीर का हर अंग ऊर्जा से तरंगवान-सा दिखाई देता है। यह उल्लेखनीय है कि डेविड की मूर्ति को गोथिक परंपरा के अनुसार किसी
गिरजाघर की ताख में नहीं बनाया गया, बल्कि उसे स्वतनत्र रूप से खड़ा किया गया है। ‘इस प्रकार मूर्तिकला स्वयं को स्थापत्यकला के आधिपत्य के मुक्त करने का प्रयास कर रही थी।’

(3) पलोरेंस के कैथेड्राल में शिल्पित गायनरत एवं नृत्यरत युवाओं का दृश्य ‘सिंगिंग कोएर’ जो अपने अपूर्व सौन्दर्य के लिए विख्यात है।

इससे प्रतीत होता है कि मूर्तिकार को मानवीय शरीर एवं उसकी भाव-व्यंजनाओं का पूरा ज्ञान है।
ल्यूका देला रोब्बिया (1400-82) द्वारा फ्लोरंस के मुख्य गिरजाघर में गायकों एवं नर्तकों के आठ
फलकों में बनाए गये मूर्तिशिल्प; एन्दिया वेरोचियो (1435-1488) द्वारा बनाई गई डेविड की मुर्ति; एवं
एन्टोनियो पोलाईयूलो (1432-1498) द्वारा रोम के संत पीटर गिरजाघर के दो मकबरों का शिल्पांकन
ये सब भी इटली में पुनर्जागरण युग की विकासमान मूर्तिकला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

इटली का सबसे प्रसिद्ध एवं सर्वश्रेष्ठ मूर्तिकार माइकेल एंजेलो (1475-1564) था। माइकेल एंजेलो का मानना था कि पाषाण में विचार का अधिष्ठान या अभिव्यक्ति सर्वोच्च कला है। उसकी सभी कलाकृतियों में विचार एक प्रमुख त्त्व है, एक ऐसा तत्त्व जो मनुष्य की भौतिक एवं शारीरिक अभीप्साओं से ऊपर है एक चित्रकार की अपेक्षा एक मूर्तिकार के रूप में माइकेल एंजेलो अधिक क्रान्तिकारी था; वह स्वयं को एक मूर्तिकार मानता था ।.एक मूर्तिकार के रूप में माइकेल एंजेलो की उल्लेखनीय कृतियाँ निम्नलिखित हैं-

(1) माइकेल एंजेलो की प्रारंभिक कृतियों में महत्त्वपूर्ण है, ‘पिएता’ जो एक सुन्दर युवा कुँआरी कन्या (वर्जिन) की मूर्ति है जो अपनी गोद में मृत ईसा मसीह के शरीर को लिए हुए है।’ कन्या का मुख एक अपूर्व सौन्दर्य का उदाहरण है, जिसमें दु:ख की प्रशांत अवस्था का निरूपण है पिएता माइकेल एंजेलो के मूर्तिशिल्प की एक उत्कृष्ट रचना है इसका निर्माण रोम में किया गया था ।

(2 ) संगमरमर से बनी ‘डेविड की विशालकद मूर्ति’ जिसका निर्माण फ्लोरेंस में किया गया । इसमें डेविड के शरीर का बड़ा शक्तिमान चित्रण है जिसमें उसकी विचार-मुद्रा प्रखर रूप में दिखाई देती है। जहाँ पिएता में शांत नैराश्य का भाव है, वहाँ डेविड में माइकेल एंजेलो द्वारा बलवान ऊर्जा का प्रदर्शन है।

(3) पोप जूलियस द्वितीय के मकबरे के लिए निर्मित विशाल ‘मोजेज ‘ यह बैठे हुए मोजेज की मूर्ति है जो क्रोधपूर्ण मुद्रा में है एवं जिसकी आँखें दूर विस्तीर्ण में कुछ देख रही हैं। इसमें मोजेज की विचारपूर्ण मन:स्थिति का बड़ा स्वाभाविक एवं यथार्थपरक अंकन है।

(4) मेडिसी परिवार के लिए बनाए गये दो मकबरों के मूर्तिशिल्प एक मकबरे के मूर्तिशिल्प में ‘दिन एवं रात्रि’ को पुरुष एवं नारी मूर्ति के रूप में दिखाया गया है। दूसरे मकबरे में ‘सूर्योदय एवं सूर्यास्त’ को क्रमशः एक स्त्री एवं पुरुष मूर्ति के रूप में दिखाया गया है। उपर्युक्त दोनों ही अंकनों में, मनोभावों का बड़ा सहज एवं प्रभावशाली चित्रण देखने को मिलता है। इटली के बाहर यूरोप के अन्य देशों में भी पुनर्जागरण युग की नवीन गूर्तिकला का प्रसार हुआ, विशेषतः फ्रांस में। फ्रांस के गोजों (सोलहवीं शताब्दी ) ने पेरिस के एक महल के फव्वारे के लिए जल- अप्सराओं की मूर्तियों का एक समूह तैयार किया, जिसमें क्लासिकल परंपरा के साथ प्रत्यक्ष वास्तविकता का नवीन पुट दिखाई देता है। पिलो (1535-1590) ने सेंट डेनिस में हेनरी द्वितीय के मकबरे को सुन्दर मूर्तियों से सुसज्जित किया, जिसमें सौन्दर्य के साथ-साथ यथार्थ का तीक्ष्ण पुट दिखाई देता है। फ्रांस, में गोजों एवं पिलों के मूर्तिशिल्पों ने मध्यकालीन परंपराओं को तिलांजलि देकर, पुनर्जागरण युग की नवीन मूर्तिकला का श्रेष्ठ प्रतिनिधित्व किया। स्पेन में एलोन्सो बे्यूग्युते (1480-1561) ने ‘सेन सेबेस्टियन’ नामक एक युवा व्यक्ति की मूर्ति का निर्माण किया, जिसमें उसकी परतंत्रता के भाग्य से मुक्ति की आकांक्षा की भावना, बड़े प्रखर रूप में अभिव्यक्त होती है। जर्मनी में पीटर विश्चेर 1560 – 1529) नामक मूर्तिकार ने पुरानी गोथिक शैली के साथ पुनर्जागरण युग की मूर्ति शैली के नवीन तत्त्वों का समन्वय किया।

(03) स्थापत्यकला में पुनर्जागरण

पुनर्जागरण युग में स्थापत्य या भवन निर्माण की एक नवीन शैली का विकास हुआ। मध्यकालीन गोथिक शैली के स्थान पर, प्राचीन यूनान एवं रोम की क्सासिकी शैली के आधार बनाकर, एक नवीन शैली का उत्कर्ष हुआ जिसमें क्लासिकी शैली के मेहराब, गुम्बद एवं स्तंभों के निर्माण के साथ-साथ रूपांकन एवं अलंकरण के नवीन तत्वों का समावेश हुआ है। पुनर्जागरण युग की नवीन स्थापत्य शैली का केन्द्र रोम था ‘जहाँ गोथिक शैली अपनी जड़ें स्थापित नहीं कर पाई थी।

नवीन स्थापत्य शैली का प्रवर्तक इटली का फिलिप्पो बूनेलेश्ची ( 1377-1446) था, जिसने रोम के प्राचीन भवनों का गंभीर वास्तुशास्त्रीय अध्ययन किया। फिलिप्पो ब्रुनेलेश्ची ने प्लोरेंस के सेंटा क्रोसे गिरजाघर में ‘पज्जी चैपल’ नामक स्थल का निर्माण कराया जिसमें स्तंभों, मेहराब एवं गुम्बद का प्रयोग किया गया लेकिन प्राचीन रोमन शैली के साथ-साथ कई नवीन तत्वों का भी प्रयोग इस निर्माण-कार्य में दिखाई देता है।

फिलिप्पो ब्रुनेलेश्ची का सबसे प्रसिद्ध कार्य, फ्लोरेंस के सेंटा मारिया कैथेड्राल की ऊँची गुम्बद का निर्माण था.जो कि ‘एक बहुत उच्च श्रेणी का मौलिक कार्य था।

नवीन स्थापत्य शैली में इटली में अनेक महलों का निर्माण किया गया इटली के समृद्ध व्यापारियों ने इस महलों के निर्माण में पर्याप्त अभिरुचि प्रदर्शित की ये महल पुरानी मध्यकालीन शैली के नहीं थे जब महलों को सैनिक सुरक्षा की दृष्टि से, ऊँची मीनारों से युक्त एवं कम खिड़कियों वाला बनाया जाता था नये महल काफी खुले-खुले थे । इटली के मिकेलोजी (1396-1472) नामक वास्तुकार ने नवीन स्थापत्य शैली में एक सुन्दर मेडिसियन (मेडीसी परिवार के लिए) महल का निर्माण करवाया।

लिओन बेतिस्ता अल्बर्टी (1495-1472) स्थापत्य के क्षेत्र में एक अन्य महत्त्वपूर्ण नवप्रवर्तक था। उसने चर्च स्थापत्य में नवीन शैली का प्रयोग किया। पुनर्जागरण के उच्च काल में स्थापत्य भी अपने चरम विकास पर पहुँचा। पुरानी गोथिक शैली इस काल में धीरे -धीरे पूरे यूरोप से लुप्तप्राय हो गयी। स्थापत्य की नवीन शैली का सबसे जाज्वल्यमान उदाहरण है-रोम में संत पीटर का गिरजाघर। इसका निर्माण कार्य ब्रेमेन्टी (1444-1514) नामक वास्तुकार ने प्रारंभ किया था इसे बाद में राफेल एवं माइकेल एंजेलो द्वारा पूरा किया गया यह गिरजाघर ईसाई धर्म का एक भव्य स्मारक है। इसमें एक सुन्दर.अनुपात वाली विशाल एवं शानदार गुम्बद बनी हुई है जिसके निर्माण की योजना माइकेल एंजेलो ने बनाई.थी। गिरजाघर के अन्तर्वर्ती हिस्सों में बड़ा समृद्ध मुर्तिशिल्प एवं अलंकरण है अपनी अनेक विशेषताओं के.कारण, संत पीटर का गिरजाघर पुनर्जागरण युग की स्थापत्यकला का भव्यतम स्मारक है।

इस काल में वेनिस में भी कुछ श्रेष्ठ वास्तुकार हुए, जैसे- इकेल सेन मिशेलि (1484-1569) एवं जैकोपो सैन्सोविनो (1486-1570)। धीरे-धीरे नवीन स्थापत्य कला का प्रसार पूरे यूरोप में हो गया। मानववाद की भावना में नवदीक्षित यूरोपवासियों की सौन्दर्यमूलक भावनाओं को, पुनर्जागरण युग की नवीन स्थापत्य कला, संतोष एवं हर्ष प्रदान कर रही थी।

(04) संगीत कला में पुनर्जागरण

पुनर्जागरण युग में, संगीत के क्षेत्र में कई नवीन प्रवृत्तियों का विकास हुआ। मार्टिन लूथर ने गिरजाघरों
में धार्मिक मंत्रों एवं गीतों के सामूहिक गान की परंपरा का सूत्रपात किया। लूथर ने लैटिन छंदों, मंत्रों एवं मोरेवियन धार्मिक गीतों तथा स्वरचित पद्यों का एक संकलन 1524 में प्रकाशित किया, जो इतिहास की पहली लोकप्रिय धार्मिक गीतों की पुस्तक थी। रोमन कैथोलिक चर्च ने भी संगीत में परिवर्तन की संभावनाओं पर विचार किया। इस हेतु पेलेस्ट्रीना (1524-1594) ने “मास ऑफ पोप मार्सेलस” नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें गेय धार्मिक पद्य-बन्धों का संग्रह है जो बहुत लोकप्रिय हुआ है। पुनर्जागरण युग में इटलीवासियों ने नये वाद्य-यंत्रों की सृष्टि की एवं आर्केस्ट्रा संगीत को विकसित किया। साधारण से रीबेक’ वाद्य यंत्र को वायलिन में बदल दिया गया एवं ‘हाप्सी कार्ड’ का निर्माण किया गया जो कि पियानो का पूर्व रूप था। आर्केस्ट्रा संगीत भी पुनर्जागरण की देन है; सबसे पहला ऑपेरा 1594 में प्रस्तुत किया गया।

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