Top 04 क्षेत्र में आधुनिक युग का साहित्य पुनर्जागरण

Top 04 क्षेत्र में आधुनिक युग का साहित्य पुनर्जागरण

पुनर्जागरण युग में रचे गए साहित्य में यद्यपि क्लासिकी साहित्य अर्थात् प्राचीन यूनान और रोम के साहित्य की आंतरिक भावना का पुनरुत्थान दृष्टिगोचर होता है, लेकिन बहुत सी ऐसी नवीन विशेषताएँ इस काल के साहित्य में दिखाई देती हैं जो अपने आप में अभूतपूर्व हैं एवं नवयुग की संदेशवाहक हैं। पुनर्जागरण युग के साहित्य की ये नवीन विशेषताएँ हैं :

(i) मानववादी चेतना

इस काल में साहित्यकारों की मुख्य चिन्ता धार्मिक विषयों का प्रतिपादन नहीं है । इस काल की रचनाओं में मानववादी चेतना का स्वर प्रखर दिखाई देता है, अर्थात् साहित्य में मानव जीवन की दैनिक, वास्तविक एवं प्रत्यक्ष अनुभूतियों, समस्याओं एवं आकांक्षाओं का चित्रण प्रमुख है। पुनर्जागरण युग का साहित्य, धर्म की कठोर एवं रहस्यवादी मध्यकालीन परंपराओं के घेरे से बाहर निकलकर, मानव जीवन के वास्तविक सौन्दर्य एवं पीड़ाओं की ओर उनमुख हुआ।

(ii) देशज ( राष्ट्रीय) भाषाओं का उत्कर्ष : पुनर्जागरण युग का कुछ साहित्य प्राचीन क्लासिकी भाषाओं लैटिन तथा यूनानी-में लिखा गया, लेकिन साहित्य का एक बड़ा महत्त्वपूर्ण अंश- देशज भाषाओं, जैसे-इटालियन, फ्रेंच, अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनी, पुर्तगाली, डच, नार्वेनियन, स्वीडिश आदि में लिखा गया। यह पुनर्जागरण की देन है कि इस युग में इन देशज एवं बोलचाल की भाषाओं में विपुल साहित्य का सृजन हुआ, और कुछ समय बाद ये भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाओं का दर्जा पा गई, और राष्ट्रीय संस्थाओं के विकास का आधार- बिन्दु बन गईं।

(iii) भाषाविज्ञान का अध्ययन एवं विकास : पुनर्जागरण काल के साहित्य की एक अन्य विशेषता है, भाषाओं की रचना एवं विकास के वैज्ञानिक आधारों का अध्ययन। इस काल में क्लासिकी भाषाओं यूनानी एवं लैटिन के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण में रुचि के साथ-साथ नयी विकसित हो रही यूरोप की राष्ट्रीय भाषाओं को भी सुदृढ़ वैज्ञानिक आधारों पर स्थापित करने का प्रयास किया गया सोलहवीं शताब्दी में फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, इटेलियन एवं अन्य भाषाओं के वैज्ञानिक शब्दकोश तैयार किए गए।

(01) इटली में पुनर्जागरण युग का साहित्य

इटली में पुनर्जागरण युग में तीन प्रमुख साहित्यकार हुए- दाते ( 1265-1321 ई.); पैट्रार्क (1304- 1374 ई. ); एवं बोकासियो (1313-1375 ई.)। दांते (1265-1321) की प्रसिद्ध कृति ‘डिवाइन कामेड़ी’ नामक महाकाव्य है। इस कृति को दांते ने क्लासिकी भाषा या शिक्षित वर्ग की भाषा लैटिन में नहीं लिखा, बल्कि उसे जनसामान्य की भाषा इटैलियन में लिखा। इटैलियन भाषा में लिखी यह पहली महत्त्वपूर्ण कृति थी, इसलिए दांते को ‘ इतालवी काव्य का पिता’ कहा जाता है । ‘डिवाइन कामेडी’ में मृत्यु के बाद जीवात्मा की स्थिति का वर्णन किया गया है, जब उसे नरक, पापमोचन स्थल एवं स्वर्ग की यात्रा करनी पड़ती है। सतही तौर पर इस महाकाव्य की विषय-वस्तु धार्मिक एवं मध्यकालीन है, लेकिन मनोभावना की दृष्टि से इसमें मानवीय चेतना (आधुनिक युग की विशेषता) के अनेक तत्व हैं, जैसे-अपने सुख-दु:ख के लिए मानव का स्वयं उत्तरदायी होना, मानवीय प्रेम की महत्ता आदि। जे.ए. सिमन्डस (रिनेसा इन इटली : इटेलियन लिटरेचर) के शब्दों में, ‘प्रतीकात्मक दृष्टि से ‘डिवाइन कामेडी’ का विषय मानव है, इस अर्थ में कि मनुष्य को अपनी स्वतंत्र इच्छा की अनुपालना की प्रक्रिया में गुण एवं अवगुण के आधार पर पुरस्कार या दण्ड का भागी बनाया गया है।’ हेनरी एस. ल्यूकस (दि रिनेसा एंड दि रेफर्मेशन) के अनुसार, ‘यद्यपि दांते के विचार मध्यकालीन थे, लेकिन आगामी शताब्दियों में आने वाले मानववादियों के लिए दाँते ने एक शक्तिशाली प्रभाव-स्रोत का काम किया। कुछ विद्वान पुनर्जागरण का आरम्भ दांते से नहीं, बल्कि पैट्रार्क से मानते हैं, क्योंकि उनके अनुसार दांते की रचना में धार्मिक तत्व प्रमुख है । लेकिन अनेक अन्य विद्वानों की मान्यता है कि पुनर्जागरण का आरम्भ दांते से ही मानना चाहिए, क्योंकि उसकी रचना ‘डिवाइन कामेडी’ का विषय- प्रतिपादन धार्मिक होते हुए भी उसमें मानववादी तत्व या नवीन चेतना के सूत्र सूक्ष्म एवं प्रच्छन्न रूप में विद्यमान थे इतिहासकार स्केपिरो एवं मौरिस (सिविलाइजेशन इन यूरोप) के शब्दों में, ‘इटालियन कवि दांते, मध्यकालीन लेखकों में अन्तिम एवं महानतम था । लेकिन साथ ही वह नवीन उषा का उद्घोषक भी था ।

पैट्रार्क (1304-1374 ई.) को ‘मानववाद का प्रणेता’ कहा जाता है, क्योंकि उसने पहली बार अपने साहित्यिक चिन्तन एवं रचनाओं में, पारंपरिक धार्मिक चिनतन के स्थान पर, लौकिक विषयों को आधारभूत बनाया जिनकी केन्द्रीय धुरी एक स्वतंत्र कर्मशील मानव था । पैट्रार्क द्वारा इतालवी भाषा में लिखी गई ‘सानेट्स टू लोरा’ (लोरा के नाम सम्बोधित गीतिकाएँ) लौकिक प्रेम की मानवीय अनुभूतियों का एक मार्मिक एवं अनूठा दस्तावेज है। प्रेम का यह सहज मानवीय चित्रण बाद के लेखकों के लिए एक आदर्श बन गया । पैट्रार्क द्वारा प्रयुक्त ‘सानेट’ (गीतिका या लघुगीतकाव्य) नामक काव्य-विधा भी बाद के कवियों में बहुत लोकप्रिय हुई। पैट्रार्क की अन्य कविताओं एवं गीतिकाओं में जीवन के अन्य पक्ष भी मुखरित हुए हैं जैसे कि प्रकृति का नैसर्गिक सौन्दर्य, इटली के प्रति देशप्रेम की भावना आदि। पैट्रार्क का धर्मनिरपेक्ष चिन्तन यूनानी

उसकी गहरी अभिरुचि से जाग्रत हुआ; कहा जाता है कि उसने मानववाद को इसी क्लासिकी साहित्य से ढूँढ़ निकाला। पैट्रार्क ने क्लासिकी साहित्य के पुराने हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज एवं संग्रह में बहुत समय व्यतीत किया । उसने रोमन इतिहास के इकतीस प्रमुख व्यक्तियों की जीवनियों पर आधारित एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘लाइव्स ऑफ इलस्ट्रियस मेन’ । इसके अलावा, उसने प्राचीन क्लासिकी लेखकों- होमर, लिवि, ओविड, सिसरो, वरो, वर्गिल एवं सेनेसा के नाम सम्बोधित अनेक पत्र लिखे जो ‘फेमिलियर लेटर्स’ के शीर्षक से प्रकाशित हुये। पैट्रार्क ने क्लासिकी साहित्य के सौन्दर्य एवं महत्व को लोगों के समक्ष नये सिरे से उद्घाटित करने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रयास किए ल्यूकस के शब्दों में, ‘पैट्रार्क, संक्षेप में, मध्यकाल।की भावना के प्रति एक विद्रोही स्वर था।’ एगोन फ्रायडेल (ए कल्चरल हिस्ट्री ऑफ यूरोप, भाग I) के अनुसार, ‘वह पूरी तरह से एक आधुनिक व्यक्ति था । लैटिन में लिखे गए प्राचीन क्लासिकी साहित्य के प्रति पुस्तकालय लापनजर पुनर्जागरण एवं आधुनिक युग का आरम्भ बोकासियो (1313-75 ई.) पैट्रार्क का मित्र एवं शिष्य था। उसे इतावली गद्य का जनक माना जाता।है, जैसे कि दान्ते को इतालवी काव्य का जनक माना जाता है । बोकासियो की श्रेष्ठतम रचना ‘डिकेमेरोन’ है,।जो कि सौ कहानियों का एक संग्रह है । ये नवीन शैली में लिखी गई प्राचीन शौर्यपूर्ण रूमानी प्रेम कहानियाँ हैं,।जिनके वर्णन में-धार्मिक आडम्बर, खोखले मध्यकालीन जीवन मूल्य, सामंतों के दंभपूर्ण एवं हास्यास्पद विचारों आदि पर बड़े तीखे कटाक्ष किए गए हैं। मैजेनिस एवं ऐपल के शब्दों में, ‘ये कहानियाँ सजीवता से भरपूर हैं और मध्ययुग के लेखकों की पवित्रता की कहानियों से बिल्कुल भिन्न हैं।’

बोकासियो को पैट्रार्क के बाद क्लासिकी साहित्य का दूसरा पुनरुद्धारक भी माना जाता है। पैट्राक यूनानी भाषा नहीं सीख पाया था, लेकिन बोकासियो ने यूनानी भाषा सीखी एवं इस भाषा के प्राचीन साहित्य की विशेषताओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। पुनर्जागरण युग के राजनीतिक चिंतकों एवं लेखकों में इटली के निकोलो मैकियावली (1469- 1527) का नाम विशेष उल्लेखनीय है। मैकियावली द्वारा लिखित पुस्तकें हैं : ‘हिस्ट्री ऑफ फ्लोरेंस’; ‘डिस्कोर्सस’;’द प्रिंस’; ‘आर्ट ऑफ वार’ आदि। मैकियावली पुनर्जागरण युग का पहला लेखक था जिसने स्पष्ट शब्दों में राज्य के धर्मनिरपेक्षीकरण की बात की उसने अपने ग्रंथों में पोप एवं धर्माधिकारियों की बड़ी तीक्ष्ण आलोचनाएँ की हैं। मैकियावली की पुस्तकों में सर्वाधिक लोकप्रिय है- ‘द प्रिंस’, जिसे व्यावहारिक राजनीति का एक अनूठा ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ के अनुसार राजनीति में नैतिक आदर्शों एवं साधनों की पवित्रता का महत्त्व शून्यप्राय है; राजनीतिक सफलता के आधार अवसरवादिता, व्यावहारिक कुशलता एवं मनोवैज्ञानिक चातुर्य हैं। मैकियावली को राजनीति का ‘आधुनिक चाणक्य’ कहा जाता है।

(02) इंग्लैंड में पुनर्जागरण युग का साहित्य

पुनर्जागरण युग के प्रारंभिक साहित्यकारों में दांते के बाद दूसरा नाम इंग्लैंड के ज्योप्री चौसर (1340-1400 ई.) का है जिसकी प्रसिद्ध कृति का नाम है-‘ कैण्टरबरी टेल्स’ | इस पुस्तक में कैण्टरबरी में संत टामस के धार्मिक स्थल की तीर्थयात्रा में जाने वाले तीस यात्रियों-जो इंग्लैंड के तत्कालीन समाज के लगभग सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे , द्वारा एक दूसरे को सुनाई गई कहानियों का संकलन है। इन कहानियों में तत्कालीन अंग्रेजी समाज की मानसिकता एवं जीवन का यथार्थ चित्रण मिलता है, जो शेक्सपियर से पूर्व इंग्लैण्ड का अन्य कोई साहित्यकार इतनी कुशलता से नहीं कर पाया। चौसर को ‘अंग्रेजी साहित्य का होमर’ कहा जाता है। इंग्लैंड में पुनर्जागरण युग की भावना को अभिव्यक्त करने
वाला एक प्रमुख साहित्यकार टामस मूर (1478-1535 ई.) था लैटिन भाषा में लिखी उसकी विख्यात कृति का नाम है ‘यूटोपिया’ जिसमें एक काल्पनिक आदर्श राज्य एवं समाज की रूमानी कथा है; यह प्रकारान्तर से वर्तमान मनुष्य एवं समाज को मानववादी आलोचना की एक श्रेष्ठ एवं अनूठी कृति है। इसमें टामस मूर ने तत्कालीन ब्रिटिश समाज एवं राज्य की दुर्बलताओं को बड़ी खूबसूरती से उभारा है।

एडमण्ड स्पेन्सर (1552-1599 ई.) इंग्लैंड में पुनर्जागरण काल का एक अन्य महान् साहित्यकार
था, जिसकी कृतियों में क्लासिकी एवं मानववादी विचारों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। एडमण्ड स्पेन्सर की श्रेष्ठ कृति है-‘फेयरी क्वीन’, जिसमें इसके नायक राजकुमार आर्थर के माध्यम से, जीवन के संघर्ष में, आदर्श नैतिक मूल्यों की विजय श्रेष्ठ कृति माना जाता है, क्योंकि इसमें मानवीय मूल्यों की सर्वोपरि महत्ता का दिग्दर्शन है।

पुनर्जागरण युग में इंग्लैंड का सबसे बड़ा सितारा विलियम शेक्सपियर (1564-1616 ई.) के रूप में
उदित हुआ जिसकी गणना विश्व के महान् नाटककारों में की जाती है। शेक्सपियर के नाटकों में मानव के सांसारिक जीवन की वास्तविक अनुभूतियों का बड़ा सहज, स्वाभाविक, जीवन्त एवं ह्दयस्पर्शी चित्रण हुआ है।

शेक्सपियर ने सुखान्त एवं दु:खान्त दोनों प्रकार के नाटक लिखे, लेकिन शेक्सपियर की प्रतिभा का सर्वोच्च निदर्शन उसके दुःखान्त नाटकों- ‘हेमलेट’, ‘ ओथेलो’, ‘किंग लिअर’ एवं ‘मैकबेथ’ में देखने को मिलता है। प्रतिष्ठापन है।

(03) फ्रांस में पुनर्जागरण युग का साहित्य

फ्रांस के पुनर्जागरण युग के साहित्यकारों में दो विशेष उल्लेखनीय हैं-फ्रेंकोइस रेबेला (1494-1553
ई.) एवं मोन्टेग (1533-1592 ई.) फ्रेंकोइस रेबेला (1494-1553 ई.) फ्रांस के मानववादियों में सबसे प्रमुख था। उसने बड़ी सपाट ए सशक्त फ्रांसीसी भाषा में अपनी रचनाएँ लिखीं रेबेला ने अपनी विषय-वस्तु के प्रतिपादन में जीवन भौतिक, आनन्दमय एवं धर्मनिरपेक्ष पक्ष पर जोर दिया, तथा छद्म, आडम्बर एवं परम्परा के प्रति अपनी वितृष्णा को अभिव्यक्त किया; उसकी रचनाओं में पुनर्जागरण की आंतरिक मानसिकता की सही अभिव्यंजना है। रेबेला की दो प्रसिद्ध कृतियाँ हैं-‘गरगन्तुआ’ एवं ‘ पेन्टेय्रुएल’ ।

मोन्टेग ( 1533-1592) सोलहवीं शताब्दी में प्रांस का सबसे महत्त्वपूर्ण लेखक था। अपने विवेकशील चिन्तन के कारण मोन्टेग को वाल्तेयर का पूर्वगामी माना जाता है। मोन्टेग ने अनेक विषयों पर फ्रेंच भाषा में अपने प्रसिद्ध ‘निबन्ध’ लिखे जिनमें मानव जीवन की समस्याओं एवं उनके समाधान के प्रति लेखक कीनगहरी अन्तरंग रुचि दिखाई पड़ती है।

(04) अन्य देशों में पुनर्जागरण युग का साहित्य

स्पेन : स्पेन में पुनर्जागरण की विशेषताओं का श्रेष्ठ प्रतिनिधि साहित्यकार सबेन्टीज (1547-1616.ई.) था। उसकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डान क्विक्जोट’ स्पेन की मध्यकालीन पारंपरिक एवं सामंती मान्यताओं पर एक सटीक व्यंग्य है।

हालैंड : पुनर्जागरण युग में प्रमुख मानववादी चिन्तकों में हालैंड के डेसिवडरिअस इरैस्मस (1466- 1536 ई.) का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। ल्यूकस के शब्दों में, ‘उसमें विद्रोह के उस युग की सारी नैतिक एवं बौद्धिक अवधारणाओं का समन्वय देखने को मिलता है ।’ इरैस्मस इटली, इंग्लैंड एवं फ्रांस में भी रहा और उसे ‘एक महान् यूरोपीयन व्यक्तित्व’ एवं ‘एक विश्व नागरिक’ के रूप में देखा जाने लगा। इरैस्मस की पुस्तक ‘प्रेज ऑफ फॉली’ पुनर्जागरण युग का एक प्रमुख साहित्यिक स्तंभ है । इस पुस्तक की नायिका ‘फॉली’ मानव की सहज प्रवृत्तियों की प्रतीक है, और उसके माध्यम से इरैस्मस ने जीवन की कठोर, धार्मिक, तापसिक एवं आडंबरपूर्ण शैली के स्थान पर सहज, स्वाभाविक, उल्लास एवं आनन्द से परिपूर्ण जीवनशैली के महत्त्व को उजागर किया है। प्रसंगवश इस कृति में तत्कालीन धार्मिक सामाजिक जीवन एवं चर्च में व्याप्त कुरीतियों एवं भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य किया गया है। यह कहा जाता है कि लूथर के क्रोध की तुलना में इरैस्मस के मज़ाकिया कथनों ने पोप को अधिक नुकसान पहुँचाया।

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