Top 04 विज्ञान के क्षेत्र में पुनर्जागरण

Top 04 विज्ञान के क्षेत्र में पुनर्जागरण

वैज्ञानिक मन:स्थिति का विकास पुनर्जागरण युग की एक महत्त्वपूर्ण देन थी। वैज्ञानिक मन:स्थिति या चेतना का अर्थ है प्राकृतिक एवं मानवीय संसार में बिना प्रमाण या सिद्धि के किसी भी कार्य-कारण सम्बन्ध को स्वीकार न करना। मध्यकालीन यूरोप में ईसाई धर्मशास्त्र एवं धर्मगुरुओं के कथनों पर, उन्हें स्वयंसिद्ध सत्य मानकर, आँख मूंदकर विश्वास कर लिया जाता था अंधविश्वास एवं जादुई पद्धतियों का बोलबाला था। लोग इस लोक या प्रत्यक्ष संसार से साक्षात्कृत न होकर परलोक सुधारने के रहस्यवादी धार्मिक क्रियाकलापों में उलझे हुए थे।

पुनर्जागरण युग में कुछ ऐसी प्रवृत्तियों का उदय हुआ है जिन्होंने वैज्ञानिक चेतना के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। धर्मयुद्धों के माध्यम से हुए पूर्वी देशों के सम्पर्क के कारण, यूरोप में उदारवादी चेतना का प्रसार हुआ। आर्थिक परिवर्तनों एवं व्यापारिक समृद्धि ने एक ऐसे वर्ग की सृष्टि की जिसने चर्च के धार्मिक नियंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोटेस्टेण्ट धर्मसुधार आन्दोलन ने सदियों से चले आ रहे परंपरागत धार्मिक नियंत्रण को चुनौती दी, और व्यक्ति की विवेकशील चेतना के स्वातंत्र्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया। मानववादी चेतना पुनर्जागरण एवं आधुनिक युग का आरम्भ के विकास ने भाग्यवाद एवं अंधविश्वास की जड़ों पर चोट की। मानव की कम्मशोलता एवं कार्य-कारण सम्मत मानवीय विकास की स्वतंत्र एवं अनन्त संभावनाओं के विचार ने मनुष्य को विवेकशील एवं तार्किंक चिंतन की दिशा में प्रेरित किया। नवीन परिवर्तनों के कारण सामंतवाद एवं उसके द्वारा पोषित जड़ मानसिकता का ढाँचा चरमराने लगा। नवीन क्षेत्रों के भौगोलिक अनुसंधानों से नवीन विचारों का आगमन हुआ। उपर्युकत सभी कारण पुनर्जागरण युग में वैज्ञानिक प्रगति के सहायक बने।

(01) नवीन वैज्ञानिक चेतना के सैद्धान्तिक प्रवर्तक

यूरोप में स्कालिस्टिक विचारकों -एबेलार्ड (1079 1142) एवं टामस एक्विनाज ( 1224-1274) ने पहली बार अंधश्रद्धा के स्थान पर तर्कबुद्धि के महत्त्व को उजागर किया, हालांकि इसकी पृष्ठभूमि में उनका प्रयोजन धार्मिक कथनों को सिद्ध करना ही था । लेकिन रोजर बेकन ( 1215-1294) ने पहली बार, बहुत स्पष्ट शब्दों में, व्यक्ति की विवेकशील एवं तर्कबुद्धि-प्रधान मन:स्थिति के स्वतंत्र ठपयोग की महत्ता का प्रतिपादन किया; उसके कथनों में वैज्ञानिक चेतना के स्पष्ट सूत्र विद्यमान थे पेरिस विश्वविद्यालय में अपने एक व्याख्यान में उसने यह कहा कि ‘प्रयोग से ही प्राकृतिक, रासायनिक, भेषजिक, वस्तुत: स्वर्ग और पृथ्वी पर अवस्थित सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है ।’ रोजर बेकन ने कुछ ऐसे वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रतिपादित किए जिनमें मोटर, हवाई जहाज एवं वाष्पचालित जहाज के आविष्कार की संभावनाओं को व्यक्त किया गया रोजर बेकन के कथनों को उस काल में खतरनाक माना गया और उसे जेल में डाल दिया गया। बाद के चिंतकों में, वैज्ञानिक चेतना के महत्त्व को अपेक्षाकृत अधिक पुरजोर शब्दों में फ्रांसिस बेकन (1561-1626) ने रेखांकित किया। उसके अनुसार, ज्ञान की प्राप्ति के लिए कार्य-कारण सम्बन्ध को परीक्षणनएवं प्रयोग द्वारा जानना बहुत अनिवार्य है। अपनी पुस्तक ‘दि एडवांसमेन्ट ऑफ लर्निंग’ में उसने प्राकृतिकनतथा भौतिक विज्ञानों के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। दँकार्त (1596-1650) के अनुसार ‘किसी भी बात पर हमें आसानी से विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, पहले हमें उसे संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।’बसंदेह की मन:स्थिति वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए आवश्यक है, इस रूप में दँकार्त का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है।

(02) भूगोल एवं खगोलशास्त्र

खगोलशा्त्र के क्षेत्र में पोलैंड के निकोलस कॉपरनिकस (1473-1543) ने एक क्रान्तिकारी खोज की। इससे पूर्व, ईसाई धर्म के सभी स्कूलों में, टालमी द्वारा प्रतिपादित ब्रह्माण्ड के ‘जियोसेन्ट्रिक’ सिद्धान्त को अंतिम सत्य मानकर पढ़ाया जाता था ‘जियोसेन्ट्रिक’ सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित थी तथा सूर्य, तारे एवं ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं । कापरनिकस ने अपनी वेधशाला में किए गए आकाशीय पिंडों के दीर्घकालिक प्रेक्षणों के आधार पर अपनी पुस्तक “ऑन दि रिवोल्यूशन्स ऑफ सेलेस्टियल बॉडीज” में ब्रह्माण्ड के ‘हेलियोसेन्ट्रिक’ सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कॉपरनिकस के इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है जो निश्चल है, पृथ्वी एक वृत्ताकार परिधि में उसके चारों ओर घूमतो है, अन्य ग्रह भी सूर्य के चारों ओर घूमते हैं कॉपरनिकस ने यह भी कहानकि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। अनेक धर्माधिकारियों ने कॉपरनिकस के इस सिद्धान्त को बाइबिल की शिक्षाओं के विपरीत मानकर, उसकी कट्टर आलोचना की।

जर्मनी के खगोलशास्त्री जॉन केपलर (1571-1630 ) ने कॉपरनिकस के निष्कर्षों का समर्थन किया और उन्हें सिद्ध करने के गणितीय नियम प्रस्तुत किए जान केपलर के कॉपरनिकस के सिद्धान्त में एक महत्त्वपूर्ण संशोधन किया केपलर के अनुसार पृथ्वी एवं अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार परिधि में नहीं, बल्कि दीर्घवृत्तीय (एलिप्टिकल) परिधि में घूमते हैं। कॉपरनिकस के निष्कर्षों को अंतिम रूप से प्रमाण सहित पुष्ट करने का श्रेय इटली के खगोलशास्त्री गैलिलियो (1564-1642) को है उसने अंतरिक्ष में बहुत दूर तक देखने वाली एक दूरबीन का आविष्कार किया, जिसकी सहायता से उसने आकाशीय पिंडों एवं उनकी गति का अध्ययन किया गैलिलियो ने कॉपरनिकस के सिद्धान्तों के समर्थन में एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसे धर्मविरोधी करार कर गैलिलियो पर मुकदमा चलाया गया उसकी किताब को जला दिया गया । गैलिलियो को मुकदमे से तब बरी किया गया जब उसने अपने सिद्धान्तों को वापिस ले लिया। इटली के एक अन्य वैज्ञानिक गिओरदानो ब्ूनो (1548-1600) ने भी पुनर्जागरण एवं आधुनिक युग का आरम्भ कॉपरनिकस के निष्कर्षों का समर्थन किया, लेकिन उसने अपने विचार वापिस नहीं लिए। चर्च द्वारा उसे धर्मद्रोही घोषित कर जिंदा जलवा दिया गया।बसत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में एक अत्यंत प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हुआ जिसका नाम आइजक न्यूटन (1642-1747) था। उसने गति के नियमों एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

नीदरलैंड के मर्केटर (1512-1594) नामक भूगोलवेत्ता ने विश्व के सही नक्शों के निर्माण की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास किए। उसके द्वारा बनाया गया वृहद् एटलस सन् 1595 में प्रकाशित किया गया।

नवीन खगोलशास्त्रीय ज्ञान के आधार पर पुराने जूलियन पंचांग में सुधार किया गया, एवं उसके स्थान पर पोप ग्रेगरी त्रयोदश द्वारा एक सही पंचांग का निर्माण किया गया, जिसे ‘ग्रेगोरियन केलेंडर’ कहा जाता है। यह पंचांग अनेक देशों द्वारा स्वीकार किया गया एवं अभी भी प्रचलन में है।

(03) शरीर विज्ञान एवं चिकित्सा-शास्त्र

नीदरलैंड के एन्द्रियो वेसेलियस ( 1514-64) ने सन् 1543 में शरीर-रचना विज्ञान पर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की जिसका शीर्षक था, ‘सेवन बुक्स आन दि स्टूरक्चर ऑफ ह्यूमेन बाडी’ । इस पुस्तक में पहली बार मानवीय शरीर के विभिन्न अंगों का विस्तृत एवं सचित्र विवरण प्रस्तुत किया गया। फैलोपियस (1523-62) नामक चिकित्सक ने मानवीय शरीर के कुछ विशेष अंगों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया; ‘फैलोपियन ट्यूब्स’ का नामकरण उसी के नाम के आधार पर किया गया है। इंग्लैण्ड के चिकित्सक विलियम हार्वे (1578-1657) ने मनुष्य के हृदय एवं शरीर में रक्त की संचार-प्रक्रिया की पहचान की; उनकी पुस्तक का शीर्षक है, ‘आन दि मोशन ऑफ दि हर्ट एण्ड ब्लड’।

(04) भौतिकी, रसायनशास्र एवं गणित

भौतिकी के क्षेत्र में, गिल्बर्ट (1540-1603) ने चुम्बकीय गुणधर्म (मैग्नेटिक प्रापर्टीज) को समझने
की दिशा में अनेक अध्ययन एवं प्रयोग किये; इससे विद्युत शक्ति की खोज का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्टीवन (1548-1620) ने शक्तियों के समानान्तर चतुर्भुजीय दबाव के नियम को खोजा एवं तरल पदार्थों के दबाव में उसका प्रयोग करके देखा । गैलिलियो का भी पुनर्जागरण युग के भौतिकशा्त्रियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसने गिरती हुई वस्तुओं की गति के नियम को खोजा जो आधुनिक गतिविज्ञान की आधारशिला है। उसने पेण्डुलम के नियमों की भी खोज की। उसने एक टेलिस्कोप, एक वायुमापक यंत्र एवं एक खगोलशास्त्रीय घड़ी का निर्माण किया।

रसायनशास्त्र के क्षेत्र में, कारडस (1515- 1544) ने सल्फरिक एसिड एवं अल्कोहल से ईधर का निर्माण किया। हेल्मोन्ट ( 1577-1644) ने कार्बन-डाई-ऑक्साइड की खोज की । गणित के क्षेत्र में, यूरोप को पूर्वी देशों के संपर्क से प्रचुर लाभ हुआ। मुसलमानों के माध्यम से यूरोपवासियों को बीजगणित के कुछ सिद्धान्त एवं अरब संख्यांकों की जानकारी हुई। यूनानियों से उन्हें अंकगणित एवं रेखागणित का ज्ञान प्राप्त हुआ था । प्रोफेसर जे. ई. स्वेन के अनुसार, ‘सोलहवीं शताब्दी में गणित के क्षेत्र में हुई त्वरित प्रगति का मुख्य कारण वाणिज्यिक एवं वैज्ञानिक क्रियाकलापों में सहायक सूचनाओं की बहुमुखी आवश्यकता थी।’ पुनर्जागरण युग के कुछ गणितकार जिन्होंने गणित की अनेक समस्याओं पर प्रकाश डाला, इस प्रकार हैं: टर्टगलिआ (1500-1557); फेरारी ( 1522-1565); विएता (1540-1630); स्टीविन (1548-1620); नेपियर (1550-1617); केपलर ( 1571-1630);B डेसारग्युएस (1593-1662); एवं डेकार्ट ( 1596-1650) ।

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